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राजस्थान में महिला सरपंचों का हाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महिला आरक्षण सही है या नहीं इस पर कई प्रकार की टिप्पणियाँ की जा चुकी हैं. दरअसल राजस्थान की नौ हज़ार ग्राम पंचायतों में से एक तिहाई यानी तीन हजार महिला सरपंच हैं. इन आकड़ों के सामने आते ही मन में ख़्याल उठा कि किस प्रकार इतने घूँघट-प्रधान राज्य में महिला सरपंचों के लिए स्वीकृति बन पाई है. क्या वास्तव में इससे महिलाओं को समाज में अपनी बात कहने का, अपनी भूमिका को परिभाषित करने का मौका मिला है? अधिकतर पुरूषों का कहना था कि अशिक्षित महिला सरपंच बेकार साबित हुई हैं. पतियों का दबाव एक ऐसी ही प्रतिक्रिया थी, "महिलाएँ तो घर पर बैठी रहती हैं, उनके पति ऑफिस चले जाते हैं. यानी महिला सरपंचों के नाम पर जो करते हैं पुरूष ही करते हैं, औरतें कुछ नहीं कर पातीं. औरत अनपढ़ हैं और समाज की वजह से वो कहीं आ-जा नहीं पातीं.
हम उत्सुकतावश पूर्व सरपंच हवा देवी से मिलने पहुँचे. हवा देवी लगभग 26 साल की थीं जब वे सरपंच बनीं थीं. उन्होंने बताया कि उनके पति काफ़ी काम कर दिया करते थे, "वो सभी लोगों से मिलता था, फाइलें निपटाता था. वो पढ़ा लिखा था, इसलिए सब काम करता था." हमने उनसे पूछा - "अगर आप अनपढ़ थीं और आपको लगता था कि आपसे नहीं संभल पाएगा तो सरपंच क्यों बनीं, चुनाव में क्यों खड़ी हुईं?" इस सवाल पर उनका जवाब था, "खड़े होने के लिए गाँववासियों ने दबाव डाला और मैं खड़ी हो गई." महिला सरपंच के साथ काम कर चुके एक व्यक्ति से हमने बात की तो उन्होंने कहा, "मैं महिला सरपंच के साथ काम कर चुका हूँ और उनके दर्द को समझता हूँ. पुरूष नहीं चाहते कि उनका प्रभाव कम हो इसलिए वे महिला पर दबाव डालते हैं और उन्हें आगे नहीं आने देना चाहते, जबकि महिला की पूरी इच्छा होती है कि वे अपने पद का सदुपयोग करें." उनका कहना था, "राजनेता तो शिक्षित महिलाओं को तो आगे लाना ही नहीं चाहते क्योंकि वे अनपढ़ महिलाओं को ही आगे लाना चाहते हैं और अपनी शासन प्रणाली को चालू रखना चाहते हैं. अगर वे पढ़ लिख गईं तो वे जनता की आवाज़ उठाएँगी. महिलाओं के अशिक्षित होने की बात हर आदमी कर रहा था, तो क्या अशिक्षित पुरूष सरपंच ठीक होंगे?इस सवाल पर ज़्यादातर लोग ख़ामोश थे या फिर उन्होंने हँस कर बात टाल दी. महिलाएँ ही ज़िम्मेदार? वहीं कुछ लोगों का कहना था कि महिला ही अपनी दशा के लिए जिम्मेदार हैं. एक ग्रामीण का कहना था, "किसी महिला का कोई बॉयकॉट करता है तो वह महिला ही होती हैं और महिलाएँ ही उनको आगे नहीं आने देना चाहतीं." राजस्थान भारत का ऐसा प्रदेश है जहाँ राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों महिलाएँ हैं. ऐसे राज्य में लोग कैसे अपने बहू-बेटियों को आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं? पुरूषों ने तो कहा कि बहू या पत्नी काबिल भी हो तो घर से उन्हें कौन निकलने देगा. गृहस्थी कौन चलाएगा, जो चाय आप लोग पी रहे हैं कौन बनाएगा? लेकिन 60 वर्षीय सावित्री देवी का कहना था कि अगर कुछ करना है तो ख़ुद ही करना होगा. उन्होंने कहा, "कोई कुछ नहीं करता, न पुरूष करता है न ही सरकार और न ही भाजपा या कांग्रेस करती है. करने के लिए अपना हाथ है. जो धंधा करता है वो खा के सोता है जो नहीं करता है वो भूखा ही सो जाता है." शायद एक दिन सभी महिलाएँ सावित्री देवी की तरह सोचेंगी. |
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