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बच्चों के सामने पहाड़-सी ज़िंदगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"अब मैं स्कूल नहीं जाता. पिछले साल इसी महीने में मेरी दसवीं की बोर्ड परीक्षा थी. 10 अक्तूबर को उर्दू का इम्तिहान था लेकिन उससे पहले ही ज़लज़ला आ गया और मेरी सारी किताबें मलबे में दब गईं." शऊर अहमद उन बहुत से बच्चों में से एक था जिनको पिछले साल आए भूकंप ने कई ग़म एक साथ दिए. एक ओर पढ़ाई छूट गई और दूसरी ओर उसने अपने पिता को भी खो दिया. वो याद करता है, "फिर मार्च में दोबारा परिक्षा हुई मैंने सभी विषयों की परिक्षा दी लेकिन सिर्फ उर्दू में पास हुआ. अब मैं घर पर ही रहता हूँ." शाहदरा माध्यमिक हाई स्कूल में शिक्षक मुबारक हुसैन का कहना था कि कई बच्चों की किताबें भूकंप के मलबे में दब गईं. वे कहते हैं, "इस तबाही की वज़ह से लोग इतना घबरा गए कि कोई इन बच्चों के लिए बारामूला या श्रीनगर से किताबें भी नही ला सके. इससे बच्चे पढ़ नहीं पाए और ज़्यादातर फ़ेल हो गए." जम्मू-कशमीर बोर्ड ऑफ़ स्कूल एजुकेशन में सयुक्त सचिव नकाश कहते हैं कि दसवीं और बारवीं के बच्चों की बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष प्रशिक्षण कैंप लगाए गए. उनकी परिक्षाएँ मार्च के अंत मे शुरू हुईं और अप्रैल में समाप्त हुईं. भूकंप प्रभावित इलाक़ों के 3000 बच्चों ने दसवीं का इम्तिहान दिया, जिसमें से केवल 18 प्रतिशत ही पास हो पाए. वहीं लगभग एक हज़ार बच्चों ने बारहवीं की परीक्षा दी और केवल 20 प्रतिशत ही पास हो पाए. पिछले साल आए भूकंप की छाप अभी भी बच्चों के जेहन में तरोताज़ा है. आठवीं की अँग्रेजी विषय की परीक्षा देने आई नफीसा कहती है, ‘‘पढ़ाई में मन बहुत मुशिकल से लगता है. हर समय यही डर लगता रहता है कि भूकंप दोबारा न आ जाए.’’ नौवीं में पढ़ रही रुबीना कहती है कि वह कई बार नींद में सिहर जाती है कि वो भयावह मंजर दोबारा न देखने को मिले. शिक्षका बनने की चाह रखने वाली रुबीना को ये मलाल है कि भूकंप के कारण स्कूल सही समय से शुरू नहीं हुआ जिसके कारण उसकी पढ़ाई ठीक नहीं हो पाई और उसका एक साल भी बर्बाद हो गया. मायने बदल गए आठ अक्तूबर, 2005 की सुबह आए जलजले ने लोगों के लिए ज़िदगी के मायने ही बदल दिए. इस तबाही ने किसी का घर छीन लिया तो किसी के सिर से माँ-बाप का साया. इस भूकंप ने 950 मासूमों की जान ले ली. भूकंप में अपने पिता को गंवा चुका तनवीरा उस मंजर को याद करके रुँआसा हो जाता है. छठी में पढ़ रहा तनवीरा कहता है कि उस दिन वह स्कूल में था जैसे ही भूकंप आया वो अपनी माँ के पास घर भागा. घर में माँ, भाई और बहन सब मिले लेकिन पिता नहीं थे. अब घर का ख़र्च कैसा चलेगा यही सवाल इस नन्हें बच्चे के दिमाग में घूमता रहता है.
इस हादसे में 409 बच्चे अपने माँ या बाप में से एक को गंवा चुके हैं. 20 बच्चे ऐसे हैं जिनके सिर से माँ-बाप दोनों का ही साया उठ गया है. कई ग़ैर- सरकारी संस्थाएँ इन यतीम बच्चों की मदद भी कर रही है. कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर बशारत अहमद का कहना है कि सरकार इन 20 अनाथ बच्चों को पाँच लाख रुपए देगी और जिसने केवल माँ या बाप खोया है उसे ढाई लाख रुपए दिए जाएंगे. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के कार्यालय से 303 बच्चों को पैसे देने की कागज़ी कार्रवाई पूरी की जा चुकी है और इन पैसों का ग़लत इस्तेमाल न हो इसके लिए ये रुपए फिक्सड डीपॉज़िट के तौर पर जम्मू-कश्मीर बैंक मे रहेंगे और बच्चों को इन जमा रुपयों से आ रहा ब्याज दिया जाएगा. इन बच्चों के सामने पूरी ज़िंदगी अभी बाक़ी है. साल गंवाने का असर इन बच्चों पर अरसे तक रहेगा. लेकिन जो मानसिक और शारीरिक संघर्ष का लंबा दौर इनके सामने बाक़ी है उससे जूझने के लिए वे समाज की ओर देख रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें भूकंप के साल भर बाद भी मदद का इंतज़ार08 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'नष्ट हुए हज़ारों स्कूल अब भी वैसे ही'07 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस पुनर्निर्माण कहीं कम कहीं ज्यादा06 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस भूकंप सहायता राशि चरमपंथियों के हाथों में05 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'लाखों भूकंप पीड़ित अभी भी तंबुओं में'04 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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