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शुक्रवार, 21 जनवरी, 2005 को 13:06 GMT तक के समाचार
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महिलाओं ने दिखाई नई राह

चौबीस परगना की महिलाएँ
महिलाओं ने दोपहर में 'घर में बैठकर गप्प लगाना बंद कर दिया था'
कहावत है-‘जहाँ चाह वहाँ राह.’

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना ज़िले के एक गाँव की महिलाओं ने इसे वाक़ई सच कर दिखाया है.

वहाँ जो काम नगरपालिका वर्षों में नहीं कर सकी और जिसकी मर्दों ने कल्पना तक नहीं की थी, उसे महिलाओं ने पूरा कर दिखाया है.

काम है गाँव से पक्की सड़क तक दो किलोमीटर लंबी संपर्क सड़क बनाने का. यह सड़क इलाके की जीवन रेखा बन गई है. गाँव में दो सौ परिवार रहते हैं.

 शुरू में महिलाओं की इस पहल को लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया था. लेकिन महिलाओं ने एक असंभव से काम को संभव कर दिखाया
गाँव के एक पुरूष

कहने को तो शक्तिनगर नाम का यह गाँव अशोकनगर-कल्याणगढ़ नगरपालिका के 22 नंबर वार्ड के तहत आता है. लेकिन बिजली और दूसरी नागरिक सुविधाएँ तो दूर, गाँव से हाइवे तक पहुँचने के लिए कोई ढंग की सड़क भी नहीं थी.

दो किलोमीटर लंबे इस टूटे-फूटे कच्चे रास्ते से ही मरीजों को वैन पर लिटाकर अस्पताल ले जाना पड़ता था. छात्रों और आम लोगों को भी रोजाना इसी रास्ते से जूझते हुए अपने स्कूलों और दफ्तरों को जाना पड़ता था.

बरसात के दिनों में तो यह कच्चा रास्ता चलने लायक नहीं रह जाता था. दिन में गाँव की महिला मंडली की एक बैठक में गाँव की ही चारूबाला राय ने प्रस्ताव रखा कि "दीदी, क्या हम गाँव के लोगों को इस मुसीबत से निजात नहीं दिला सकते."

प्रयास

उनके इस प्रस्ताव पर सबने हामी भर दी और इस तरह शुरू हो गया इस सड़क के निर्माण का काम. इससे पहले कई बार अनुरोध के बावजूद नगरपालिका धन की कमी का रोना रोकर रास्ता बनाने से इनकार कर चुकी थी.

सड़क
सड़क बन जाने से जिंदगी बहुत आसान हो गई है

महिलाओं ने अगले दिन से ही फावड़ा हाथ में लिया और कच्ची पगडंडी को सड़क की शक्ल देने में जुट गई. रोज अपने घरेलू कामकाज निपटाकर पतियों के दफ्तर जाने के बाद वे इस काम में जुट जाती थीं.

मर्दों ने पहले तो महिलाओं के इस प्रस्ताव की खिल्ली उड़ाई लेकिन उनके हौसले को देख कर बाद में उन्होंने भी छुट्टी के दिन इस काम में हाथ बँटाया.

दो महीनों की उनकी मेहनत से अब आठ फीट चौड़ी और दो किलोमीटर लंबी यह सड़क बनकर लगभग तैयार हो गई है.

इन महिलाओं में से एक चंपा हालदार कहती है कि "दो महीने तक हमने दोपहर की अपनी गप्पबाजी बंद कर दी थी."

चंपा के पति मानते हैं कि "शुरू में महिलाओं की इस पहल को लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया था. लेकिन महिलाओं ने एक असंभव से काम को संभव कर दिखाया."

नई आशा

इसी गांव की ताप्ती विश्वास और शंपा राय कहती हैं कि "अब कम से कम हमारे पतियों और बच्चों को आवाजाही की दैनिक दिक्कत से तो मुक्ति मिल जाएगी. इससे लगता है कि हमारी मेहनत सार्थक हो गई है. गाँव की महिलाओं ने साबित कर दिया है कि इच्छाशक्ति दृढ़ हो तो कोई भी काम असंभव नहीं है."

अब महिलाओं के साहसिक काम ने नगरपालिका के अधिकारियों को बगलें झांकने पर मजबूर कर दिया है. नगरपालिका के उपाध्यक्ष चित्त बसु कहते हैं कि "धन की कमी के कारण ही वहाँ विकास का कोई काम नहीं हो सका है. वे कहते हैं कि नगरपालिका अब जल्दी ही इलाके के लोगों की समस्याओं को सुलझाने की दिशा में पहल करेगी."

इन महिलाओं ने सिर्फ़ राह बनाई नहीं है बल्कि राह दिखाई भी है, अब देखना है कितने लोग इस राह पर चलते हैं.

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