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शुक्रवार, 11 अप्रैल, 2008 को 18:56 GMT तक के समाचार
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'सरबजीत की रिहाई के लिए सबूत नहीं'

पाकिस्तान में मानवाधिकार मामलों के मंत्री अंसार बर्नी
अंसार बर्नी ने उम्मीद जताई कि सरबजीत की सज़ा को फाँसी से उम्रक़ैद में बदलने की कोशिश की जाएगी
भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह क्या पाकिस्तान की जेल से रिहा होकर वापस भारत आ पाएंगे, इसपर अभी भी स्थिति साफ़ होती नज़र नहीं आ रही है.

पाकिस्तान में मानवाधिकार मामलों के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी ने शुक्रवार को दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि उनकी रिहाई और बेगुनाही को साबित करने के लिए जितने सबूत उनके परिवार के लोग दिखा रहे हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं.

हालांकि उन्होंने कहा कि अगर सरबजीत के मामले में ज़रा भी गुंजाइश दिखाई देती है और उसपर लगे आरोपों में कहीं कोई भी कमी बाक़ी रहती है तो उसे रिहाई मिल सकती है.

शुक्रवार शाम ही राजस्थान के अजमेर शरीफ़ और फिर पुष्कर होते हुए लौटे अंसार बर्नी ने बताया कि उन्हें एक सीडी मिली है जिसके मुताबिक सरबजीत के ख़िलाफ़ गवाही कमज़ोर होने की बात कही गई है. ऐसा होने पर सरबजीत की रिहाई का रास्ता निकल सकता है.

ग़ौरतलब है कि भारतीय मूल के सरबजीत सिंह पर 1990 में लाहौर में तीन बम धमाकों में शामिल होने और भारत के लिए जासूसी करने के आरोप हैं जिनके लिए उसे फाँसी की सज़ा सुनाई गई है.

सरबजीत सिंह ने पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी निचली अदालत के फाँसी के ही फ़ैसले को बरक़रार रखा था.

इसके बाद से सरबजीत के परिवार ने पाकिस्तान की सरकार और भारत सरकार से कई बार अपील की कि सरबजीत निर्दोष हैं और उन्हें छोड़ दिया जाए.

ताकि लोग लौट सकें...

18 बरसों से पाकिस्तान की जेलों में सज़ा काट रहे सरबजीत का मुद्दा पिछले दिनों सुर्खियों में भी रहा इसलिए अपनी भारत यात्रा के दौरान बर्नी ने भारत में क़ैद पाकिस्तानी नागरिकों की सूची भारत सरकार को दी, दोनों ओर से क़ैदियों की रिहाई की पैरवी की और साथ ही सरबजीत के परिजनों को पाकिस्तान आने और सरबजीत से मिलने के लिए आवेदन करने को भी कहा.

 यह रिहाई का मसला भारतीयों और पाकिस्तानियों का नहीं है. किसी धर्म या मजहब का नहीं है. न ही इस तरह का है कि हमने आपके इतने रिहा किए तो आपने बदले में क्या किया. यह मामला है मानवाधिकारों का और अगर कोई सज़ा मानवाधिकारों का अल्लंघन कर रही है तो दोषी को रिहाई दी जानी चाहिए
अंसार बर्नी, मानवाधिकार मामलों के मंत्री, पाकिस्तान

बर्नी ने आख़िर तक इस बारे में साफ़तौर पर नहीं कहा कि सरबजीत की फाँसी रुकेगी या नहीं. हाँ, इतना ज़रूर दोहराते रहे कि उनकी मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदलने की कोशिश की जाएगी क्योंकि सरबजीत ने जितने बरस फाँसी का इंतज़ार किया है, उतनी मियाद में उम्रक़ैद पूरी हो जाती है.

बर्नी कहते हैं कि अगर वो एक सज़ा भुगत चुका है तो उसी गुनाह की दो सज़ा क्यों दी जाए. उन्होंने साफ़ किया कि वो दोषियों की सज़ा माफ़ी के कतई ख़िलाफ़ हैं पर उन लोगों को दोनों ओर से रिहा किया जाना चाहिए जो लंबे समय से एक सज़ा के इंतज़ार में कई सज़ा भुगत चुके हैं.

उन्होंने बताया कि भारत सरकार के कई मंत्रालयों से उनका इस यात्रा के दौरान संपर्क हुआ. मुलाक़ातें हुईं और भारत ने लगभग डेढ़ सौ पाकिस्तानी लोगों की एक सूची उन्हें सौंपी है जिनकी रिहाई की पेशकश की गई है.

इस बाबत उन्होंने बताया कि इन पाकिस्तानियों की राष्ट्रीयता का प्रमाण मिलने और रिश्तेदारों का पता मिलने के बाद इनकी वापसी की तैयारी की जाएगी.

सरबजीत एक नहीं है..

पाकिस्तान की जेलों से 35 बरस बाद भारतीय क़ैदी कश्मीर सिंह की रिहाई के बाद आलोचनाओं का सामना कर रहे बर्नी बताते हैं कि पाकिस्तान से कश्मीर सिंह की रिहाई, बदले में उसका यह कहना कि वो एक जासूस था और जब वो ज़िंदा भारत आ रहा था, तब एक पाकिस्तानी क़ैदी का शव उस तरफ जा रहा था. इन बातों से वो कुछ समय के लिए विचलित भी हुए थे.

सरबजीत की रिहाई की मांग
भारत में सरबजीत की रिहाई का मुद्दा सुर्खियों में रहा है

वो कहते हैं, "यह रिहाई का मसला भारतीयों और पाकिस्तानियों का नहीं है. किसी धर्म या मजहब का नहीं है. न ही इस तरह का है कि हमने आपके इतने रिहा किए तो आपने बदले में क्या किया. यह मामला है मानवाधिकारों का और अगर कोई सज़ा मानवाधिकारों का अल्लंघन कर रही है तो दोषी को रिहाई दी जानी चाहिए."

बर्नी ख़ासतौर पर मछुआरों की रिहाई को लेकर चिंतित दिखे. उन्होंने कहा कि बाक़ी क़ैदियों से मछुआरों को अलग करके देखा जाना चाहिए क्योंकि समुंदर में कोई दीवार तो है नहीं जिसके पार वो न जा सकें. ग़लती से अगर कोई किसी की सीमा में आ जाए तो उसे खानदान तक को मिटा देने के बजाय लौटा देना ज़्यादा बेहतर विकल्प है.

क़ैद और रिहाई के पीछे के सियासी खेल और आपसी दुराभाव का ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं कि अगर इसी तरह पानी में मछली पकड़ने उतरे लोगों को क़ैद करना है तो फिर समुंदर में दीवार क्यों नहीं बना देते, मछलियों को पासपोर्ट क्यों नहीं जारी कर देते.

बर्नी बार-बार इस बात का हवाला देते रहे कि एक सरबजीत की रिहाई से कुछ ख़ास नहीं होना बल्कि क़ैदियों को लेकर दोनों ओर के रुख़ बदले जाने चाहिए. उन्होंने पाकिस्तान की नई व्यवस्था में इस बाबत गुंजाइश दिखाई देने की बात कही और साथ ही भारत सरकार से और जानकारियों के आदान-प्रदान की अपील की.

....पर दोनों ओर के सियासी पैतरों में सरबजीत की ज़िंदगी अभी भी यही पूछ रही है कि क्या वो वतन लौट सकेगी. क्या अपराध किया भी हो तो उसकी सज़ा वो भुगत नहीं चुका और क्या होगा बाक़ी के लोगों का. जिनकी बहनें उनका इंतज़ार कर रही हैं, जिनके मां-बाप अब कम देख पाते हैं और जिनके सिर पर किसी ने बरसों से हाथ नहीं फेरा.

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