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आज भी भोगती हैं नारी होने का दंश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महिलाओं के लिए सामाजिक रूप से ज़्यादा उदार माना जानेवाला झारखंड, भले ही इनके लिए कई मायनों में अन्य राज्यों से बेहतर हो पर महिलाओं के लिए तो यहाँ आज भी तमाम सवालों की बेड़ियाँ पहले जैसी ही सख़्त और कसावट लिए हैं, इसे यहाँ साफ़ महसूस किया जा सकता है. हालांकि संथाल सहित तमाम आदिवासी जातियों में महिलाओं की स्थिति तथाकथित सभ्य सामाजिक ढ़ाँचों से कई मायनों में बेहतर है पर बुनियादी ज़रूरतों के सवाल से लेकर तमाम सुविधाओं तक महिलाएँ ख़ुद को उपेक्षित ही पाती हैं. सबसे ज़्यादा शिकायत है गाँवों में और ख़ासतौर पर आदिवासी परिवारों की महिलाओं की. कुछ कुरेदने पर वो बताती हैं, “जो कुछ भी महिलाओं के पास है वो हमारे अपने समाज और संघर्ष की देन है, सरकार और नेताओं का इसमें कोई योगदान नहीं.” लगता भी कुछ ऐसा है. जब हम संथाल परगना के एक गाँव, औराबरी पहुँचे तो देखा कि न तो महिलाओं के लिए कोई जच्चा अस्पताल था और न ही कोई महिला विद्यालय. पता चला कि ऐसी सुविधाएँ तो गाँव से ख़ासी दूरी पर हैं पर वहाँ तक पहुँचने के लिए गाँव से कोई सड़क या साधन अभी तक नहीं बना है. सो रही सरकार कई महिलाओं से जब इस बारे में बात की तो पता चला कि न तो आँगनबाड़ी कार्यक्रमों को ठीक ढँग से लागू किया गया है और न ही वृद्ध महिलाओं को पेंशन जैसी कोई सुविधा मिल रही है. क्षेत्र में विधवाओं को भी कोई सरकारी सहायता नहीं दी जा रही है. कई महिलाओं को तो यह भी नहीं मालूम था कि विधवाओं की मदद के लिए सरकार की योजनाएँ भी होती हैं. प्रसव का समय हो तो सबकुछ पारंपरिक तरीकों से ही. महिलाओं और बच्चों में कुपोषण से लेकर कई बिमारियों तक की तमाम ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच यहाँ के भीतरी गाँवों में रह रहे लोगों तक तो नहीं दिखती, हाँ कागज़ों पर संभव है कि हो. गाँव में लोगों ने बताया, “तहसील मुख्यालय से लगे स्कूल में तो मूरी-घुघरी मिल जाती है पर हमारे गाँवों के स्कूलों में बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन अभी नहीं पहुँचा है.” कमर पर नवजात बच्चों को टिकाए, अपने घरों का काम करती ऐसी युवा महिलाओं को यहाँ देखा जा सकता है जो उम्र से पहले माँ बन गई हैं. जागरूकता बड़े-बड़े सरकारी बोर्डों पर भले ही हो पर यहाँ तो नहीं दिखती. अपनों से उपेक्षा पर सरकार के अलावा अपने ही समाज में भी इन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिलता, ऐसा कहने से यहाँ की महिलाएँ नहीं हिचकतीं. यहाँ महिलाओं के लिए काम कर रही एक समाज सेविका, सुमारी मरांडी ने हमें बताया, “हमारे यहाँ दहेज जैसी कुप्रथा नहीं है. अपने लिए पति चुनने का हक भी हमें है पर पंचायत से लेकर गाँव के रास्तों तक हमारी स्थिति वैसी ही है, जैसी अन्य जगहों पर.”
वो बताती हैं, “घर की सारी ज़िम्मेदारी महिलाओं पर ही आधारित रहती है. महिलाओं की आमदनी और मेहनत से घर चलता है, अधिकतर पुरुष तो थोड़ा सा पैसा हाथ आते ही ताड़ी पीने चले जाते हैं पर दबाव महिलाओं पर ही रहता है और उपेक्षा भी उनकी ही होती है.” ख़ुद स्थानीय पत्रकार विनय सौरभ इस बात से सहमत हैं. वो बताते हैं, “आदिवासी समाज में महिलाओं के लिए जो स्थान है वो सामान्य रूप से देशभर में देखने को नहीं मिलता. इसके बावजूद अपने ही समाज में इनको बराबरी का दर्जा नहीं मिल रहा है.” उन्होंने बताया, “आदिवासी महिलाएँ स्वभाव में अन्य महिलाओं से ज़्यादा सरल और भोली होती हैं और समय-समय पर उन्हें इस भोलेपन की कीमत भी अदा करनी पड़ती है. शिकारीपाड़ा और काटीकोंद के इलाकों में कुछ महिलाओं को फुसलाकर बड़े महानगरों तक ले जाया गया है जहाँ वो घरों में काम करती हैं.” ऐसी कितनी ही चुनौतियों के बीच भी घर से लेकर तमाम सांस्कृतिक घरोहर को संभालने का ज़िम्मा महिलाओं पर ही है. संघर्ष से चोटिल कंधों पर घाव तो हैं पर थकावट नहीं और अपने अधिकारों की लड़ाई को वो ज़िम्मेदारियों के पूरा करते हुए ही निभा रही हैं. महिला दिवस पर इनके बारे में बात करना और सक्षम लोगों को इनकी याद दिलाना ग़लत न होगा. |
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