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अपना रास्ता बनाते वरदान और अंकिता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वरदान और अंकिता काबरा उन खुशकिस्मतों में से हैं जिन्हें अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान या आईआईएम में पढ़ने का मौक़ा मिला. ये एक ऐसा संस्थान है जिसका नाम किसी के भी नाम से जुड़ने के बाद आपके लिए दुनिया भर के रास्ते खुल जाते हैं. इनमें से ज्यादातर रास्ते बड़ी-बड़ी कंपनियों के दफ़्तर की तरफ जाते हैं, लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो अपना रास्ता ख़ुद बनाते हैं. क्योंकि वे कुछ अलग करना चाहते हैं, उनकी अभिलाषाएं कुछ अलग होती हैं. वरदान और अंकिता काबरा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. कल के सहपाठी आज पति-पत्नी हैं और गुजरात राज्य के सूरत ज़िले में ‘फाउंटेनहेड’ नाम से कक्षा एक तक के बच्चों के लिए प्री-स्कूल चलाते हैं. उन्होंने लाखों रुपए की नौकरियां ठुकराईं ताकि वे समाज को कुछ दे सकें. वरदान कहते हैं कि उनके विद्यालय में हर वर्ग के परिवार के बच्चे पढ़ते हैं, चाहे वो मध्यवर्गीय परिवार का हो या फिर कोई ग़रीब परिवार का. अठ्ठाईस साल के वरदान काबरा कहते हैं कि उन्हें हमेशा लगता रहा कि विद्यालयों में जिस तरह की पढ़ाई होती है, वहां बच्चों की क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता है. वो कहते हैं,''मैं हमेशा से ही शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करना चाहता था. लेकिन ऐसी सोच का श्रेय मैं आईआईएम के पूर्व विद्यार्थी और विज़िटिंग फ़ैकल्टी प्रोफेसर सुनील हांडा को दूंगा जो ‘एकलव्य’ नाम से एक विद्यालय चलाते हैं.'' वरदान कहते हैं,'' आईआईएम में पढ़ाई के दौरान ही हमने पढ़ाई से जुड़े मुद्दे को लेकर एक छोटा सा समूह भी बनाया था. कोर्स ख़त्म होते-होते सिर्फ़ मैं और अंकिता ही इस समूह में बचे थे. मुझे विद्यालय खोलने में व्यापार का मॉडल नज़र आया.'' लेकिन सोच को हक़ीकत में बदलना आसान नहीं था. लंबा सफ़र वरदान कहते हैं कि आईआईएम में ही उन्होंने विद्यालय खोलने का सपना संजोना शुरू कर दिया था. वरदान और अंकिता ने करीब 30 विद्यालयों का दौरा किया.
जब कैम्पस सेलेक्शन हुआ तो उन्होंने उसमें हिस्सा नहीं लिया. इस पर दोस्तों औऱ अन्य छात्रों में मिली जुली प्रतिक्रिया हुई, हालांकि शिक्षकों ने उनका भरपूर साथ दिया और उत्साह बढ़ाया. जब पैसे जुटाने की बात आई तो परिवार और मित्रों ने उनकी सहायता की. उन्होंने क़रीब 14 लाख रुपए इकट्ठा कर विद्यालय की शुरुआत की. अंकिता कहती हैं कि उन्होंने सूरत को चुना क्योंकि सूरत में स्कूल चलाने के लिए ज्यादा निवेश की ज़रूरत नहीं थी. साथ ही साथ, उन्हें सूरत में प्री-स्कूलों की भी ज़रूरत महसूस हुई. वरदान और अंकिता का नज़रिया शुरूआत से ही साफ़ था. उन्हें पता था कि उन्हें धन की आवश्यकता होगी और वे कोई गै़र-सरकारी संस्था नहीं चला रहे हैं. वरदान कहते हैं कि हालांकि उनका उद्देश्य समाज को कुछ वापस देना औऱ शिक्षा को बढ़ावा देना था, पर वे ऐसा बिज़नेस मॉडल चाहते थे जिससे वे अपने काम को बरकरार रख सकें. तभी शायद विद्यालय के हर बच्चे की मासिक ट्यूशन फीस दो हज़ार रुपए है. अलग मकसद अंकिता कहती हैं,'' हमारा मकसद समाज सेवा के साथ पैसा कमाना भी है, क्योंकि ये महत्वपूर्ण है.'' वरदान कहते हैं कि अगले साल उनके विद्यालय का ‘टर्नओवर’ 40 से 45 लाख रुपए तक पहुंच जाएगा. वरदान कहते हैं कि उनका शुरुआती निवेश उन्हें पहले ही वापस मिल चुका है. तो आखि़र कितना अलग है ये विद्यालय दूसरे विद्यालयों से? वरदान कहते हैं कि उनके विद्यालय में बच्चों को अलग तरह से सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है, और उनकी सोच को निखारा जाता है. बच्चों को सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं किया जाता, उन्हें कक्षाओं के बाहर ‘फ़ील्ड ट्रिप्स’ पर ले जाया जाता है, ताकि बच्चे देखें और सीखें. यानि खेल-खेल में ही बच्चे बहुत कुछ सीख जाते हैं. वरदान ने एक कारोबारी के साथ गठजोड़ किया है और ज़मीन खरीदी है जिस पर वे कक्षा पांच तक का एक विद्यालय बनाने की योजना बना रहे हैं. उनका लक्ष्य कक्षा बारह तक के विद्यालय बनाने का है. अंकिता और वरदान के लिए शुरूआती दिन मुश्किलों से भरे थे, लेकिन उनके इरादे पक्के थे. उन्हें पता था कि उनकी राह में मुश्किलें आएंगी, क्योंकि वे कुछ अलग करने की चेष्टा कर रहे थे. उन्होंने बच्चों के अभिभावकों से बात की, उनकी ज़रूरतों को समझने की कोशिश की, उन्हें समझाया कि वे क्या करना चाहते हैं. उनकी मेहनत का नतीजा सबके सामने है. |
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