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रविवार, 05 अप्रैल, 2009 को 16:05 GMT तक के समाचार
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'परिसीमन का नफ़ा-नुक़सान'

राजनीतिक दलों के झंडे
परिसीमन में अनुसूचित जाति और जनजाति की लोकसभा सीटें बढ़ी हैं

भारत में लगभग तीन दशक के बाद लोक सभा सीटों का परिसीमन हुआ है. कुल 543 लोक सभा सीटों में से 499 सीटों की परिसीमन हुआ है.

आख़िर किस आधार पर हुआ परिसीमन और इन चुनावों पर परिसीमन का क्या असर होगा?

उदाहरण के तौर पर भारत की राजधानी से सटे गुडगांव पर नज़र डालते हैं. इस चमक-दमक वाली उपनगरी में कई बड़ी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लोग रहते हैं और अधिकतर लोगों का मानना है कि गुड़गांव 'चमकते' नए भारत की बेहतरीन मिसाल है.

ऊँची-ऊँची इमारतों और बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स के बावजूद गुड़गांव आधिकारिक तौर पर ग्रामीण लोकसभा सीट है. इस लोक सभा क्षेत्र के सिर्फ़ 23 फ़ीसदी बाशिंदे ही शहरी इलाक़े में रहते हैं. इस क्षेत्र की एक-तिहाई आबादी ग़रीब दलित और मुस्लिमों की है.

बदलता मिज़ाज

गुड़गांव सीट के सामाजिक ताने-बाने से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि परिसीमन के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी. पन्द्रहवीं लोकसभा के लिए 499 लोकसभा सीटों की सीमाएँ फिर से तय की गई हैं.

 अचानक मेरी सीट शहरी क्षेत्र बन गई है. इसमें ऊँची और मध्यम जाति के मतदाताओं का प्रभुत्व है. मैं यहाँ से अब चुनाव नहीं लड़ सकता
रामकृपाल यादव, नेता राजद

अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में क्षेत्र की आबादी बढ़ने-घटने के मद्देनज़र परिसीमन किया जाता है. लेकिन भारत में परिसीमन का काम 33 साल के लंबे अंतराल के बाद हुआ.

भारत में समाज जाति, मज़हब, समुदाय और ख़ास पहचान के आधार पर बंटा है. ऐसे में परिसीमन से सामाजिक वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलाव आना लाज़िमी होगा.

वरुण गांधी
कुछ टीकाकार मानते हैं कि वरुण के भाषण के पीछे परिसीमन से पैदा हुई दिक्कतें हो सकती हैं

राजनीतिक मामलों के जानकार योगेंद्र यादव कहते हैं, "इसे राजनीतिक भूचाल कहा जा सकता है. लोकसभा क्षेत्रों की सीमाएँ नए तरीक़े से खींची गई हैं."

परिसीमन से बदले क्षेत्रों में प्रत्याशी चुनने के लिए राजनीतिक पार्टियों की माथापच्ची भी बढ़ी है. प्रत्याशी भी सुखद स्थिति में नहीं हैं और क्षेत्र के बदले राजनीतिक भूगोल से चिंतित हैं.

मिसाल के तौर पर बिहार के पटना लोकसभा क्षेत्र से रामकृपाल यादव तीन बार राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन परिसीमन के बाद उनकी लोकसभा सीट दो हिस्सों में बंट गई है.

मतलब ये कि परिसीमन के बाद उनकी सीट का जातीय समीकरण बदल गया है. बड़ी संख्या में उनके दलित समर्थक नई सीट में चले गए हैं और परिसीमन के बाद उनके क्षेत्र में अधिकांश आबादी ऊंची और मध्यम जाति के मतदाताओं की है.

 इसे राजनीतिक भूचाल कहा जा सकता है. लोकसभा क्षेत्रों की सीमाएँ नए तरीक़े से खींची गई हैं
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव

रामकृपाल यादव कहते हैं, "अचानक मेरी सीट शहरी क्षेत्र बन गई है. इसमें ऊँची और मध्यम जाति के मतदाताओं का प्रभुत्व है. मैं यहाँ से अब चुनाव नहीं लड़ सकता."

जनसंख्या आक्रामक प्रचार

दूसरी तरफ़, प्रत्याशी अपने क्षेत्र के नए मतदाताओं को लुभाने के लिए बेताब हैं. हाल ही में मेनका गांधी के पुत्र वरुण गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिमों के ख़िलाफ़ कथित भड़काऊ टिप्पणी की.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संभव है कि वरुण ने ऐसा इसलिए किया हो क्योंकि परिसीमन के चलते उनके क्षेत्र से बड़ी तादाद में हिंदू मतदाता बाहर हो गए और मुस्लिम मतदाता बढ़ गए.

 मैंने परिसीमन का विरोध किया था, लेकिन सब बेक़ार गया
साधू यादव

परिसीमन के चलते कई प्रत्याशियों को अपनी सीटें भी गंवानी पड़ी हैं. पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ऐसे ही उम्मीदवारों में शामिल हैं.

परिसीमन के बाद उनके लोकसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए आरक्षित हो गए हैं.

परिसीमन के कारण अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटें भी बढ़ी हैं और अब इनकी संख्या बढ़कर 125 हो गई है. कई मौजूदा सांसदों को अपनी ये सीटें छोड़नी पड़ी हैं और किन्हीं दूसरे क्षेत्रों में जाना पड़ा है.

इसकी वजह भी साफ़ है. अनुसूचित जाति और जनजाति के तबके में जन्म दर दूसरी जातियों के मुक़ाबले कहीं अधिक है और यही वजह है कि इनकी सीटों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है.

बिहार के साधू यादव को भी परिसीमन के चलते अपनी सीट गंवानी पड़ी. उनकी सीट भी आरक्षित श्रेणी में आ गई. साधू कहते हैं, "मैंने परिसीमन का विरोध किया था, लेकिन सब बेक़ार गया."

'ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा'

परिसीमन का अध्ययन करने वाले विश्लेषकों का कहना है कि गांवों से शहरों में पलायन में लगातार वृद्धि होने से शहरी लोकसभा सीटों में इज़ाफ़ा हुआ है.

 परिसीमन का नतीजों पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. उम्मीदवारों की कमज़ोरी और मज़बूती कुल मिलाकर हिसाब बराबर कर देगी
योगेंद्र यादव

दिल्ली स्थित सेंटर फ़ॉर द स्टडीज़ ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ से जुड़े डॉ संजीर आलम कहते हैं, "अप्रशिक्षित मजदूरों और गांवों के ग़रीब लोगों के पलायन से शहरों की आबादी बढ़ी है. नतीजा शहरी लोकसभा सीटों की संख्या भी बढ़ी है."

लेकिन आगामी लोकसभा चुनावों में परिसीमन का क्या असर पड़ेगा?
विश्लेषकों का मानना है कि शहरी लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने से हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा को फ़ायदा हो सकता है. भाजपा परंपरागत रूप से पहले भी शहरी क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करती रही है.

हालाँकि योगेंद्र यादव इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं. वो कहते हैं, "परिसीमन का नतीजों पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. नए लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों की कमज़ोरी और मज़बूती कुल मिलाकर हिसाब बराबर कर देगी और इससे किसी एक पार्टी को बहुत ज़्यादा फ़ायदा नहीं होगा."

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