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पाकिस्तान में सरकार का पहला वर्ष पूरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में मौजूदा सरकार ने एक साल पूरे कर लिए हैं, पिछले साल जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को सत्ता से हटाकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सत्ता में आई. 18 फ़रवरी को पाकिस्तान में 'लोकतांत्रिक शक्तियों' की वापसी हुई और सैनिक शासक परवेज़ मुशर्रफ़ को पद छोड़ना पड़ा था. पीपीपी पाकिस्तान के नवनिर्माण के नारे के साथ सत्ता में आई और उसने देश की प्रमुख समस्याओं का हल निकालने का वादा किया लेकिन ज्यादातर मोर्चों पर जनता नाउम्मीद ही हुई है. देश में जातीय हिंसा, आतंकवाद और आर्थिक संकट कहीं से कम होता नहीं दिख रहा है. बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद हुए चुनाव में विजय हासिल करने वाली पीपीपी के नेतृत्व में 18 फ़रवरी को गठबंधन सरकार बनी जिसमें अवामी नेशनल पार्टी, जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम और मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट शामिल हैं. नवाज़ शरीफ़ के नेतृत्व वाली पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल-एन) मुशर्रफ़ के दौर में बर्खा़स्त जजों की बहाली के सवाल पर गठबंधन से अलग हो गई थी. नई सरकार के शपथ लेने के कुछ सप्ताह बाद परवेज़ मुशर्रफ़ को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था क्योंकि उन्हें समर्थन देने वाली पार्टियाँ चुनाव में बुरी तरह हार गई थीं. नवाज़ शरीफ़ और पीपीपी के आसिफ़ अली ज़रदारी के बीच राजनीतिक रस्साकशी के शुरूआत से ही चलती रही जबकि बड़े मुद्दों पर सरकार कोई निर्णायक क़दम नहीं उठा सकी. दुनिया भर में मंदी का दौर शुरू होने से पहले ही पाकिस्तान की आर्थिक हालत पतली थी, बेरोज़गारी और महँगाई के आँकड़े आसमान छू रहे हैं. पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में तालेबान और अल क़ायदा की चुनौती ज़रा भी कमज़ोर नहीं पड़ी है. सुरक्षा बलों और चरमपंथियों के बीच हुए संघर्ष में सैकड़ों जाने गई हैं. चरमपंथियों को मारने की अमरीकी कोशिश में बड़ी संख्या में आम नागरिक मारे गए हैं जिससे अमरीका विरोधी भावनाएँ और बलवती हुई हैं. अगर अगले साल तक पाकिस्तान के हालात सरकार के काबू में नहीं आए तो देश एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता के भँवर में फँस सकता है. |
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