BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 28 दिसंबर, 2007 को 14:25 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
बाल सुधार गृह को सुधारने का एक प्रयास

किरण बेदी
किरण बेदी ने क़ैदियो के पुनर्वास के लिए काफ़ी काम किया है.
दिल्ली उच्च न्यायालय की एक बेंच ने मुझसे उस टीम का हिस्सा बनने को कहा था जो बाल सुधार गृह का कामकाज देखती है.

इन सुधार गृहों का संचालन सरकार करती है और इस टीम का गठन अदालत के आदेश पर किया गया था.

अदालत जानना चाहती थी कि सुधार गृह में आने वाले ऐसे बच्चों को क्या किसी उपचार की ज़रूरत है जो नशा करने के आदी हैं.

वर्ष 1986 में मैंने नशीले पदार्थो का सेवन करने वालों के इलाज के लिए एक विशेष कार्यक्रम शुरू किया था और अदालत निश्चित रूप से मेरे उस अनुभव का लाभ उठाना चाहती थी.

इसी अनुभव का लाभ मुझे तिहाड़ जेल को संचालित करने में मिला था जहाँ क़ैदी नशीली दवाओं के आदी थे.

 कुछ बच्चों ने खाना बनाना सीखने की बात कही तो कुछ ने कहा कि वो दर्ज़ी का काम सीख रहे हैं. कुछ बच्चो ने तो कंप्यूटर सीखने की भी बात कही लेकिन ये सब मुझे सच से कोसों दूर लगा.

तिहाड़ का अनुभव

तिहाड़ जेल में हर चौथा क़ैदी नशीली दवाओं का सेवन करता था लेकिन उनके इलाज या पुनर्वास के लिए हमारे पास कोई सुविधा नहीं थी.

जब क़ैदियों को नशीले पदार्थ नही मिलते तो वो नींद की गोलियां लेनी शुरू करते. इन गोलियों को तिहाड़ जेल की डिस्पेंसरी से ख़रीदा जाता था. कुछ क़ैदी डिस्पेंसरी से ज़बरदस्ती इन दवाइयों को लेते थे.

इस समस्या से मुक़ाबले के लिए हमने कईं ग़ैर सरकारी संगठनो से मदद ली.

जेल में आने वाले नशे के आदी क़ैदियों को विशेष सुविधाओं और उपचार वाले नए बैरकों में ठहराया जाने लगा.

कुछ ही दिनो के भीतर जेल का माहौल बदलने लगा. जैसे जैसे क़ैदियों ने नींद की गोलियों का सेवन रोका वैसे वैसे उनकी संख्या स्कूलो, ध्यान केंद्रो और आध्यात्मिक शिविरों में बढ़ने लगी.

इसी अनुभव के आधार पर मुझे पता था कि बाल सुधार गृह में क्या करना है.

सुधार गृह

मैं जब बाल सुधार गृह पहुँची तो मैंने महसूस किया कि बच्चे इधर उधर घूमने में अपना समय ख़राब करते हैं.

सुधार गृह अधिकारियों की मदद से हमने सभी बच्चो को एकत्र किया ताकि आपसी संवाद को स्थापित किया जा सके. हमने शुरूआत में उनसे कुछ ज़रूरी सवाल पूछे.

बच्चे
बच्चों को प्रशिक्षण और निगरानी की ज़रूरत है

जैसे कि वो पूरा दिन क्या करते हैं. क्या वो सुधार गृह में कुछ नया सीखते हैं.

कुछ बच्चों ने खाना बनाना सीखने की बात कही तो कुछ ने कहा कि वो दर्ज़ी का काम सीख रहे हैं. कुछ बच्चो ने तो कंप्यूटर सीखने की भी बात कही लेकिन ये सब मुझे सच से कोसों दूर लगा.

एक कोने में बड़ा सा कूड़ेदान रखा था जिसमें मक्खियां भिनभिना रही थीं. मैंने जब उनसे पूछा कि यहाँ कि सफ़ाई कौन करता है तो उन्होंने कहा कोई नहीं.

मैने उनसे पूछा कि क्या वो उस संस्था में श्रमदान करते हैं जो उन्हें भोजन और शरण देती है तो उन्हें इसका मतलब ही समझ में नहीं आया.

उस समय मेरे साथ उस संस्था के कुछ अधिकारी भी मौजूद थे और मैं उन्हें शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी. इसलिए सच जानने के लिए मैंने कुछ अलग हट करने की सोची. मैंने लिखने के लिए कुछ कागज़ और पेन मांगे.

अनूठा तरीका

सभी बच्चो में पेन और कागज़ बांटने के बाद मैंने उनसे कहा कि जो भी उनसे पूछा जाए वो उसका उत्तर बेझिझक लिखें. मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि जवाब देते समय उन्हें अपना नाम लिखने या पहचान ज़ाहिर करने की ज़रूरत नहीं है इसलिए किसी भी प्रश्न का उत्तर वो बढ़ा चढ़ाकर न दें.

फिर मैंने उनसे सवाल पूछने शुरू किए.

वो पूरा दिन क्या करते हैं
वो वहाँ क्या पढ़ते हैं और सीख रहे हैं
क्या वहाँ किसी तरह का भ्रष्टाचार है.
क्या वो नशीले पदार्थो का सेवन करते हैं.
बाल सुधार गृह से वो ऐसा क्या चाहते हैं जिससे फिर वो अपराध की दुनिया में ना लौटें.

मुझे विश्वास था कि ये तरीका अपनाने पर हमें जो जवाब मिलेंगे वो विश्वसनीय होंगे इसलिए हमने बच्चो के जवाब इकठ्ठा करने शुरू कर दिए.

लेकिन मुझे ये देख कर हैरानी हुई कि आधे से ज़्यादा बच्चो ने मुझे खाली कागज़ वापस किए थे. उनका कहना था कि वो इतना भी पढ़ना लिखना नहीं जानते कि अपना नाम लिख सकें.

 जब चीफ़ वॉर्डन मुझे सुधार गृह के बाहर छोड़ने तक आया तो उसने मुझसे वादा किया कि अब से वो इन बच्चो का ख़्याल एक बड़े भाई की तरह रखेगा.

उनमें से कुछ बच्चे ऐसे थे जो दो साल से भी ज़्यादा समय से सुधार गृह में रह रहे थे. मैंने सुधार गृह अधिकारियों की तरफ़ प्रश्नवाचक नज़रों से देखा तो वो अनुत्तरित नज़र आए.

असल समस्या

मैंने उनसे पूछा कि सुधार गृह कि स्थिति ऐसी क्यों है जबकि वहाँ अध्यापक है, समाज कल्याण अधिकारी है और ग़ैर सरकारी संगठन भी वहाँ का दौरा करते रहते हैं.

मुझे जवाब मिला कि कोई भी अपना काम ठीक से नही करता. सबका ध्यान सिर्फ़ इस बात पर रहता है कि कहीं कोई बच्चा सुधार गृह छोड़कर भाग ना जाए.

इसलिए जब तक बच्चे सुधार गृह में बच्चे बंद है तब तक वो निश्चिंत है कि उनकी नौकरी सुरक्षित है.

उसके बाद उन्होंने ये भी कहा कि इस तरह की संस्थाए चलाने के लिए उन्हें कभी प्रशिक्षण नही दिया गया.

इस पर मैंने उनसे पूछा कि अच्छे और ज़िम्मेदार माता-पिता बनने के लिए भी क्या किसी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है.

मैंने उनसे अनुरोध किया कि जब तक उन्हें औपचारिक रूप से प्रशिक्षण नहीं मिल जाता तब तक उन्हें बच्चो का ख़्याल एक भाई या फिर माता-पिता की तरह रखना चाहिए.

उसके बाद जब चीफ़ वॉर्डन मुझे सुधार गृह के बाहर छोड़ने तक आया तो उसने मुझसे वादा किया कि अब से वो इन बच्चो का ख़्याल एक बड़े भाई की तरह रखेगा.

इससे जुड़ी ख़बरें
जागृति आ ही गई...आख़िरकार!
04 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस
पुलिस का हाथ बंटा सकती है जनता
18 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस
बुद्धि और भावना के साथ चाहिए लगन
01 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस
दीवाली पर 'मीठी-मीठी' सलाह
15 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस
अपनी छवि सुधारनी होगी
14 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस
ज़िंदगी यहीं नहीं रुकतीः किरण बेदी
26 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>