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मिलीजुली है प्राथमिक शिक्षा की हालत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा की हालत पर हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ बिहार में पिछले चार साल से अधिक बच्चे स्कूल जा रहे हैं. वहाँ 2005 में 13 फ़ीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, 2008 में यह संख्या घटकर 5.7 फ़ीसदी रह गई है. बिहार ने जो सुधार किया उसे उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों ने कुछ हद तक खो दिया. परिणाम यह हुआ कि स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या वहीं की वही रह गई है. सर्वेक्षण के नतीजे शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे एक ग़ैर सरकारी संगठन 'प्रथम' की निदेशक रुक्मणी बनर्जी कहती हैं कि ग्रामीण भारत के सात लाख बच्चों और तीन लाख तीस हज़ार घरों के सर्वेक्षण में मिले आंकड़े एक कड़वी सच्चाई बयान करते हैं. बच्चे स्कूल तो जा रहे हैं पर वे पढ़ लिख नहीं पा रहे हैं. वे गणित के आसान सवाल भी नहीं सुलझा पा रहे हैं. इस मामले में मध्य प्रदेश, छ्त्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश ने ज़रूर अपने आंकड़ों में बुहत सुधार किया है. प्रथम की निदेशक रुक्मणी बनर्जी कहती हैं कि पढ़ने और गणित के सवाल हल करने के मामले में पिछले साल की तुलना में मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ ने काफी सुधार किया है. इनमें पढ़ने और गणित के सवाल हल करने के मामले में 20-21 फ़ीसदी सुधार आया है. वे कहती हैं कि देश के अन्य राज्यों के ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों में ऐसा सुधार नहीं आया है. देश में केवल 56 फ़ीसदी बच्चे ही ऐसे हैं जो अपनी कक्षा के अलावा दूसरे कक्षा की किताबों को धाराप्रवाह रूप में पढ़ लेते हैं. मध्य प्रदेश में पाँचवी में पढ़ने वाले 77 फ़ीसदी बच्चे गणित के आसान सवाल हल कर लेते हैं. वहीं केरल में ऐसे बच्चों की संख्या क़रीब 44 फ़ीसदी है. इस प्रगति से खुश मध्य प्रदेश की शिक्षामंत्री अर्चना चिटनिस कहती हैं आज से पाँच साल पहले मध्य प्रदेश में प्राथमिक शिक्षकों के बहुत से पद खाली थे. जिसे सरकार ने भरा है. इससे राज्य में प्राथमिक शिक्षा के स्तर में काफ़ी सुधार आया है. बेहतर मध्य प्रदेश चिटनिस कहती हैं, "हमारा निगरानी तंत्र बहुत बढ़िया है. हम प्राथमिक शिक्षा के आदर्श स्तर को पाना चाहते हैं. हमारा प्रयास है कि मध्य प्रदेश की धरती पर पैदा होने वाला हर बच्चा स्कूल जाए. एक भी बच्चा ऐसा न हो जो स्कूल जाए और वह भाषा और गणित में किसी तरह कमज़ोर हो." मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 60 फ़ीसदी बच्चे पहली कक्षा की क़िताब पढ़ पाते हैं. जबकि यह आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर पर इससे भी कम है. देश के 61 फ़ीसदी बच्चे घड़ी देखना जानते हैं. यानी स्कूल जाने वाले बच्चे साक्षर तो हो रहे हैं शिक्षित नहीं. 'प्रथम' की निदेशक रुक्मणी बनर्जी कहती हैं कि इसके लिए सबको मिलकर मजबूत प्रयास करना होगा क्योंकि यह राष्ट्रीय मुद्दा है. अगर हम चाहते हैं कि देश का पूरा विकास हो तो जितने बच्चे स्कूल में हैं इससे काम नहीं चलेगा. वे कहती हैं कि बच्चों को उनके माँ-बाप ने स्कूल पहुंचा दिया है. ऐसा देखा गया है कि जो बच्चा ठीक से पढ़ता है, वह स्कूल कभी नहीं छोड़ता है. अब यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उन्हें बेहतर शिक्षा दें. यह कोई ऐसी समस्या नहीं है कि जिसका समाधान न हो. इसका समाधान हम सबके हाथ में है. केंद्र सरकार ने 2004 से 2007 के बीच 35 हज़ार करोड़ रुपए प्राथमिक शिक्षा पर ख़र्च किए हैं. क्या उसका यह सही इस्तेमाल है. इस बात पर भी सवाल उठ रहे हैं आंकड़ों की हेराफेरी सवाल आंकड़ों में हेरा-फेरी का भी है. यह भी देखा गया है कि जबसे स्कूलों में मिड-डे-मील योजना शुरू हुई है या फिर यह तय किया गया है कि हर चालीस बच्चों पर एक शिक्षक होगा. राज्यों के आंकड़ों में हेर-फेर होने लगी है. बिहार के मानव संसाधन विकास मंत्री हरिनरायण सिंह इससे इनकार करते हैं. वह कहते है कि ऐसी बात नहीं कि शिक्षकों की नियुक्ति के लिए छात्र-छात्रों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई है. वह कहते हैं कि स्कूलों की दशा और दिशा में सुधार आया है और लोगों का स्कूलों के प्रति नज़रिया भी बदला है. लोग स्कूलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं. आंकड़े सरकारी ही नहीं बल्कि निजी स्कूलों के भी ऐसे ही हैं. इसलिए अब समय आ गया है कि आंकड़ों से इतर बेहतर शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाए. |
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