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दुनिया की हलचल से न रहें बेख़बर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश भर के युवा छात्र-छात्राओं के एक सम्मलेन में मुझे बोलने के लिए बुलाया गया था. परिचय के दौरान बच्चों के प्रभारी से पता चला कि ये अपने-अपने राज्यों के सर्वश्रेष्ठ बच्चे हैं. सचमुच वे बच्चे सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. कुछ सुदूर दक्षिण से आए थे तो कुछ पूर्वी इलाकों से और आम तौर पर वे हिंदी नहीं समझ पाते. इस कारण तय किया गया कि बच्चों को अंग्रेज़ी में संबोधित किया जाए. मैंने फैसला किया मैं अपना भाषण हिंग्लिश में करुँगी. मुझे लगा कि ये बच्चे वास्तव में राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. मैंने उनसे कहा कि मुझे उनसे मिलकर बहुत गर्व हो रहा है. मुझे मालूम था कि वे लोग गणतंत्र दिवस के परेड की तैयारी कर रहे थे. निश्चित रूप से वे पूरे उत्साह और उमंग में थे. सवालों से भरी निगाहें...
बातचीत की शुरुआत में मैंने अचानक से सवाल किया कि उनमें कितने लोगों को अमरीकी राष्ट्रपति के मौज़दा चुनाव के सभी जाने-माने उम्मीदवारों के बारे में पता है. किसी ने इसका ज़वाब नहीं दिया. मुझे मालूम था कि ऐसा ही कुछ होगा और इसीलिए मैंने यह सवाल पूछा भी था. बच्चों के साथ आए शिक्षक इसके बाद थोड़ा असहज दिखने लगे. मेरा अगला सवाल था कि आपको अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे प्रमुख नेताओं का नाम क्यों मालूम नहीं हैं. सभी बच्चों और शिक्षकों ने एक स्वर में कहा कि वे लोग परेड की तैयारियों में व्यस्त थे. अब मेरा सवाल यह था कि बच्चों ने कितने दिनों से ख़बरें नहीं सुनी हैं. जवाब आया कि एक महीने होने को हैं. यह सुनकर तो मैं सन्न ही रह गई. अख़बारों को पढ़ने के बारे में पूछा तो ऐसा कोई नहीं मिला जो एक भी अख़बार पढ़ रहा हो. वजह बताई गई कि कैंपस में अख़बार आते ही नहीं हैं. जब टीवी चैनलों को देखने के बारे में पूछा तो पता चला कि जहाँ उन्हें ठहराया गया है, वहाँ कोई टीवी सेट नहीं है. रेडियो नहीं पर मोबाइल है... मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूँ क्योंकि उनकी देखभाल करने वाले शिक्षकों के लिए मेरी ये बातें असुविधाजनक हो रही थीं. हालाँकि मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं थी.
लेकिन मुझे लगा कि लड़के-लड़कियाँ अब मेरी तरफ सवाल भरी निगाह से देख रहे हैं तो मैंने वापस गेंद फिर उनके पाले में डाला. अब मैंने पूछा कि उनमें से कितने ट्रांजिस्टर के साथ आए हैं. अगर वे चाहते तो इस पर भी समाचार सुन सकते थे. बच्चों ने कहा कि उन्हें रेडियो लेकर आने नहीं कहा गया था. लेकिन बच्चे मोबाइल फ़ोन लेकर आए थे और उसमें मेरी तस्वीरें क़ैद करने में लगे थे. बहुत अच्छा. यह कहकर मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें मोबाइल फ़ोन लेकर आने के लिए कहा गया था. वे पकड़े जा चुके थे और इस पर हँसे बिना नहीं रह सके. बच्चों की देखभाल करने वाले वही कर रहे थे जो उन्होंने बीते वर्षों में किए थे. सुधार का कोई प्रयास नहीं. कार्यक्रमों को अवश्य ठीक करना चाहिए. इसमें सुधार के बिना इस विशाल राष्ट्रीय समागम का बहुमूल्य समय वाँछित नतीज़े नहीं देने वाला. अब मैंने उनसे पूछा कि देश के श्रेष्ठ नौजवान होने के नाते वे कैसे दिन-ब-दिन की घटनाओं से बेख़बर रह सकते हैं? क्या आपमें जानने की भूख़ नहीं होनी चाहिए? क्या आपको अख़बार या टीवी की माँग नहीं करनी चाहिए थी? यह पूछकर मैंने बेख़बर रहने की ज़वाबदेही वापस बच्चों पर डाली. इससे शिक्षकों को भी संदेश मिल गया. गाँवों का हिस्सा... दूसरे दौर के सवाल की शुरुआत में मैंने पूछा कि कितने बच्चे गाँवों से आएँ हैं? ज़वाब में कुछ हाथ ही उठे.
जब मैंने पूछा कि कौन-कौन से बच्चे अपने गाँव का सरपंच बनना चाहेंगे तो ज़वाब देने के लिए कोई सामने नहीं आया. कारण पूछने पर कुछ बच्चों ने कहा कि यह काम बड़े-बूढ़ों का है. कोई हमें कुछ करने नहीं देगा. तब मैंने कहा कि उन्हें समाज सेवा के लिए प्रेरित किया जा रहा है. इसलिए वे वापस जाएँ तो अपने-अपने गाँवों में भी काम करें. आप वहीं करें जो आपकी नज़र में गाँव के लिए ज़रूरी है. एक जैसी सोच रखने वाले मित्रों को साथ करें और किसी एक काम को शुरू कर दें. यह काम स्कूल में हो सकता है, प्रशिक्षण का हो सकता है, जल संसाधन का हो सकता है, चिकित्सा क्षेत्र हो सकता है. महिला साक्षरता, स्वयं सहायता समूह, वृक्षारोपण, बच्चों की देखभाल, गर्भवती महिलाओं की देखभाल, डेयरी और सरकारी योजनाओं को अमल में लाने में भी बच्चे मदद कर सकते हैं. जब आप काम करोगे तो आपकी सेवा भावना को लोग धीरे-धीरे समझेंगे. इसके बाद लोग आपकी मौज़ूदगी और आपके योगदान की तारीफ़ करनी शुरू करेंगे. कैसे चढ़ें सीढ़ियाँ... बच्चों को मैंने समझाया कि उन्हें सिखाया जा रहा है कि सीढ़ियाँ किसी तरह धीरे-धीरे चढ़नी हैं लेकिन चढ़नी ज़रूर है.
आपके पास कोई हेलीकॉप्टर नहीं होगा जो आपको सीधे शीर्ष पर ले जाकर छोड़ दे. आपको एक के बाद एक सीढ़ी ऊपर चढ़ना होगा. असल में यहाँ आपको देश के निर्माण और ख़ुद की ज़िंदगी में बेहतर करने की सीख दी जा रही है. और इससे पहले कि मैं अपना भाषण ख़त्म करती, बच्चों से एक और मुश्किल सवाल पूछ लिया. आपमें से कितने कंप्यूटर पर काम कर सकते हैं? इस बार भी काफ़ी कम हाथ उठे. मुझे लगा कि अगर ठीक तरीक़े से व्यवस्था की जाती तो बच्चों के इस समय का बेहतर उपयोग हो सकता था. लेकिन इसके लिए हमें दूसरे तरह के नेतृत्व की ज़रूरत होगी. यह तो समय ही बताएगा कि मुझे यहाँ मिले कितने बच्चे आगे चलकर कुछ अलग करेंगे. लेकिन इन सबको तैयार किया जा सकता है? इस बात को लेकर मैं निश्चिंत तो हूँ बशर्ते तरीक़ा दुरुस्त हो. | इससे जुड़ी ख़बरें बाल सुधार गृह को सुधारने का एक प्रयास28 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस अपनी छवि सुधारनी होगी14 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस पारदर्शिता ज़रूरी है...29 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस किरण बेदी का सेवानिवृति का आवेदन27 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस दीवाली पर 'मीठी-मीठी' सलाह15 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस बुद्धि और भावना के साथ चाहिए लगन01 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस पुलिस का हाथ बंटा सकती है जनता18 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस जागृति आ ही गई...आख़िरकार!04 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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