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अभावों के बीच शिखर पर पहुँचे हैं शुभम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के सबसे पिछड़े राज्य समझे जाने वाले बिहार के एक 12 वर्षीय लड़के ने न सिर्फ़ अपने राज्य का नाम रोशन किया है बल्कि यह भी साबित किया है कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो अभाव के बावजूद सफलता के शिखर पर पहुँचा जा सकता है. बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले में रहने वाले 12 वर्षीय शुभम प्रखर ने 'भारत के प्रतिभाशाली बालक' का ख़िताब जीता है. कई दौर की प्रतियोगिता के बाद देश के 16000 स्कूली बच्चों में उनका चयन हुआ. पुरस्कार के रूप में शुभम को एक ट्रॉफ़ी, इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका का सीडी-रॉम, सोने और चाँदी के एक-एक पेन और 10 लाख रुपए का बॉन्ड मिला. यह बॉन्ड छह वर्ष बाद भुनाया जा सकेगा. बीबीसी से एक विशेष बातचीत में शुभम ने कहा, "मैं सिर्फ़ बिहार की बदनामी ही सुनता था, मैंने सोचा कि बिहार के सम्मान के लिए कुछ करना चाहिए." शुभम प्रखर के माता-पिता दोनों बेरोज़गार हैं और उन्हें अपनी पढ़ाई के लिए अपने 'उदार रिश्तेदारों' पर निर्भर रहना पड़ता है. अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित हुई इस प्रतियोगिता की तैयारी के लिए शुभम को इंटरनेट पर निर्भर रहना पड़ा. शुभम के माता-पिता उनकी प्रतिभा से पहले से ही वाकिफ़ थे और उन्होंने चाहा था कि वे शुभम को पढ़ाई के लिए दिल्ली भेज सकें. कमी शुभम के पिता नवीन कुमार और माता अर्चना कुमारी ने बताया कि पैसे की कमी के कारण वे शुभम को पढ़ाई के लिए बाहर नहीं भेज पाए. शुभम के माता-पिता ने 1998 में एक कंप्यूटर संस्थान खोला था लेकिन नुक़सान के कारण उन्हें अपना इंस्टीट्यूट बंद करना पड़ा.
इस समय इस परिवार के आसरा है पैतृक घर. इस घर के किराए से भी उन्हें कुछ आर्थिक सहायता मिल जाती है. जब शुभम पहली क्लास में थे, तभी उनके माता-पिता ने उनके लिए कंप्यूटर ख़रीदा था और उसी समय से शुभम कंप्यूटर का जैसे कीड़ा ही बन गए हैं. शुभम ने अभी तक जितनी भी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है, उन्होंने जीत हासिल की है. शुभम कहते हैं, "मैं जीवन में कभी भी दूसरे स्थान पर नहीं आया हूँ. मैं इसी तरह का बनना भी चाहता था." भारत की प्रतिष्ठित 'इंडियाज चाइल्ड जीनियस' प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए शुभम ने इंटरनेट से ही फ़ॉर्म डाउनलोड किया था. हालाँकि उन्हें फ़ॉर्म डाउनलोड करने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. क्योंकि बिहार में एक तो बिजली की हालत ख़राब है तो दूसरी ओर इंटरनेट कनेक्शन भी काफ़ी धीमा है. चुनौती शुभम को इस प्रतियोगिता में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा. एक तो इस प्रतियोगिता में 10 से 13 वर्ष के बच्चे ही शामिल हो सकते थे, तो दूसरी शर्त ये थी कि प्रतियोगी को पिछले दो साल की स्कूल परीक्षाओं में औसत 80 प्रतिशत अंक भी चाहिए थे. हरेक ज़ोन से औसत अंक के आधार पर प्रतियोगियों को लिखित परीक्षा के लिए बुलाया गया. इस प्रतियोगिता के संचालक सिद्धार्थ बसु ने बताया कि शुभम ने लिखित परीक्षा में अच्छे अंतर से पहला स्थान हासिल किया. टेलिफ़ोन इंटरव्यू और अन्य जाँच प्रक्रियाओं के बाद 320 में से सिर्फ़ 60 प्रतियोगी ही बच गए. इनमें से 12 प्रतियोगियों को फ़ाइनल में जाने का मौक़ा मिला. फ़ाइनल का प्रसारण एक टीवी चैनल पर किया गया. सिद्धार्थ बसु ने बताया, "10 महीने चली लंबी प्रक्रिया और 27 एपिसोड के बाद भारत के प्रतिभाशाली बालक का चयन हुआ." सुविधाएँ शुभम के परिवार वालों का कहना है कि मुज़फ़्फ़पुर जैसे छोटे शहर में रहने की अपनी सीमाएँ हैं.
अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर शुभम की दादी जयंती देवी ने बताया कि इसके बावजूद परिवार की कोशिशों से शुभम के लिए हर सुविधाएँ जुटाने की कोशिश की गई. अपनी छुट्टियों के दौरान शुभम ने इस प्रतियोगिता के लिए हर दिन 12 घंटे तक तैयारी की. जबकि स्कूल वाले दिनों में वे इस प्रतियोगिता के लिए पाँच से छह घंटे तक तैयारी करते थे. शुभम ने बताया, "अप्रैल और अगस्त के बीच मैंने अंग्रेज़ी साहित्य की कई प्रतिष्ठित पुस्तकों सहित क़रीब 70 क़िताबें पढ़ी थीं. लेकिन फ़ाइनल में एक भी प्रश्न इन पुस्तकों से नहीं पूछा गया." उनकी प्रिय पुस्तकों में शामिल हैं- हैरी पॉटर एंड द चैंबर ऑफ सीक्रेट्स, चार्ल्स डिकेंस की क्लासिक्स, ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़ और डेविड कॉपरफ़ील्ड्स. शुभम ने बताया कि उन्हें साहित्यिक अंदाज़ में लिखी पुस्तकें अच्छी लगतीं हैं लेकिन आजकल ऐसी पुस्तकें कम ही आतीं हैं. शुभम के शिक्षकों का कहना है कि वे असाधारण प्रतिभा के छात्र हैं और स्कूल को उन पर गर्व है. पिछले तीन साल से शुभम को पढ़ा रहे मनीष कुमार कहते हैं,"अगर भविष्य में सब कुछ ठीक रहा तो शुभम भारत के लिए धरोहर साबित होंगे." शाहरुख़ ख़ान और प्रीटी जिंटा के प्रशंसक शुभम को अपने साथियों की तरह क्रिकेट खेलना और देखना प्रिय है. शुभम कंप्यूटर के प्रोफ़ेसर या फिर मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहते हैं ताकि अपने राज्य और देश की सेवा कर सकें. बिहार की ख़राब छवि के बावजूद उन्हें अपना राज्य बहुत प्यारा है और वे अपने राज्य पर गर्व करते हैं. शुभम कहते हैं, "मुझे अपने राज्य पर गर्व है. यह ज़रूर है कि मेरा राज्य ग़लत कारणों से इन दिनों चर्चा में रहता है लेकिन मैं अपने राज्य के लिए कुछ करना चाहता हूँ." |
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