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एक बड़ा कब्रिस्तान बन गया बालाकोट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैं पहली बार 1987 में बालाकोट गया था, अपने एक भाई के साथ. मक़सद था एक कब्र की तलाश, मेरी अपनी बस्ती के एक व्यक्ति एक ऐतिहासिक लड़ाई में 1831 में बालाकोट मारे गए थे, उन्हीं की कब्र ढूँढने हम वहाँ पहुँचे थे. मुझे काफ़ी तलाश के बाद वह कब्र तो नहीं मिली, इस सिलसिले में मैंने जब बालाकोट के लोगों से जानकारी चाही तो महसूस हुआ कि उनकी इतिहास में कोई दिलचस्पी नहीं है. इसके बाद पिछले वर्ष मैं नारान जाते हुए बालाकोट में चाय पीने के लिए रूका, कुन्हार नदी के किनारे बसा हुआ यह शहर मुझे काफ़ी गंदा सा लगा. तीसरी बार मैं बालाकोट गया, रविवार को. शनिवार को आए भूकंप ने कितनी तबाही मचाई है इसका जायज़ा लेने के लिए. बालाकोट जाने वाली सड़क चट्टानों से पट चुकी थी और पूरी तरह से बंद थी, मैंने किसी तरह पैदल ही दूसरी ओर पहुँचा.
मेरे सामने एक पुल था जिस पर लकड़ी का एक झूलता हुआ पुल था, ऐसा लगता था कि अब कुन्हार नदी में गिर जाऊँगा. अभी मैं इस डर से उबरता कि सामने से एक जनाज़ा आया, फिर दूसरा और तीसरा... जनाज़े भी क्या थे, लोग चारपाइयों को कंधे पर उठाकर ला रहे थे. जनाज़ों का ताँता लग गया, यूँ लगा कि मैं पुल नहीं पार कर रहा हूँ बल्कि स्थिर खड़ा हूँ और लाशें मेरे सामने से गुज़र रही हैं. इसके बाद मेरे सामने एक कॉलेज की इमारत आई, जो पूरी तरह से ढह चुकी थी, लोगों ने बताया कि इमारत के अंदर जितने लोग थे सब मारे गए, कोई ज़िम्मेदार आदमी नहीं मिला जो उनकी सही तादाद बता पाता.
आगे बढ़ा तो ऊँचाई से पूरा शहर दिखाई दिया, पूरा शहर धराशायी हो चुका था, ठीक वैसे ही लग रहा था जैसा तस्वीरों में एटम बम गिरने के बाद का हिरोशिमा दिखता है. मेरे साथ चलने वाले साहब ने कहा, "कुछ नहीं बचा" और वे रोने लगे, कई और लोग सिसकने लगे. किसी से कुछ कहने पूछने की हिम्मत नहीं पड़ी, मैंने सोचा जानकारी के लिए पुलिस स्टेशन जाना चाहिए. पता चला कि बालाकोट में दो पुलिस स्टेशन थे, दोनों गिर गए हैं. मैं कुन्हार नदी के किनारे खड़ा था, मुझमें कुछ कहने-सुनने की हिम्मत नहीं थी. मैं जिस शहर में एक कब्र की तलाश में आया था वह पूरा शहर ही एक बड़ा सा कब्रिस्तान बन चुका था, मैंने कुदरत की ताक़त के आगे सिर झुकाए बैठा रहा. |
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