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शनिवार, 22 जुलाई, 2006 को 19:19 GMT तक के समाचार
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'महिलाओं के लिए माहौल बदला है'

संघ लोक सेवा आयोग की सदस्य परवीन तल्हा
परवीन तल्हा भारतीय सिविल सेवा में आने वालीं पहली मुस्लिम महिला हैं
परवीन तल्हा भारतीय संघ लोक सेवा आयोग की पहली मुस्लिम महिला सदस्य हैं और ऐसी पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी भी रही हैं जो नॉरकोटिक्स विभाग में उपायुक्त रहीं.

परवीन तल्हा 1969 में भारतीय सिविल सेवा में चुनी गईं थीं और उन्होंने कस्टम और राजस्व विभाग में अहम और चुनौतीं वाले पदों पर काम किया है.

पिछले दिनों वह लंदन आईं तो हमने उनसे मुलाक़ात की. हमने उनसे विभिन्न मुद्दों के साथ-साथ विशेष रूप से संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया के बारे में भी बात की.

अब से क़रीब 38 साल पहले भारतीय सिविल सेवा में जगह बनाना कितना मुश्किल काम था और वो भी एक महिला के लिए.

मैंने 1968 में भारतीय सिविल सेवा का इम्तेहान दिया था. चूँकि इसकी चयन प्रक्रिया एक साल तक चलती है तो 1969 में मेरा चयन हुआ था. मैं सिविल सेवा के ज़रिए भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुनी गई थी. बहुत मेहनत करनी पड़ी थी. परिवार वालों की आकांक्षा थी कि मैं सिविल सेवा में ही जाऊँ. उस समय आज के दौर की तरह कोई कोचिंग वग़ैरा तो नहीं होती थी, आज के दौर में कोचिंग इंस्टीट्यूट की भरमार है. बस दो चार लोग जो इस परीक्षा में दिलचस्पी रखते थे, उन्हीं के साथ मिलजुलकर इम्तेहान दे दिया था. और उस ज़माने में सिर्फ़ दो ही अवसर मिलते थे इस परीक्षा के लिए.

भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर आपको कौन सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

देखिए उस ज़माने में सिविल सेवा में महिलाओं बहुत कम आती थीं और मैंने राजस्व और कस्टम विभाग चुना था. उस विभाग में महिलाएँ और भी कम थीं. जो महत्वपूर्ण प्रभार वाले पद होते थे वे महिलाओं को नहीं दिए जाते थे. और वजह खुल्मखुल्ला ये बताई जाती थी कि आप लड़की हैं इसलिए कुछ ख़ास पद आपको नहीं मिलेंगे. इसके अलावा एक और दलील जाती थी कि आपको कोई अनुभव नहीं है. हमारा रुख़ ये रहा कि अगर कोई काम या पद हमें दिया ही नहीं जाएगा तो अनुभव कहाँ से आएगा. एक अच्छी बात हुई है कि आज के दौर में कोई ये नहीं कह सकता है कि आप लड़की हैं इसलिए कोई ख़ास काम या पद आपको नहीं मिल सकता. मगर जब हमने आहिस्ता-आहिस्ता काम करके दिखाया तो यह बात साबित हुई कि कम किसी भी पद पर काम कर सकते हैं और आगे चलकर हमें वो ओहदे भी मिले जिन पर सिर्फ़ पुरुष ही काम किया करते थे.

संघ लोक सेवा आयोग का मुख्यालय
संघ लोक सेवा आयोग एक स्वायत्त संस्था है

चूँकि आप संघ लोक सेवा आयोग की सदस्य हैं इसलिए चयन प्रक्रिया से जुड़ी हुई हैं. आज की युवतियों को क्या नुस्ख़े देना चाहेंगी कि वे अगर सिविल सेवा में आना चाहें तो क्या रणनीति अपनाएँ.

नुस्ख़े तो क्या हो सकते हैं, मगर एक बात कहना चाहूंगी कि आज का दौर विशेषीकरण का बन गया है. यानी छोटा रास्ता अपनाने की कोशिश की जाती है. मगर संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया में सिर्फ़ किसी एक क्षेत्र की जानकारी ही नहीं देखी जाती, बल्कि देश दुनिया के बारे में सामान्य जानकारी के साथ-साथ पूरे व्यक्तित्व को भी परखा जाता है. इसलिए सिविल सेवा में आने के लिए आपको एक क़िस्म का ऑलराउंडर होना है.

अर्थव्यवस्था खुलने और वैश्वीकरण के बाद नौकरियों का रंग रूप बदल गया है. अब भारत में रहकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में मोटी तनख़्वाह में काम किया जा सकता है. एक तरह से टैक्नोक्रेट युग आ गया है. ऐसे में भारतीय सिविल सेवा का कितनी प्रासंगिकता है?

पहले जनसंख्या का एक ऐसा तबका था जो सिविल सेवा की प्रतिष्ठा की वजह से इसमें आना चाहता था. उस तबके को अच्छी सुविधाएँ हासिल होती थीं इसलिए वे अच्छे संस्थानों में पढ़ाई और कोचिंग करके इसमें आ जाता था लेकिन अब परिस्थितियाँ बदलने के बाद वह तबका सिविल सेवा से अलग हटा हुआ नज़र आता है. लेकिन अब एक और तबका सिविल सेवा में आना शुरू हो गया है और यह तबका उतना अमीर नहीं है. यह निम्न मध्यमवर्ग से है इसलिए सिविल सेवा में इस तबके के लोगों की संख्या बढ़ने से एक तरह से इस सेवा का दायरा बढ़ा ही है.

आप चूँकि मुस्लिम समुदाय से हैं इसलिए यह सवाल ज़रूर पूछेंगे कि मुस्लिम महिलाओं और मुस्लिम युवक-युवतियों के लिए आपका क्या संदेश है.

संदेश तो क्या, बस ये कहना चाहूंगी कि जितनी संख्या में मुस्लिम युवक-युवतियों को सिविल सेवा में आना चाहिए, उतने आते नहीं हैं. देखा ये जाता है कि वे एक दो बार मेहनत करते हैं और हिम्मत हार जाते हैं. उन्हें भरोसा रखना चाहिए कि संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया बिल्कुल साफ़-सुथरी है और उसमें किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता है. हाँ, मुझे एक बात नज़र आती है कि मुस्लिम नेतृत्व की कमी है जो युवक-युवतियों को सही दिशा देने में नाकाम रहता है. यानी जो लोग महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कामयाबी हासिल कर लेते हैं उन्हें चाहिए कि वे पीछे मुड़कर देखें और अगली पीढ़ी को भी कामयाबी हासिल करने के लिए दिशा मुहैया कराएँ. शिक्षा की कमी भी एक अहम मुद्दा है. अगर शुरू से ही अच्छी शिक्षा और व्यक्तित्व विकास होगा तो अच्छी नौकरियाँ मिलने में आसानी होगी.

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