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'महिलाओं को विचार बदलना होगा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी मानती हैं कि यदि महिलाएँ तय कर लें कि जिस घर में महिलाएँ हैं वहाँ महिलाओँ पर अत्याचार नहीं होगा तो सब कुछ बदल सकता है. उनका मानना है कि समाज में महिला की स्थिति बदल रही है और आगे भी बदलेगी लेकिन पाँच हज़ार साल की मानसिकता बदलने में वक़्त लगेगा. 'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि उन्हें आने वाले दिनों में घरेलू हिंसा विरोधी क़ानून से बड़ी उम्मीदें हैं. उन्होंने एक श्रोता के सवाल का जवाब देते हुए स्वीकार किया कि घरेलू हिंसा के ग्राफ़ में बढ़ोत्तरी दिख रही है, लेकिन इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा, "अभी तो महिलाओं पर अत्याचार के मामले और बढ़ते हुए दिखेंगे लेकिन इसका कारण यह है कि महिलाओं में जागरुकता आ रही है और ज़्यादा महिलाएँ शिकायत करने पहुँच रही हैं." सेंटर फ़ॉर सोशल रिसर्च के आँकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया, "अभी तो स्थिति यह है कि तीन साल प्रताड़ित होने के बाद एक हज़ार में से एक महिला ही शिकायत दर्ज करवाने पहुँचती हैं." उनका कहना था कि महिलाएँ अपना घर नहीं तोड़ना चाहतीं और तब तक बच्चे भी हो जाते हैं. किरण बेदी ने माना कि शिकायत दर्ज करवाने के बाद भी सज़ा मिलने की दर बहुत कम है और सिर्फ़ सौ में से दो लोगों को सज़ा मिल पाती है. लेकिन उनका कहना था कि बहुत से महिला संगठनों के दबाव के बाद सरकार ने घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ विधेयक पारित किया है और एक बार इस पर राष्ट्रपति हस्ताक्षर कर दें तो महिलाओं के हाथ में एक बड़ा हथियार आ जाएगा. कमी इस सवाल पर कि कमी शिक्षा में है या मानसिकता में या फिर लालन पालन में, उन्होंने कहा, "कमी तीनों में है, शिक्षा में भी, मानसिकता में भी और लालन पालन में भी." अपने लंबे अनुभव का हवाला देते हुए किरण बेदी ने कहा कि ज़रुरत इस बात की है कि महिलाएँ बदलें. उन्होंने माँ को बदलने पर ज़ोर देते हुए कहा कि हर माँ को तय करना चाहिए कि वह सब कुछ सहती है तो उसे तय करना चाहिए कि कम से कम वह अपनी बेटी को तो यह सब सहने की शिक्षा नहीं देगी. उनका कहना था, "महिलाओं को यह मानसिकता बदलनी होगी कि पुरुष ही सुरक्षा दे सकता है." महिलाओं को आरक्षण देने की ज़ोरदार वकालत करते हुए किरण बेदी ने कहा कि आज भारत में पंचायतों के तीस लाख चुने हुए प्रतिनिधियों में दस लाख महिलाएँ हैं और वे इसे बड़ा परिवर्तन मानती हैं. उन्होंने माना कि महिलाओँ की आड़ में परिवार के पुरुष सदस्य भी राजनीति कर रहे हैं लेकिन उनका कहना था कि आधी जगह पुरुष की भूमिका सहायक की है और आने वाले दिनों में स्थितियाँ और बदलेंगी. उन्होंने महिलाओं द्वारा उत्तराँचल की पंचायतों में किए जा रहे कार्यों की बड़ी तारीफ़ की. |
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