|
ज़िंदगी यहीं नहीं रुकतीः किरण बेदी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की पहली पुलिस अधिकारी किरण बेदी की दिल्ली की पुलिस आयुक्त के तौर पर नियुक्ति की अटकलों को उस समय विराम मिल गया जब उनके जूनियर अधिकारी युद्धवीर सिंह डडवाल के नाम का ऐलान हो गया. डडवाल काफ़ी विवादों मे घिरे रहे हैं और जेसिका लाल हत्याकांड के सिलसिले में भी उनका नाम सुर्ख़ियों में रहा है. किरण बेदी इस फ़ैसले से क्षुब्ध हैं. बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत में उन्होंने दिल खोल कर इस व्यथा को बयान किया: "ये बहुत ग़लत प्रथा की शुरुआत हुई है और इससे प्रणाली की ख़ामियां भी सामने आ गईं. शायद पहले भी यह अंदरखाने ऐसा होता रहा होगा लेकिन लोगों के पास आवाज़ नहीं रही होगी या नहीं बोले. पहली बार प्रणाली की मनमर्ज़ी सबके सामने आ गई. मैं एक खुली किताब हूँ. मुझे काम से मतलब है. मुझे किसी की सिफ़ारिश, ख़ुशामद और बेइमानी से कोई मतलब नहीं है. मुझे तो सिर्फ़ आम आदमी के इंसाफ़ से मतलब है. शायद यही चीज़ मेरे ख़िलाफ़ गई है लेकिन ये कहा नहीं जाएगा क्योंकि कहीं भी कुछ लिखित नहीं होता है. मैं और कुछ नहीं सोच सकती. मेरे ऊपर कोई घोटाले का आरोप नहीं है, मेरे ऊपर किसी ग़लत सिफ़ारिश पर मदद का आरोप साबित नहीं कर सकते तो फिर मुझे किनारे लगाने का कारण क्या है? मैं ख़ुद भी जानना चाहती हूँ.
जहाँ अहम निर्णय लिए जाते हैं, वहाँ महिलाओं की उपस्थिति प्रतीकात्मक है. निर्णय लेते वक़्त उनका विचार नहीं लिया जाता. अगर कहीं हैं भी तो अकेली आवाज़ बनकर हैं. आप कैबिनेट का ही उदाहरण लीजिए. कोई भी महिला आवाज़ बुलंद नहीं है. गृह, विदेश, उद्योग, रक्षा, वित्त, वाणज्य, उद्योग किसी भी महत्वपूर्ण काम महिलाओं की क्या भूमिका है ये आप देख सकते हैं. उपेक्षा की शिकार महिला मैं बहुत ख़ुश हूँ कि महिला हूँ. महिला होने में क्या अच्छाई और क्या बुराई है मैं इसे देखते हुए बड़ी हुई हूँ. इसलिए मैं अपने दिमाग में न कभी ये बात आने दी है और न आने दूंगी कि शायद ये मुझे इसलिए नहीं मिला क्योंकि मैं महिला हूँ. मैंने अपने आपके कभी कमज़ोर नहीं समझा, किसी से कम नहीं समझा. मैंने ख़ुद को शिक्षिता किया है और मानसिक रूप से इतना मज़बूत बनाया है कि इस चीज़ में विश्वास नहीं करना चाहती लेकिन हक़ीकत ये है कि नीति निर्धारक समूह में महिला की मौजूदगी कुछ लोगों में असुरक्षा की भावना भर देती है. क्योंकि महिला उनके कोर ग्रुप का हिस्सा नहीं होती हैं. महिला आमतौर पर नेटवर्किंग के नाम पर बैठकर इकट्ठे शराब नहीं पीतीं और शराब इस तरह के समूहों में तार जोड़ने का काम करती है. इसलिए वे दोस्त नहीं बन पाती हैं. अधिकारी को इसलिए नकारा जा रहा है क्योंकि वे दखलअंदाज़ी नहीं करने देंगे और क़ानून का शासन चलेगा. इन सबके बाद भी ज़िंदगी यहीं नहीं रुकती. स्वस्थ रही तो आगे भी बहुत कुछ करना है. जीवन के बारे में कुछ चीज़ें तो पहले से तय हैं और कुछ भविष्य में तय होंगी. इन सबके बारे में जनता की भावनाओं को ध्यान में रखकर फ़ैसला लूंगी. दिल्ली के पुलिस आयुक्त पद पर नियुक्ति में अपनी अनदेखी पर अदालत जाऊंगी या नहीं इस पर सारे विकल्प खुले हैं. समझदारी से सारे पहलुओं पर विचार करने के बाद इस बारे में निर्णय लूंगी". | इससे जुड़ी ख़बरें तिहाड़ की मौतों के बारे में जवाब तलब13 जून, 2007 | भारत और पड़ोस आपराधिक दंड संहिता में अहम संशोधन23 जून, 2006 | भारत और पड़ोस 'महिलाओं को विचार बदलना होगा'04 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस जेल सुधार की प्रेरणा भारत से07 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस तिहाड़ जेल के अधिकारी निलंबित18 फ़रवरी, 2004 | भारत और पड़ोस किरण बेदी की एक और उड़ान | भारत और पड़ोस इंसाफ़ का अधिकार29 मई, 2002 | पहला पन्ना महिला पुलिसकर्मियों ने आवाज़ उठाई23 फ़रवरी, 2002 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||