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पाबंदी के बावजूद महिलाओं ने दौड़ लगाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लाहौर में पुरुषों और महिलाओं के एक साथ दौड़ने पर लगाए गए प्रतिबंध के ख़िलाफ़ सैकड़ों लोगों ने ऐसी ही दौड़ में हिस्सा लिया है. अधिकारियों ने कहा था कि इस तरह की दौड़ का आयोजन नहीं होने दिया जाएगा लेकिन पुलिस की मदद से एक किलोमीटर की इस रेस में कई महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर हिस्सा लिया. लोगों के अधिकारों के लिए काम करने वाली अस्मां जहांगीर ने कहा कि यह कानून और व्यवस्था की जीत है. इस रेस का विरोध कर रहे धार्मिक कट्टरपंथियों को पुलिस ने रेस से दूर रखा. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की प्रमुश अस्मां जहांगीर ने कहा कि वह रेस के आयोजन से बहुत खुश हैं. उन्होंने कहा " यह एक सांकेतिक मैराथन था जो यह सिद्ध करता है कि तानाशाही अब नहीं चलेगी. "
इस रेस में क़रीब 500 पुरुषों और महिलाओं ने हिस्सा लिया लेकिन अंतिम समय में इसके रास्ते में थोड़ा सा बदलाव कर दिया गया था. बीबीसी के पॉल एंडरसन का कहना है कि कई महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा यानी सलावर कमीज़ में थीं और कुछ महिलाओं ने ऊंची एड़ी की सैंडल पहन रखी थी. यह अभी साफ नहीं हो सका है कि अधिकारीगण ऐसी दौड़ पर लगे प्रतिबंध लागू क्यों नहीं कर पाए. शहर के मेयर मियां अमीर ने कहा था कि यह रेस नहीं होने दी जाएगी लेकिन टिप्पणी के लिए उनसे संपर्क नहीं हो सका. बाद में लाहौर के पुलिस प्रमुख आफ़ताब चीमा ने कहा कि कार्यकर्ता बहुत शांत थे पिछले हफ्ते इसी तरह के एक आयोजन को रोक दिया गया था.जिसके बाद से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस तरह के एक और रेस का आयोजन किया था. |
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