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मंगलवार, 25 जुलाई, 2006 को 08:29 GMT तक के समाचार
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संगीत बना पढ़ाई का ज़रिया

बच्चे
बच्चों को संगीत के सहारे पढ़ाने वाले स्कूलों की संख्या बढ़ रही है
मुंबई के कुछ स्कूलों में आजकल बच्चों को संगीत के ज़रिए भूगोल और गणित जैसे कठिन विषय पढ़ाए जा रहे हैं.

शिक्षकों का कहना है कि इससे बच्चों में पढ़ाई की ललक पैदा होती है और वे मस्ती के साथ ही मनोरंजक तरीक़े से पढाई को क़ाफी पसंद करते हैं.

छोटे बच्चों को गाकर पहाड़ा या टेबल पढ़ाना कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन अन्य विषयों की पढ़ाई हमेशा से 'लेक्चर' की तरह रही है.

खासकर साइंस और भूगोल जिसे बच्चों को पढ़ाने और उनके अंदर इस विषय के लिए दिलचस्पी पैदा करना बहुत ही मुश्किल काम था. लेकिन संगीत के ज़रिए पढाने पर इन विषयों में दिलचस्पी देखी जा सकती है.

कोलाबा के जीडी सोमानी स्कूल के प्रिंसिपल एमपी शर्मा कहते हैं, “छोटे बच्चों को हम संगीत के ज़रिए कई विषय सिखाते हैं. संगीत एक अच्छा माध्यम हो सकता है क्योंकि गानों में जो शब्द इस्तेमाल होते हैं उन्हें बच्चे आसानी से समझते हैं.”

दिलचस्पी

बच्चों की दिलचस्पी को देखते हुए इस तरह के स्कूलों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है.

और इससे बच्चों के माँ-बाप भी ख़ुश हैं.

सात वर्ष की गौरी की मां मीना आनंद कहती हैं, “मेरी बेटी गौरी अपने स्कूल को लेकर, अपनी पढ़ाई को लेकर बहुत उत्साहित रहती है क्योंकि उसके स्कूल में पढ़ाने का तरीका बहुत मनोरंजक है.”

अक्षिता सेलारका और केजल सरकार ऐसे ही स्कूल में छोटे बच्चों को संगीत के ज़रिए पढ़ाती हैं. इसके लिए इन दोनों ने एक साल का एएमआई डिप्लोमा भी किया है.

अक्षिता बताती हैं, “बच्चे क़ाफी तेज़ हैं और हर बच्चा इस मॉनटेसरी सिस्टम को पसंद करता है."

शर्ली सिंह बच्चों के साथ
शर्ली सिंह का कहना है कि सिलेबस के आधार पर ही सीडी बनाई जाती है

केजल सरकार कहतीं हैं, “कभी-कभी इन बच्चों को थोडी मदद की ज़रूरत पड़ती है. इन्हें इस तरीके से 'टच एण्ड फील' जैसा एहसास होता है और बड़ी ही लगन से हर बच्चा पढ़ाई करता है.”

जीडी सोमानी स्कूल में बच्चों को इतिहास पढ़ाने के लिए ‘रंग दे बसंती’ फिल्म के गानों का इस्तेमाल किया गया है.

इस तहर के स्कूलों के लिए म्यूजिकल सीडी और किताबें बनाने वाली कंपनी ‘कैंगाबीट’ की निदेशक शर्ली सिंह कहती हैं “आज अभिभावक भी नई चीजों और नए-नए तरीकों के लिए स्कूलों में चक्कर काटते हैं कि कौन सा स्कूल पढ़ाने के लिए कौन सा तरीक़ा इस्तेमाल कर रहा है”.

वो बताती हैं, “इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैंने स्किपी और इसी के इर्द-गिर्द दूसरे कई किरदारों की कहानियाँ लीं और सीडी तैयार किए. हम इस बात का ख़्याल रखते हैं कि विषय उनके स्कूल की किताबों का हो और फिर उसी के आस-पास हम गाने के बोल तैयार करते हैं.”

पेंटिग का प्रयोग

अभिनेता इरफ़ान खान का आठ वर्षीय बेटा भी ‘ट्रिधा’ नामक एक स्कूल में जाता है जहां पढ़ाने के लिए जर्मन सिस्टम का प्रयोग किया जाता है. इनकी पत्नी सुतापा ख़ान के अनुसार, “वे लोग अलग-अलग विषयों को पढाने के लिए पेंटिंग और संगीत का उपयोग करते हैं.”

 कभी-कभी इन बच्चों को थोडी मदद की ज़रूरत पडती है. इन्हें इस तरीके से 'टच एण्ड फील' जैसा एहसास होता है और बड़ी ही लगन से हर बच्चा पढ़ाई करता है.
केजल सरकार

वो कहती हैं, “स्कूल में सामान्य तरीके की पढ़ाई नहीं होती है लेकिन मेरे बेटे को सारी जानकारी है और बड़ी ही उत्सुकता से वह पढ़ाई करता है. स्कूल में इतनी अच्छी तरह से पढ़ाया जाता है कि घर पर इसके दिमाग में पढ़ाई का ज़्यादा बोझ नहीं रहता.”

संगीत का इतिहास हज़ारों वर्ष पुराना होने के बावजूद पहले इसका इस्तेमाल क्यों नहीं हो सका, इस पर मनोचिकित्सक डॉक्टर राजीव जीराज़मानी कहते हैं, “पहले संगीत सिर्फ़ मनोरंजन के लिए था. लेकिन आज संगीत थेरेपी से लेकर याददाश्त बढ़ाने तक हर काम में संगीत को शामिल कर लिया गया है तो पढ़ाई कैसे छूट जाती.”

इन बच्चों में संगीत के ज़रिए पढ़ाई को लेकर बढ़ रही दिलचस्पी को देखकर तो यही लगता है कि आने वाले कुछ ही समय में लगभग हर छोटे-बडे स्कूलों में यही तकनीक इस्तेमाल की जाएगी और अभिभावक भी इसके लिए पूरी तरह से तैयार दिख रहें हैं.

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