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'ईमानदारी के दुकान' की नीयत पर सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाक़े के कई सरकारी स्कूलों में पिछले कुछ समय से ‘ईमानदारी की दुकान’ चलाई जा रही है. इसके तहत स्कूल के किसी कमरे या बरामदे में एक बड़े से डिब्बे के अंदर बच्चों के काम में आने वाली स्लेट-पेंसिल, कॉपी-कलम, रबर, कटर आदि रख दिए गए हैं और डिब्बे के ऊपर इन सामानों की क़ीमत लिख दी गई है. जिस किसी भी बच्चे को इसमें से कोई सामान लेना होता है, वह निर्धारित क़ीमत डब्बे में डाल कर सामान ले सकता है. जाहिर है, बच्चों पर भरोसा करते हुए, इस ‘ईमानदारी की दुकान’ की कोई निगरानी नहीं की जाती. यहाँ तक कि शाम को सामानों की बिक्री का हिसाब-किताब भी स्कूल के बच्चों के ही हवाले है. ज़िला प्रशासन का मानना है कि इस तरह की ‘ईमानदारी की दुकान’ से बच्चों को नैतिक शिक्षा तो मिलती ही है, स्कूल में ही उनकी ज़रुरत के सामान भी उपलब्ध हो जाते हैं और इसे बेचने के लिए एक आदमी की ड्यूटी लगाने की ज़रूरत नहीं होती. राजीव गांधी शिक्षा मिशन के परियोजना संचालक सीआर प्रसन्ना कहते हैं, “अभी बस्तर के तीन विकास खंडों में इस तरह की लगभग सौ ईमानदारी की दुकानें चल रही हैं और जिस तरह की सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आ रही हैं, उससे हम चकित हैं.” प्रसन्ना के अनुसार अगले दो महीनों में बस्तर के सभी स्कूलों में इस तरह की ‘ईमानदारी की दुकान’ खोलने की योजना बनाई जा रही है. एतराज़ ऐसा नहीं है कि इन दुकानों को लेकर केवल सकारात्मक प्रतिक्रिया ही आ रही है. राज्य के कई राजनेताओं और संगठनों ने आदिवासी बहुल बस्तर ज़िले में इस तरह की ‘ईमानदारी की दुकान’ खोले जाने पर कड़ा एतराज़ जताया है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की राय है कि इस तरह की दुकान खोलने से आदिवासियों में गलत संदेश जाएगा. जोगी के अनुसार सरलता और ईमानदारी आदिवासियों के जन्मजात गुण हैं, उन्हें इस तरह की दुकानों से ईमानदारी सीखने की जरुरत नहीं है. आदिवासियों के बीच लोकप्रिय संगठन राष्ट्रीय गोंडवाना पार्टी के राष्ट्रीय सचिव रंजन सारखेल इस योजना की वैधता को ही चुनौती देते हुए कहते हैं, “जो सामान इस ‘ईमानदारी की दुकान’ में बेचे जा रहे हैं, वह सब कुछ तो आदिवासी बच्चों को मुफ्त में उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान है.” उनका आरोप है कि बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे सरकारी अभियान के कारण अधिकांश स्कूल बंद हैं. हजारों स्कूलों में न तो शिक्षक हैं और न ही पढ़ने वाले बच्चे. ऐसे में सरकार इस तरह की ‘ईमानदारी की दुकान’ कागजों पर चला कर केवल ध्यान बँटाने का काम कर रही है. सामाजिक कार्यकर्ता ज़ुलेखा ज़बी कहती हैं- “सरकार को अगर ‘ईमानदारी की दुकान’ चलाना है तो इसकी शुरुआत राजधानी रायपुर के स्कूलों से की जानी चाहिए. आदिवासी स्कूलों से इसकी शुरुवात करके सरकार आदिवासियों को बेईमान साबित करने पर तुली हुई है.” |
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