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मंगलवार, 08 मार्च, 2005 को 14:34 GMT तक के समाचार
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अधिकारों के बावजूद हिंसा की शिकार

मेघालय
मेघालय की महिलाओं को अपेक्षाकृत ज़्यादा अधिकार मिले हैं
भारत के जिस राज्य में महिलाओं को दूसरे राज्यों के मुक़ाबले ज्यादा अधिकार मिले हों, क्या वहाँ उन पर अत्याचार की कल्पना की जा सकती है?

यह बात विरोधाभासी लग सकती है लेकिन है सोलहों आने सच.

‘पूर्वोत्तर भारत का स्काटलैंड’ कहे जाने वाले पर्वतीय राज्य मेघालय में मातृसत्ता वाला समाज है. यानी समाज में महिलाओं की हैसियत व अधिकार मर्दों से ज्यादा हैं.छोटी पुत्री ही घर व संपत्ति की मालकिन होती है और उसी के नाम पर वंश आगे चलता है.

इसके बावजूद यह विडंबना ही है कि राज्य व समाज के विकास से जुड़े किसी भी महत्वपूर्ण फैसले में उनकी कोई भूमिका नहीं है.

घरेलू हिंसा

यही नहीं, इन महिलाओं को अब घरेलू हिंसा का भी शिकार होना पड़ रहा है.

 अलग राज्य का दर्जा मिलने के बाद 31 वर्षों में कितनी महिलाएं विधायक बनी हैं. जब तक निर्णय लेने के अधिकार में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक राज्य व समाज का भला नहीं होगा.
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी

राज्य में बढ़ती शराबखोरी इसकी सबसे बड़ी वजह है.

महिलाओं के एक संगठन नार्थ ईस्ट नेटवर्क की ओर से किए गए एक ताजा अध्ययन में कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं.इसके मुताबिक, बीते साल महिलाओं पर हिंसा के 52 मामले दर्ज हुए. लेकिन इससे कई गुना ज्यादा मामलों का कहीं कोई रिकॉर्ड ही नहीं है.

राज्य की वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आई नोंगरांग कहती हैं कि ‘यह मातृसत्ता वाले समाज का एक अंधेरा पहलू है.

वे सवाल करती हैं, "अलग राज्य का दर्जा मिलने के बाद 31 वर्षों में कितनी महिलाएं विधायक बनी हैं. जब तक निर्णय लेने के अधिकार में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक राज्य व समाज का भला नहीं होगा. यह क्या कोई कम हास्यास्पद है कि राज्य में महिला पुलिस बल के गठन का अधिकार भी पुरुषों के ही हाथों में है"?

संगठन की कार्यक्रम निदेशक मनीशा बहल का कहना है, "अब यहां घरेलू हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं की तादाद बढ़ रही है. लेकिन ऐसे ज्यादातर मामले दबा दिए जाते हैं. पंचायतें भी इसे निजी मामला मानते हुए इनमें हस्तक्षेप नहीं करतीं. ख़ासकर ग्रामीण इलाकों में ऐसी घटनाओं में तेजी आई है. जब भी महिलाओं पर अत्याचार का मुद्दा उठता है, सरकार यह कह कर इसे दबाने का प्रयास करती है कि मातृसत्ता वाले समाज में यह संभव नहीं है".

 जब भी महिलाओं पर अत्याचार का मुद्दा उठता है, सरकार यह कह कर इसे दबाने का प्रयास करती है कि मातृसत्ता वाले समाज में यह संभव नहीं है".
ग़ैर सरकारी संगठन की अधिकारी

पुलिस का कहना है कि उसके पास ऐसी बहुत कम शिकायतें ही आती हैं. जो आती भी हैं उनमें लोग आपस में ही सुलह कर लेते हैं.

एक अधिकारी कहते हैं, "जब तक रिपोर्ट नहीं लिखी जाती, हम कोई कार्रवाई कैसे कर सकते हैं"?

राज्य में हिंसा की शिकार महिलाओं को न तो चिकित्सा सहायता मुहैया कराई जाती है और न ही उनके रहने के लिए आश्रम जैसा कोई ठौर-ठिकाना है. ऐसे में अपने तमाम विशेषाधिकारों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस उनके लिए तो बेमतलब ही है.

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