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पुनर्निर्माण कहीं कम कहीं ज्यादा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत प्रशासित कश्मीर में पिछले वर्ष आठ अक्तूबर को आए भूकंप में अपना सब कुछ गंवा चुके लोग एक साल बाद भी अपनी बिखरी हुई ज़िदगी को फिर से सहेजने की जद्दोजहद में लगे हैं. उड़ी से 16 किलोमीटर दूर दाची गाँव में मजदूर एक नवनिर्मित मकान की लिपाई-पुताई कर रहे हैं. ये मकान एक ग़ैर-सरकारी संगठन यानी एनजीओ ‘सेव ए चाइल्ड’ ऐसे स्थानीय लोगों के लिए बना रहा है जिनके मकान पिछले साल आठ अक्तूबर को आए भूकंप में तबाह हो गए थे. गत कई महीने से दाची गाँव में डेरा जमाए 'सेव ए चाइल्ड' के कंस्ट्रक्शन मैनेजर आरके सिंह ने कहा कि उनका संगठन इस गाँव में भूकंप प्रभावितों के लिए 310 मकान बना रहा है. उनके अनुसार अभी तक सौ मकान बनकर तैयार हो गए हैं और शेष का निर्माण कार्य जारी है. इसके इस महीने दिवाली तक पूरे हो जाने के आसार हैं. भूकंप प्रभावित क्षेत्र में दाची जैसे एक-दो गाँव ही हैं, जहाँ मकानों के पुनर्निर्माण का ज़िम्मा किसी एनजीओ ने लिया हो. यहाँ से निकलकर जब मैं कमलकोटे क्षेत्र के सरायबंदी गाँव पहुँचा तो एक सरकारी अस्पताल का पुनर्निर्माण चल रहा था. स्थानीय लोगों ने बताया कि यहाँ भूकंप में एक भी मकान नहीं बचा लेकिन अब तक एक भी मकान को फिर से नहीं बनाया गया है. यहाँ साल भर बाद भी लोग टीन से बने अस्थायी मकानों में रह रहे हैं, जो सरकार ने भूकंप के तुरंत बाद बनवाए थे. मुआवज़ा सरकार ने भूकंप प्रभावित लोगों के मकानों के पुनर्निर्माण के लिए एक लाख रुपए देने की घोषणा की थी. इसमें से 40 हज़ार पिछले वर्ष ही जारी कर दिए गए थे और शेष 60 हज़ार रुपए निर्माण कार्य शुरू होने के बाद दो किस्तों में देने का फ़ैसला हुआ था. एक स्थानीय नागरिक नफ़ीस हुसैन ने बताया, "जो चालीस हज़ार मिले थे वो सर्दियों के मौसम में खाने-पीने में खत्म हो गए." कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर बशारत अहमद डार का कहना है कि यही कारण है कि सरकार ने एक साथ सारे पैसे नहीं जारी किए थे. उनके अनुसार, "सरकार की मंशा ये थी कि लोग वास्तव में ढंग से घर बनाए. पहले चालीस हज़ार दिए गए और शेष दो किस्त भी दिए जाएँगे लेकिन ये उन्हीं लोगों को दिए जाएंगे जिनके मकान नींव से ऊपर तक बन गए हैं." अहमद डार ने कहा कि मुझे लगता है कि अक्तूबर के आखिर तक दूसरा और तीसरा किस्त जारी कर दिए जाएँगे. हालात सरायबंदी की एक पढ़ी-लिखी लड़की नगीना से जब मैंने पूछा कि इस गाँव के लोग ख़ुद अपनी मदद करने का हौसला क्यों नहीं दिखाते तो वह बोलीं, "अब हमारे पास कोई हौसला तो रहा नही. ज़िंदगी भर की मेहनत के बाद जो कुछ भी था वो सब तो जलजले में चला गया. अब हमसे जो कुछ बन पाता है वही करते हैं." लेकिन तंगदार क्षेत्र की कहानी उड़ी के एकदम विपरीत है. यहाँ अधिकतर लोगों ने सरकारी सहायता की प्रतीक्षा किए बिना ही अपने मकान बना डाले हैं या फिर बना रहे हैं. चित्रकूट के गाँव ने तो रिकॉर्ड ही स्थापित कर डाला है. इस क्षेत्र के लोग बताते हैं कि यहाँ 90 प्रतिशत मकान दोबारा बनकर तैयार हो चुके हैं. एक स्थानीय नागरिक मंज़ूर खान ने बताया, "हम लोगों को सर्दियों में काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा इसलिए औरतों और मर्दों ने मिलकर किसी तरह गुजारे लायक मकान बना लिए." उन्होंने कहा कि यहाँ एक मकान बनाने में सात-आठ लाख रुपए लगते हैं इसलिए हमने इसे ऊपर से ढक कर रहने लायक बना लिया है. टीटवाल के निवासी शीन खान कहते हैं, ‘‘जिसके पास पैस है वो मकान बनाते हैं.’’ अन्य गाँवों के लोग नए मकानों में रहकर प्रसन्न नजर आ रहे हैं लेकिन आज भी ऐसे अनेक लोग हैं जो भूकंप में खो चुके अपने परिजनों की याद में रो रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें पाकिस्तान के लिए नई पुनर्निर्माण योजना20 मई, 2006 | भारत और पड़ोस अभी भी बच्चों में भूकंप का ख़ौफ़02 मई, 2006 | भारत और पड़ोस मृतकों की संख्या 73 हज़ार से ज़्यादा02 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'मदद न मिली तो और लोग मर सकते हैं'19 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस एक बड़ा कब्रिस्तान बन गया बालाकोट11 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस दुनिया भर से मिल रही है सहायता10 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस पाकिस्तान में भूकंप से तबाही, हज़ारों हताहत08 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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