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सोमवार, 20 सितंबर, 2004 को 14:27 GMT तक के समाचार
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भारतीय मूल के नौजवान बदहाल

भारतीय मूल के छात्र
छात्रों के लिए पूरे इलाक़े में कोई कॉलेज नहीं है
श्रीलंका के मध्य भाग में हरी-भरी पहाड़ियाँ ऐसी लगती हैं कि मानो उन पर किसी ने हरे रंग की कालीन बिछा दी हो.ये हैं श्रीलंका के मशहूर चाय बागान.

यहाँ काम करने वाले ज़्यादातर लोग भारत से आए हैं. जब अँग्रेज़ों ने यह बागान शुरु किए थे तब यहाँ मज़दूरों की कमी थी इसलिए वे भारत के दक्षिणी भाग से मज़दूरों को यहाँ लाए थे.

ज़्यादातर लोग तमिलनाडु से आए इसीलिए इन्हें भारतीय मूल के तमिल समुदाय के रूप में जाना जाता हैं. लगभग डेढ़ सौ साल पहले हज़ारों परिवार यहाँ आकर बस गए थे. अब इनकी संख्या बढ़कर लगभग 10 लाख हो गई है.

इनका प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी सीलोन वर्कर्स काँग्रेस इतनी शक्तिशाली हो गई है कि उसके समर्थन के बिना देश की शक्तिशाली पार्टी भी सरकार नही बना पाती.

राजनीतिक दृष्टि से इतना प्रभावशाली होने के बावजूद भी इस वर्ग की हालत अच्छी नहीं है. इनके पूर्वज जिस तरह रह रहे थे, ये लोग आज भी उसी दशा में हैं.

हालाँकि अब चाय बागानों का प्रबंध स्थानीय कंपनियों के हाथ में है फिर भी मज़दूरों की दशा में कोई खास सुधार नहीं हुआ है.

बुरी हालत

सबसे ज्यादा परेशान हैं इस वर्ग के युवा. अधिकतर युवा अपने माता-पिता की तरह चाय के बागान में काम नही करना चाहते हैं क्योंकि वहाँ कड़ी मेहनत के बावजूद कमाई ज़्यादा नही होती हैं, फिर जीवन की और सुविधाएँ भी नही हैं.

 हर अच्छे स्कूल में डोनेशन माँगते हैं, वो भी एक या दो हज़ार नहीं बल्कि 10 या 15 हज़ार माँगते हैं. मेरे पास इतना पैसा नहीं है
राजमणि, छात्र

रामकृष्णा पिछ्ले तीन सालों से नौकरी की खोज में लगा है,पर कहीं नैकरी ही नहीं मिल रही है. उसने अपने गाँव के पास के स्कूल से मैट्रिक पास किया. वैसे तो वो वकालत करना चाहता है,पर हाई स्कूल के आगे पर शिक्षा की कोई सुविधा ही नहीं है.

रामकृष्णा ने सोचा था कि वो 12वीं कक्षा में साईंस और गणित पढ़ेगा पर ये संभव नही हुआ क्योंकि आसपास के किसी भी स्कूल में ये विषय नहीं पढ़ाए जाते.

रामकृष्णा कहते हैं कि अगर वे ये विषय पढ़ना चाहते हैं तो उन्हें या तो राजधानी कोलंबो जाना होगा या फिर हैटन, जो कि उनके गांव से काफ़ी दूर है.

वे कहते हैं, "वहाँ तक जाना संभव नहीं हैं क्योंकि मेरे परिवार के पास इतना पैसा नही है कि वो मुझे हॉस्टल भेज सकें."

बदहाली
चाय बागान में काम करने वाले भारतीय बुरी हालत में हैं

वही लोग अपने बच्चों को हॉस्टल भेज पाते हैं जिनकी माली हालत अच्छी है पर ऐसे बहुत ही गिने-चुने परिवार हैं. नेताओं के बच्चे या तो कोलंबो या फिर भारत में पढ रहे हैं.

राजमणि इस साल 10वीं पास करने वाला है. उसके पिता ने हैटन के स्कूल मे भर्ती की कोशिश की थी लेकिन दाखिला इसलिए नहीं मिला क्योंकि राजमणि के पिता के पास डोनेशन देने के लिए पैसे नहीं थे.

राजमणि कहते हैं "हर अच्छे स्कूल में डोनेशन माँगते हैं,वो भी एक या दो हज़ार नहीं बल्कि 10 या 15 हज़ार माँगते हैं. मेरे परिवार के पास इतना पैसा नहीं है."

पडोस की विनोदिनी 12वीं कक्षा की छात्रा हैं. उसने होम साईंस ले लिया है ताकि वो कुछ कढ़ाई,बुनाई करके अपने माँ-बाप का बोझ हल्का कर सके.

उसके दो भाई 12वीं पास करके बेरोज़गार हैं. विनोदिनी का कहना है कि बेरोज़गारी एक अभिशाप बन गई हैं, "अगर ऎसा ही हाल रहा तो हम लोग क्या करेंगे? कब तक माता-पिता हमारी देखभाल कर सकते हैं."

प्रांतीय सरकार इस कोशिश में थी कि किसी तरह से तमिलनाडु से कुछ शिक्षकों को यहाँ बुलाया जाए पर कोई आने को तैयार ही नहीं है.

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