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जेल सुधार की प्रेरणा भारत से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका और भारत की जेलों में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है लेकिन अब भारत के तिहाड़ जेल की तर्ज़ पर वहाँ भी आदर्श कारागृह बनाने की कोशिश की जा रही है. श्रीलंका के जेल विभाग के कमिश्नर जनरल रूमी मरज़ूक ने आए दिन हंगामा मचाने वाले कैदियों को शांत और व्यस्त रखने का उपाय ढूँढ लिया है. राजधानी कोलंबो के वेलिकडा कारागार और देश के कुछ चुने हुए जेलों में दिल्ली की तिहाड़ जेल की तर्ज़ पर ध्यान और योगासन का कार्यक्रम शुरु किया गया है. हर बंदी को रोज़ विपश्यना पद्धति के अनुसार ध्यान लगाने का प्रशिक्षण दिया गया है. आजकल कारागार के सभी कैदी जेल के विशाल प्रांगण में एकत्रित होते हैं और एक घंटे तक योगासन और ध्यान करते हैं. रूमी मरज़ूक कहते है "किरण बेदी हमारी प्रेरणा हैं. उन्होने विपश्यना का कार्यक्रम तिहाड़ जेल में शुरु किया था. उसकी सफलता को देखकर यहाँ भी हमने उसको अपनाया. पिछले एक साल से यह कार्यक्रम हमारे यहाँ चल रहा है. इससे कैदियों पर काफी प्रभाव पड़ा है. बहुत सारे कैदी तो रिहा होने के बाद भी इसे कर रहे हैं." जेल अधिकारियों के अनुसार जिन कारागारों में यह कार्यक्रम शुरु किया गया वहाँ दंगे या भूख हड़ताल नहीं हो रहे हैं. कैदी बहुत शांत हो गए हैं. दो महीने पहले जब किरण बेदी श्रीलंका आई थीं तो जेल विभाग के अधिकारियों ने उन्हें इस प्रयोग के बारे में बताया. एक जेल अधीक्षक का कहना था, "वो हमारी रिपोर्ट सुनकर काफी प्रसन्न हुईं." नई कोशिश श्रीलंका का कारागार विभाग तिहाड़ जेल से एक कदम आगे बढ़ गया है. यहाँ अब जेल में रेडीमेड कपड़े बनाने की फैक्ट्री तक लगा दी गई है. दक्षिण एशिया में श्रीलंका ऐसा पहला देश है जहाँ जेल के अंदर व्यावसायिक स्तर पर रेडीमेड कपड़े तैयार किए जा रहे हैं.
कैंडी शहर में देश की सबसे पुरानी जेल, बोगोमबरा कारागार में पहली फैक्ट्री पिछले साल खोली गयी थी. फ़्रीडम एक्स के नाम से जाने जानी वाली इस फैकट्री में जेल के ऐसे कैदियों को रखा गया है जिनकी सज़ा की अवधि लंबी है. दो सौ कैदियों को कपड़ा सिलने के आधुनिक तकनीक में प्रशिक्षण देने और बाद में रोज़गार देने वाली इस फैकट्री को कारागार विभाग नहीं बल्कि एक प्राइवेट कंपनी चला रही है. नील बोगोहलंदा इस कंपनी के प्रबन्ध निदेशक हैं. इस फैक्ट्री को खोलने की योजना नील ने ही बनाई थी. नील ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय से एमबीए करने के बाद जब वो अपने शहर कैंडी वापस आए तो उन्होंने जेल अधिकारियों के सामने यह योजना रखी. कुछ हिचकिचाहट के बाद जेल विभाग तैयार हो गया. नील का कहना है "जेल में कैदियों के पास समय है. उस समय का सही उपयोग वो इस फैक्ट्री में कर रहे हैं. यहाँ काम करने वाले हर कैदी को उतना ही पैसा मिलता है जितना कि बाहर किसी गारमेंट फैक्ट्री में दिया जाता है." भविष्य बालकृष्णा को हत्या करने के ज़ुर्म में आजीवन कारावास की सज़ा मिली है. वो इस फैकट्री में काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि रिहा होने के बाद वो दर्जी की दुकान खोलेंगे. "यहाँ काम सीख लिया है. बाहर निकल कर अगर नौकरी नहीं मिली तो कम से कम दर्जी की दुकान खोलकर अपनी बीबी, दो बच्चों और माँ की देखाभाल तो कर लूँगा." यहाँ काम करके रिहा होने वाले हर कैदी को इस बात का प्रमाणपत्र दिया जाता है कि वो गारमेंट फैक्ट्री के हर विभाग मे काम करने में दक्ष है. नील कहते हैं कि इस प्रमाणपत्र के आधार पर कैदी को रिहाई के बाद किसी भी गारमेंट फैक्ट्री में आराम से नौकरी मिल जाएगी. कैंडी मे फैक्ट्री की सफलता को देखकर अब कोलंबो के कारागार में भी ऐसी ही एक फैक्ट्री खोली गई है. तमाम क़ैदी जो रिहाई के करीब हैं और इस फ्रीडम एक्स फैक्ट्री में काम कर रहे हैं, वो रिहा होकर नए सिरे से ज़िंदगी शुरु करने के लिये उतावले हैं. इस फैक्ट्री ने इनके मन में एक नई उम्मीद जगा दी है. |
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