|
क्या दर्शाते हैं प्रमुख दलों के वादे? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
किसी भी राजनीतिक पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र को दो नज़रिए से देखा जा सकता है. पहला यह कि तत्काल इससे पार्टी को क्या फ़ायदा या नुक़सान होगा. दूसरा यह कि अगले दस-बीस साल के राजनीतिक नक़्शे पर इसका क्या असर होगा? मैं अक्सर चुनाव घोषणा पत्र को इस दूसरे नज़रिए से देखने की कोशिश करता हूँ. राजनीति में इस बात का महत्व नहीं है कि किसके दिल में क्या है. सियासत की हक़ीक़त यह है कि जनता के सामने कोई भी दल क्या बोलने को मजबूर है. किस पार्टी के दिल में क्या है, वो हक़ीक़त नहीं है. जो बोला जा रहा है और जिसका वादा किया जा रहा है, हक़ीकत वो है. इस बार यदि मुख्य राजनीतिक दलों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के घोषणा पत्रों पर नज़र डालें तो दिखाई देता है कि दीर्घकालिक नीतियों के स्तर पर दोनों पार्टियाँ अपने तमाम मतभेदों के बावजूद कुछ आर्थिक नीतियों, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मुद्दों पर कुछ नज़दीक आ रही हैं. आर्थिक नीति अपने मतभेदों का ढोल पीटने के बाद हक़ीक़त यह है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच आर्थिक नीति में बुनियादी तौर पर कोई फ़र्क़ नहीं बचा है. चाहे वो विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ के प्रति रवैया हो या फिर देश के अंदर उदारीकरण की नीति हो. अब अंतर ये रह गया है कि कोई कहता है कि हम तीन लाख रुपये पर टैक्स में राहत देंगे तो कोई कहता है कि हम डेढ़ लाख पर देंगे. बुनियादी आर्थिक नीति में ये कोई अंतर नहीं है. मैं तो यह कहूँगा कि ख़ौफ़नाक तरह से दोनों पार्टियों की नीतियाँ एक ही हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में कांग्रेस, भाजपा के दो-चार क़दम क़रीब आई है. राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में कांग्रेस ने जिस तरह के क़दम उठाए हैं, एक केंद्रीय जांच एजेंसी बनाने की बात की है. पिछले दरवाज़े से टाडा या पोटा को वापस लाना ये वही बातें हैं जिन्हें भाजपा लाने के लिए कहती रही है. सिर्फ़ कांग्रेस ने इसे दूसरा नाम दिया है. विदेश नीति विदेश नीति के मामले में आज से 15 साल पहले कांग्रेस और भाजपा के बीच जो फ़ासला था वो फ़ासला बहुत कम हुआ है और कम इसलिए नहीं हुआ है कि भाजपा, कांग्रेस के क़रीब आई है बल्कि कम इसलिए हुआ है कि कांग्रेस, भाजपा के क़रीब आई है. यहाँ ये बात स्पष्ट तौर पर जानने की ज़रूरत है कि इस चुनाव में मुंबई हमले के बाद कोई भी पार्टी पाकिस्तान के मामले में नरमी की बात नहीं कर सकती है. और ये भी कि विदेश नीति किसी धर्म विशेष के आधार पर नहीं चलती. बुनियादी बदलाव जहां तक जनता को रिझाने के सवाल का मामला है भाजपा का घोषणा पत्र पढ़कर मुझे लगता है कि भाजपा को ऐसा लगने लगा है कि वो सरकार बनाने वाली नहीं है. क्योंकि जिस क़िस्म के वादों की झड़ी लगाई गई है, अक़्सर वो पार्टी ऐसा नहीं करती जिसे ये ख़ुशफ़हमी होती है कि उसकी सरकार बनने वाली है.
जहाँ तक मुसलमानों को रिझाने का मामला है, मुझे लगता है कि इस घोषणा पत्र में ये छोटा, लेकिन बुनियादी किस्म का बदलाव है. ग़ौरतलब है कि पिछले दो चुनावों में भाजपा ने अपना घोषणा पत्र जारी नहीं किया था, वो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए का घोषणा पत्र हुआ करता था. यानी, भाजपा को 11 साल बाद अपना घोषणा पत्र जारी करने का मौका मिला है. ज़ाहिर है, ऐसे में उन्होंने राम मंदिर की बात दोबारा कही है, समान नागरिक संहिता, जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को ख़त्म करने के बात कही है. लेकिन भाजपा ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, उससे मुझे लगता है कि भाजपा कुछ नरम पड़ी है. राम जन्मभूमि के मुद्दे पर वो नहीं कहते कि हम मंदिर वहीं बनाएंगे....घोषणा पत्र कहता है कि मंदिर बनाने के लिए तमाम तरह के विकल्प तलाशे जाएँगे. जिसमें बातचीत और न्यायिक कार्यवाही शामिल है. अब वो भाषा नहीं है कि मंदिर वहीं बनाएंगे. कहीं पार्टी ने दो चार क़दम खींचे हैं, मेरे ख़्याल से यह बहुत सकारात्मक क़दम है. सियासत की हक़ीक़त मेरे हिसाब से हक़ीक़त यह है कि आज इस देश का मुसलमान दोनों पार्टी के हाथों का मुहरा बना हुआ है. भारत में मुसलमानों की लगभग वही त्रासदी है जो अमरीका की सियासत में श्वेत लोगों की है. ड्रेमोक्रेटिक पार्टी श्वेत लोगों के लिए इसलिए कुछ नहीं करती है क्योंकि उनको पता है वो इसी पार्टी को वोट करेंगे और रिपब्लिकन इसलिए कुछ नहीं करती कि उसे पता है कि उन्हें श्वेत का वोट मिलना नहीं है. यह टूटना चाहिए. मुसलमान कुछ पार्टियों के हाथों बंधक है. जब मैं उस नज़रिए से भाजपा का घोषणा पत्र देखता हूँ तो उस त्रासदी के टूटने के छोटे-छोटे इशारे नज़र आते हैं जो मेरी निगाह से बहुत महत्वपूर्ण है.
जब भाजपा कहती है कि इस देश के ज़्यादातर मुसलमान पिछडे हुए हैं तो इसका अर्थ है कि वो सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार करती है. उसके बाद वो कांग्रेस के बारे में कुछ भी कहे फ़र्क़ नहीं पड़ता है. भाजपा अल्पसंख्यक मंत्रालय की बात करती है, लेकिन यह नहीं कहती कि इसे बंद कर देंगे जबकि वह इसे बंद करने की बात कह सकती थी. वो कहती है कि इसे हम बेहतर काम पर लगाएंगे. बुनकरों के काम पर लगाएंगे. अल्पसंख्यकों की शिक्षा पर काम करेंगे. भाजपा ये ख़ुद कहती है कि वो भारत की तमाम भाषाओं के विकास के लिए काम करेगी और तमिल, उर्दू और संस्कृत की बात करती है. लेकिन भाजपा हिंदी की बात नहीं कहती, हम इसे पाखंड कह सकते हैं. राजनीति में पाखंड हमेशा चलता है, पाखंड की राह पर चलकर ही पार्टियां ख़ुद को बदलती हैं और मैं इसे भाजपा में छोटा लेकिन अहम इशारा मानता हूँ, मुझे नहीं मालूम के इससे भाजपा को क्या फ़ायदा होगा लेकिन ये हमारे देश और लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है. कांगेस कांग्रेस ने आम बात की है. लेकिन ख़्याल रहे घोषणा पत्र सिर्फ़ शब्दों की लड़ी होती है, जो जनता को रिझाने के लिए पिरोए जाते हैं. मैं उसमें हक़ीक़त की तलाश नहीं करता. आम आदमी की बात कर वो ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि इस देश में ‘शाइनिंग इंडिया’ की राजनीति नहीं चल सकती है. कांग्रेस में अल्पसंख्यक के बारे में पिछले घोषणा पत्र के आगे बढ़कर दो बातें कहीं हैं. पहला समान अवसर आयोग का गठन और दूसरे आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देना. उधर वामपंथी पार्टियों का घोषणा पत्र काफ़ी गंभीर है, लेकिन न चुनाव घोषणा पत्र से जीते जाते हैं, न हारे जाते हैं और न ही लड़े जाते हैं. वामपंथ के सामने सबसे बड़ी परेशानी उनकी विचारधारा और हक़ीक़त में फ़ासले की है. ऐसे में जनता उनके किसी वादे पर विश्वास करे ऐसा लगता नहीं है. हालांकि उनके घोषणा पत्र में किसी भी दूसरी पार्टियों से कहीं अधिक विज़न है. |
इससे जुड़ी ख़बरें लालू, मुलायम, पासवान एक मंच पर03 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस 'मनमोहन सिंह ही होंगे प्रधानमंत्री'24 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस 'राजनीति के 60 बरस में आठ बरस थी सत्ता'02 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस बसपा-भाजपा रिश्ते पर 'अमरवाणी'15 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस अकेले दम पर चुनाव लड़ेंगे: मायावती15 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस लालू ने कांग्रेस को आड़े हाथों लिया21 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||