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क़ब्रों के बीच चल रहा है स्कूल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार के कैमूर ज़िले के कोहारी गाँव में एक ऐसा स्कूल है जहाँ बच्चे दो सौ साल पुराने क़ब्रिस्तान की क़ब्रों के बीच शिक्षा प्राप्त करते हैं. मुर्दों की इस बस्ती में पढ़ाई कभी-कभी डरावने सपनों का कारण बनती है, फिर भी ये बच्चे स्कूल छोड़ने को तैयार नहीं होते. एक तो इस विद्यालय के अलावा उनके पास दूसरा विकल्प नहीं है वहीं इस स्कूल के कुछ बच्चों और अभिभावकों का मानना है कि अगर बच्चे स्कूल जाना छोड़ दें तो उन्हें सपनों में आने वाले जिन्नों की नाराज़गी का शिकार होना पड़ सकता है. गाँव के लोगों ने 1956 में उर्दू प्राथमिक विद्यालय स्थापित किया था. क़ब्रिस्तान वाला मकतब के नाम से मशहूर इस स्कूल से दूर-दूर तक कोई दूसरा स्कूल नहीं था. शिक्षा के प्रति सजग लोगों ने स्कूल बनाना तो तय कर लिया लेकिन कोई भी इसके लिए अपनी ज़मीन देने को तैयार नहीं था. आख़िर में स्थानीय कमेटी ने क़ब्रिस्तान की ज़मीन का एक हिस्सा स्कूल के नाम कर दिया. बढ़ते छात्र 50 सालों के बाद छात्रों की संख्या में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है लेकिन आज तक स्कूल में दो कमरे ही हैं. आज यहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के दो सौ से ज़्यादा बच्चे हैं. जगह की कमी के करण आधे से ज़्यादा बच्चे क़ब्रिस्तान में पेड़ के नीचे पढ़ाई करते हैं.वे यहाँ सिर्फ़ पढ़ते ही नहीं बल्कि लंच के अलावा खेल-कूद भी क़ब्रिस्तान में ही करते हैं.
क़ब्रिस्तान में घंटों बिताना कभी-कभी इन मासूम बच्चों के लिए ख़ौफ़ का कारण भी बनता है. मुर्दों को दफ़्न होते देख कई बार कुछ बच्चे डर जाते हैं या डरावने सपने देखते हैं. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि आज तक किसी भी अभिभावक ने अपने बच्चे को क़ब्रिस्तान के ख़ौफ़ के कारण स्कूल से नहीं हटाया. कई स्कूली बच्चों का कहना है कि अगर वे स्कूल आना छोड़ दें तो उन्हें डरावने सपने दिखते हैं और उसमें अंजान चेहरा समय पर स्कूल पहुँचने की हिदायत देता है. डरावने सपने कक्षा चार में पढ़ने वाले नौ वर्ष के रवि कुमार ने कहा, “मैं बराबर सपने में एक ऐसे आदमी को देखता हूँ जो बहुत लंबा है और सफ़ेद कपड़े में है.उसकी दाढ़ी भी काफ़ी लंबी है और वह मुझसे कहता है कि मैं सुबह समय पर स्कूल आने में देर नहीं करूं. इसके बाद मैं अक़्सर डर कर जाग जाता हूँ.”
रवि का कहना है, “मैं सपना देख कर एक बार कफ़ी डर गया और कुछ दिनों तक बीमार रहा. फ़िर भी मैं यह स्कूल नहीं छोड़ सकता क्योंकि अगर मैं ऐसा करूँगा तो सपने वाले मौलाना साहब मुझे हर रात आकर डरायेंगे.” गाँव के लोगों में यह धारणा बन गई है कि अगर कोई बच्चा बीमार पड़ जाए तो यह मान लिया जाता है कि उस बच्चे ने क़ब्रों की तौहीन की होगी या उस पर चप्पल पहनकर चढ़ गया होगा. हालाँकि गाँव के कई लोग सपनों की बातों को तरजीह नहीं देते और इसे मासूम बच्चों की भावनाओं की मनोवैज्ञानिक परिणति बताते हैं. हल स्थानीय बुज़र्ग निवासी मोहम्मद जमाल का कहना है, “आप हमारा जज़्बा देखें. हमने शिक्षा के प्रति अपनी सजगता दिखाई और क़ब्रिस्तान में भी जगह मिली तो वहीं स्कूल खोल दिया और आज सैकड़ों बच्चे इसका फ़ायदा उठा रहे हैं. इसलिए सरकार को इस ओर ध्यान देने चाहिए.” स्कूल के संबंध में गाँव वालों की सरकार से अनेक शिकायतें भी हैं.विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष अयूब अंसारी कहते हैं, “हमने कई बार ज़िला शिक्षा अधीक्षक से अपनी समस्याएँ रखी लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ.' उधर ज़िला शिक्षा अधीक्षक एए ख़ान विद्यालय के लिए अतिरिक्त भवन के लिए धन मुहैया कराने पर सहमत हो गए हैं. उन्होंने कहा, “हम स्थानीय लोगों से माँग करते हैं कि वे विद्यालय के लिए कुछ और भूमि आवंटित करें. जैसे ही भूमि हासिल हो जाएगी हम स्कूल के अतिरिक्त भवन के लिए दस लाख रुपए जारी कर देंगें.” | इससे जुड़ी ख़बरें स्कूल में झड़प,एक चरमपंथी की मौत26 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस मुसलमानों के लिए आधुनिक शिक्षा योजना30 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस नर्सरी स्कूलों में बच्चों का इंटरव्यू नहीं17 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस बच्चों के सामने पहाड़-सी ज़िंदगी08 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'अंग्रेज़ी स्कूल बंद होंगे, पुनर्विचार नहीं'23 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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