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विधवाओं ने तोड़ी वर्जनाएँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सैकड़ों विधवा महिलाओं ने सामाजिक परंपराओं का प्रतिकार करते हुए हाथों में मेंहदी रचाई और श्रृंगार किया, और यह सब हुआ राजस्थान में जो सामाजिक नियमों की सख़्ती के लिए जाना जाता है. जयपुर में विधवा महिलाओं के समागम में इन औरतों ने कहा कि वे समाज और सरकार दोनों के हाथों तिरस्कृत हैं. भारत में विधवाओं की संख्या लगभग साढ़े तीन करोड़ है जो समाज की सबसे उपेक्षित हिस्सा है. वैधव्य का विषाद झेल रही इन महिलाओं की ज़िंदगी में यह एक परिवर्तन का लम्हा था. चेतना के गीत गूंजे और उन्होंने अपने हाथों से एक-एक कर उन सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ा जो बेवा को दोयम दर्जे का जीवन जीने को विवश करती हैं. हाथ में मेंहदी रचाई तो ललाट पर बिंदी लगाई. सूनी कलाइयों पर चूड़ियों की खनक थी तो चेहरा आत्मविश्वास से भरपूर. सामंती परिवेश से निकली पाली जिले की कौशल्या कंवर से पूछा तो दिल का दर्द जुबान पर चला आया. कहने लगी, "बेवा का जीवन बहुत कठिन है, पति का बिछोह और ऊपर से समाज के तानों की बौछार. बेवाओं को समाज एक इंसान की बतौर जीने नहीं देता है." आंकड़े बोलते हैं कि भारत में हर चौथे घर में कोई विधवा है और इनमें से कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर पर जबर्दस्त सामाजिक, शारीरिक और आर्थिक दबाव है. बड़ी संख्या 1991 की जनगणना के मुताबिक भारत में लगभग साढ़े तीन करोड़ विधवाएँ हैं, उनमें से आधी की उम्र 50 के आसपास है. इनमें से बहुत छोटा हिस्सा बेहतर जीवन जी पा रहा है. लेकिन विधुर और विधवा लोगों के आंकड़ों का अंतर देखें तो चौंक जाएँगे. भारत में केवल 25 प्रतिशत पुरूष विधुर हैं. इन महिलाओं के एकल नारी शक्ति संगठन की जिन्नी श्रीवास्तव के मुताबिक महिला आबादी का आठ प्रतिशत विधवाएँ हैं. शक्ति संगठन की ओर से आयोजित इस विधवा समागम में हर औरत के साथ दर्द की कोई न कोई दास्तान थी. कश्मीर के बांदीपुरा से आई निसार दोनों पैरों से अपाहिज थी. शौहर चरमपंथ के रास्ते चलते हुए मारा गया तो निसार की दुनिया ही उजड़ गई. कहने लगी "शौहर मिलीटेंट था तो इसमें उसका या मेरे बच्चे का क्या कसूर था. हमारी कोई मदद नहीं कर रहा है." कश्मीर से आई सामाजिक कार्यकर्ता एच मुज़फ्फर कहती हैं, "घाटी में चरमपंथ के चलते बेवा हुई औरतों की संख्या 19 हज़ार है लेकिन ग़ैर सरकारी तौर पर यह संख्या बहुत ज्यादा है. इन बेवाओं के लिए पीहर और ससुराल कहीं ठौर नहीं है." उपेक्षा कोटा ज़िले की मोहिनी के पति की मृत्यु बहुत कम उम्र में ही हो गई. वे कहती हैं कि "रोजी-रोटी के लिए घर से बाहर निकलो तो लोग फब्तियाँ कसते हैं. कई बार मरने की इच्छा होती लेकिन छोटे बच्चे की तरफ देखती हूँ तो कदम थम जाते हैं."
आदिवासी बहुल डूंगरपुर की डूलीबाई का कहना था कि बेवा को अपशकुन समझा जाता है. उसे शादी-विवाह जैसे मुबारक मौकों से परे रखा जाता है. उन्हें अभागी और डायन जैसे शब्दों से संबोधित किया जाता है. एकल नारी शक्ति संगठन की मंजुला जोशी कहती हैं. मेंहदी लगाना प्रतिकार का परिचायक है. यह समाज की अमानवीय परंपराओं के विरूद्ध विद्रोह की मुनादी है. इस समागम में देश भर की डेढ़ हजार महिलाओं ने भाग लिया और तीन दिन तक सुख-दुख बाँटे. राज्य सरकार का कोई भी मंत्री इन बेवाओं का सुध लेने का समय नहीं निकाल सका. यहाँ तक कि राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तक को भी समय नहीं मिला. धर्मशास्त्रों में नारी देवी दुर्गा और सरस्वती है. पर इन औरतों के चेहरों से झलकता दर्द बताता है कि औरत तो समय के शिलालेख पर मुद्रित उदासी है. कहीं बंदिनी है तो कहीं दासी. न जाने उसकी मुक्ति का मार्ग कब प्रशस्त होगा. |
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