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'लड़की करेला, लड़का लड्डू' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कोख में पल रहे बच्चे के बारे में जब यह पता चलता है कि वह लड़की है तो कुछ माता-पिताओं को जैसे साँप सूंघ जाता है क्योंकि भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा बेटी को अभिशाप मानता है. इसलिए ऐसे बहुत से मामले देखने में आते हैं जब यह पता चलता है कि कोख में लड़की है तो उसे पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है. लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होती, इस मानवता विरोधी काम में ऐसे लोगों की मदद करते हैं अत्याधुनिक तकनीक से लैस डॉक्टर और चिकित्सा केंद्र. राज्य और राज्य के बाहर ऐसे चिकित्सा केंद्र अल्ट्रासाउंड के ज़रिए यह बता देते हैं कि कोख में पलने वाला बच्चा लड़की है या लड़का. और अचंभे वाली बात ये है कि वे यह जानकारी देने के लिए लड़का-लड़की नहीं बल्कि गुप्त शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. जैसे-अगर कोख में लड़की हो तो कहा जाएगा - 'करेला' खाइए, और अगर लड़का हुआ तो कहा जाएगा - जाकर 'लड्डू' बाँटिए. ज़ाहिर सी बात है कि इस जानकारी के लिए ये चिकित्सा केंद्र मोटी रक़म वसूलते हैं.
राजस्थान में भ्रूण परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ने के साथ ही बालिकाओं की संख्या में कमी आने लगी है. महिला संगठनों का आरोप है कि अनेक डायगनोस्टिक सेंटर लिंग परीक्षण करके कन्यावध के धंधे में लिप्त हैं. इन आरोपों के बाद सरकार ने जयपुर के एक डायगनोस्टिक सेंटर का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया है. धंधा बना बवाल तब खड़ा हुआ जब जयपुर के एक ऐसे ही चिकित्सा केंद्र ने यह विज्ञापन छपवाया - "सी योर बेबी बिफ़ोर इट इज़ बोर्न" यानी "पैदा होने से पहले ही अपना बच्चा देखें". जयपुर के उपमुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर राधेश्याम छिपी कहते हैं, "स्थिति गंभीर है. प्रशासन के साथ-साथ सामाजिक चेतना भी ज़रूरी है, तभी इस समस्या पर क़ाबू पाया जा सकता है." सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव के अनुसार निजी प्रयोगशालाओं के इस ग़ैरक़ानूनी धंधे को रोकने के लिए दस साल पहले तकनीक उपयोग अधिनियम (प्रसव पूर्व निदान) लागू किया गया था पर राजस्थान में इस क़ानून के तहत एक भी मामला दर्ज नहीं किया जा सका है. कविता श्रीवास्तव कहती हैं कि गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में राजस्थान के सीमावर्ती ज़िलों में भी लड़कियों की संख्या घट रही है क्योंकि लोग पड़ोसी राज्यों में लिंग परीक्षण कराकर गर्भ में पल रही बालिका से मुक्ति पा लेते हैं.
दिलचस्प बात ये है कि इन चिकित्सा केंद्रों ने लिंग परीक्षण की सांकेतिक भाषा का विकास कर लिया है. महिला कार्यकर्ता लाडकंवर जैन बताती हैं, "उस सांकेतिक भाषा में डॉक्टर गर्भ में पल रहे बेटे के लिए संडे यानी रविवार और बेटी के लिए फ्राइडे यानी शुक्रवार इस्तेमाल करते हैं. लड्डू माने बेटा और करेला माने लड़की. डॉक्टर ने कहा थाली बजाओ तो समझ लीजिए कि बेटा है. राजस्थान की सीमा से लगे गुजरात के आदिवासी ज़िलों में लिंग अनुपात सदैव संतुलित रहा है पर कविता श्रीवास्तव कहती हैं कि अब वहाँ भी स्थिति चिंताजनक होती जा रही है. कविता श्रीवास्तव बताती हैं कि राज्य के शहरी क्षेत्रों में 1991 में प्रति 1000 पुरुषों पर 909 महिलाएँ थीं जो 2001 में घटकर 886 रह गई है. राज्य में अभी 800 अल्ट्रासाउंड मशीनें पंजीकृत हैं और इनमें से ज़्यादातर जयपुर में ही हैं. |
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