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मंगलवार, 27 जुलाई, 2004 को 10:42 GMT तक के समाचार
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साथ नमाज़ पढ़ने के हक़ की लड़ाई

असरा नोमानी
असरा नोमानी चाहती हैं कि महिलाओं को पुरुषों के साथ ही नमाज़ अदा करने की अनुमति हो
अमरीका में बसी एक भारतीय महिला असरा नोमानी ने मुस्लिम औरतों के इस्लाम में बताए गए अधिकारों के लिए एक नई लड़ाई छेड़ दी है.

और इस लड़ाई के तहत उन्होंने पहला क़दम ये उठाया कि एक स्थानीय मस्जिद में सामने के दरवाज़े से ही भीतर गईं और वहाँ पुरुषों के साथ ही नमाज़ अदा की.

इसके बाद से वहाँ मुस्लिम समुदाय में ये गर्मागर्म बहस चल रही है कि क्या किसी महिला को मस्जिद में मर्दों के साथ नमाज़ पढ़ने का अधिकार है?

पश्चिमी वर्जीनिया के मॉर्गनटाउन की मस्जिद में एक 'ट्राइब्यूनल' असरा नोमानी पर प्रतिबंध लगाना चाहता है.

सभी पुरुष सदस्यों वाले इस 'ट्राइब्यूनल' का मानना है कि असरा नोमानी अक्सर मुसीबतें खड़ी करती हैं.

यह 'ट्राइब्यूनल' प्रचार कर रहा है कि असरा नोमानी मज़हब के ख़िलाफ़ काम करने वाली और रास्ते से भटकी हुई महिला हैं जो पश्चिमी रंगों में रंग गई हैं.

उनका तर्क है कि महिलाओं को मस्जिद में पिछले दरवाज़े से ही दाख़िल होना चाहिए, बाल्कनी में नमाज़ अदा करनी चाहिए और ख़ामोशी से वापस लौट जाना चाहिए.

धार्मिक महिला

लेकिन एक धार्मिक और समझदार महिला के रुप में असरा नोमानी के गले यह बात नहीं उतरती.

 मैंने माँग की थी कि इस मामले की सार्वजनिक रुप से सुनवाई की जाए लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया
असरा नोमानी

असरा नोमानी का कहना है, "मैंने माँग की थी कि इस मामले की सार्वजनिक रुप से सुनवाई की जाए लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया."

वे बताती हैं कि किस तरह एक 'प्लास्टिक बैग' से लोगों के नाम निकालकर 'ट्राइब्यूनल' बनाया गया और उस 'ट्राइब्यूनल' के सामने पेश होना कितना कठिन था.

असरा कहती हैं, "अब मुझे ऐसे बहुत से लोगों का समर्थन मिल रहा है जो यथास्थिति बनाए रखने के विरोधी हैं. मेरे सवाल का जवाब इस्लाम में ही मौजूद है."

मुंबई में पैदा हुई असरा नोमानी कट्टर धार्मिक महिला हैं और उनके लिए यह बात पीड़ादायक होगी कि उन्हें मस्जिद विधर्मी क़रार दे दिया जाए.

वह अपने आपको एक ऐसी आधुनिक महिला की तरह देखती हैं जो धार्मिक भी हैं और इन दोनों में कोई विरोधाभास नहीं देखतीं.

असरा नोमानी अपने परिवार के साथ
परिवार वालों का पूरा समर्थन है असरा को

असरा नोमानी एक ऐसे धार्मिक मुस्लिम परिवार से हैं जहाँ बुर्क़ा पहने की बजाय इस्लाम की शिक्षा को ज़्यादा महत्व दिया जाता है.

उनका परिवार भारत के हैदराबाद का रहने वाला है लेकिन जब वे चार साल की थीं तभी अमरीका आ गए थे.

उनके पिता एक रिटायर्ड प्रोफ़ेसर थे. उन्होंने मॉर्गटाउन की इस मस्जिद के निर्माण में सहयोग दिया था और वे अपनी बेटी के साथ उसकी लड़ाई में साथ खड़े थे लेकिन पिछले हफ़्ते उनकी मृत्यु हो गई.

असरा ख़ुद एक पत्रकार हैं और वे 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' और 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के लिए लिखती हैं. इन दिनों वे अपने लिए एक वकील की तलाश में हैं जो इस मामले में उनकी सहायता कर सके.

जो लोग असरा का समर्थन कर रहे हैं उन्हें चुप करा दिया गया है हालाँकि उनको अपने स्थानीय समुदाय के बाहर अच्छा समर्थन मिल रहा है.

समझ का फ़र्क

असरा कहती हैं कि उनके इलाक़े के मुस्लिम उनको सही तरह से समझ नहीं पा रहे हैं.

मस्जिद का 'ट्राइब्यूनल' कहता है कि असरा नोमानी ने इस्लामिक परंपराओं को चुनौती दी है.

उनका तर्क है कि पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग नमाज़ अदा करने के लिए इसलिए कहा जाता है क्योंकि नमाज़ में एक साथ झुकने और उठने के दौरान महिलाओं और पुरुषों के कंधे आपस में छू सकते हैं.

अमरीका में मस्जिद
अमरीका में मस्जिदों की संख्या बढ़ी है और नई मस्जिदों में महिलाओं को अलग नमाज़ अदा करनी पड़ती है

कुछ महिलाएँ मानती हैं कि असरा अपनी पत्रकारिता का इस्तेमाल करके एक ग़लत मसले के समर्थन में कड़े लेख लिख रही हैं.

असरा नोमानी का कहना है कि अमरीका की मस्जिदों में पुरुषों और महिलाओं को एक साथ नमाज़ अदा करने से रोका जा रहा है जबकि मक्का की पवित्र मस्जिद में इसकी इजाज़त है.

काउंसिल ऑफ़ अमेरिकन इस्लामिक रिलेशंस के अनुसार पिछले बरसों में मस्जिदों की संख्या बढ़ी है और उन सभी मस्जिदों में महिलाओं को या तो दूसरे कमरे में नमाज़ अदा करने के लिए कहा जा रहा है या फिर एक कमरे में कोई आड़ लगाकर उन्हें अलग किया जा रहा है.

वैसे कैलिफ़ोर्निया, मिनेसोटा और मैरीलैंड में महिलाओं ने इसका विरोध किया है कि उन्हें एक दूसरे कमरे में ठसाठस भर दिया जाए जहाँ उन्हें कुछ सुनाई भी नहीं पड़ता.

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