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यह हिंसा कब ख़त्म होगी? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कश्मीर केसर की क्यारी या डल झील का नौका विहार भर नहीं बल्कि आज के दौर में उससे भी पहले एक दर्दनाक कहानी है उन लोगों की, जो झेल रहे हैं पिछले दिनों की चरमपंथी वारदातों के अँजाम को, जिसकी कल्पना भर से आज भी जो आँखें पथरा जाती हैं, जिस्म सिहर जाते हैं. ऐसी ही एक कहानी है रफीका बेगम की. जिसे रफ़ीका ख़ुद बयाँ कर रही हैं. "मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि वक़्त मेरे साथ ऐसा खिलवाड़ करेगा. अचानक ही मेरा हँसता-खेलता घर मातम भरा और डरावना हो गया. अब तो आलम ये है कि हम हँसना भी भूल चुके हैं. बमों की आवाज ने मेरे आँगन की किलकारियों और चेहरे की मुस्कुराहट को छीन लिया है. मैं अपने पति के साथ बहुत खुश थी. आँगन में खेलते बच्चों ने उस खुशी को चार चाँद लगा दिए थे. मेरे पति का अच्छा कारोबार था. समाज में सबसे बहुत अच्छी तरह मिलना बैठना था. बड़े-बड़े लोगों से भी दुआ-सलाम थी. समाज सेवा में भी हम लगे रहते थे और हमें श्रीनगर के एमएलए हॉस्टल में रहने की जगह भी मिल गई थी.
एक दिन मेरे पति का एक दोस्त, रफीक़ शाह एक टेलीविज़न लेकर आया और हमारे कमरे में यह कहकर रख कर चला गया कि मैं आकर ले जाऊँगा. मैं कमरे के बाहर खाना बना रही थी. बच्चे नीचे खेल रहे थे. अंदर मेरे पति और दो भाई बैठे बातें कर रहे थे कि अचानक उन्हें टीवी लगाने की सूझी और उन्होंने तारें जोड़कर टीवी लगाया. जैसे ही टीवी लगाया, अंदर से एक जबर्दस्त धमाके की आवाज़ आई. इस एक धमाके ने मेरी ज़िदगी का सब कुछ बदल कर रख दिया था. ब्लास्ट में मेरे पति तथा भाइयों के चीथड़े उड़ गए थे. मैं खुद करीब की छत पर उड़ कर गिरी, छत पर गद्दे सूख रहे थे जिसकी वजह से मेरी जान बच गई, ये मेरे चेहरे पर जो जगह-जगह चोट के निशान हैं, ये उसी धमाके की निशानियाँ हैं. जब मुझे होश आया तो मैंने ख़ुद को अस्पताल में पाया. शुरू के दिन तो जैसे-तैसे गुज़र गए. रिश्तेदार आते रहे और मेरे ग़म में शरीक होते रहे. लेकिन वक़्त के साथ वे सब दूर होते गए और तकलीफ़ दिन-ब-दिन बढ़ती गई. जब रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी अपनी रवानी पर आई तो सब कुछ पहाड़ जैसा नज़र आ रहा था. बूढ़े माँ-बाप. कोई सहारा नहीं. छोटे-छोटे तीन बच्चे लावारिस. न रहने का ठिकाना, न खाने-पीने का. मैं जिस तरफ़ देखती, मायूसी ही नज़र आती. ख़ुदा का शुक्र है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने मुझे नौकरी दी, कश्मीर इम्पोरियम में. छोटे-छोटे मासूम बच्चों के लिए सेना ने भी सहारा दिया. उनके स्कूल में दाख़िले और ख़र्चों की ज़िम्मेदारी ली. मगर आज भी मेरे इस सवाल का जवाब देने वाला कोई नहीं है कि मेरी क्या ख़ता थी? दो मासूम बच्चों ने क्या ज़ुर्म किया था जिनकी उन्हें सज़ा मिली? बूढ़े माँ-बाप की लाठी बनने वाले दो-दो बेटे उनके सामने ही बेरहमी से ख़त्म कर दिए गए. आखिर क्यों? यह हिंसा कब खत्म होगी, आदमी की आदमी से नफ़रत कब खत्म होगी, कश्मीर में हम फिर कब सुकून की सांस ले सकेंगे"? |
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