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सुरक्षा विधेयकों पर तीखी बहस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और ग़ैर क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम संबंधी) संशोधन विधेयक में मौलिक अधिकारों और जनता की कड़े क़ानूनों की माँग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है. लोकसभा में बुधवार को गृह मंत्री पी चिदंबरम ने इन दोनों विधेयकों पर बहस की शुरुआत के समय ये विचार व्यक्त किए. उधर विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, "हम सैद्धांतिक रूप से सत्तापक्ष से सहमत हैं. अच्छा है कि कांग्रेस ने 10 साल के बाद अपना रूख़ बदला है और ये माना है कि कड़े क़ानून की ज़रूरत है. हम तो ये बहुत पहले से कह रहे थे." केंद्र और राज्यों के अधिकार गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा, "सरकार ने कोशिश की है कि वह मौलिक अधिकारों और जनता की कड़े क़ानून बनाने की माँग के बीच न्यायसंगत संतुलन कायम करे. इसके साथ दो विधेयक लाए जा रहे हैं जिनसे कारगर ढंग से आतंकवाद का मुकाबला किया जा सके." राष्ट्रीय जाँच एजेंसी के अंतरगत कार्रवाई कुछ विशेष परिस्थितियों में ही की जाएगी क्योंकि सरकार को ख़ास घटनाओं की जाँच का अपना मूल कर्तव्य निभाना है. उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे सर्वसम्मति से विधेयकों को पारित करें और यदि उन्हें इनमें कोई कमियाँ नज़र आएँ तो उन्हें अगले संसद सत्र में दूर किया जा सकता है. उनका कहना था कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी के गठन से राज्यों के मामलों की जाँच के अधिकार पर असर नहीं पड़ेगा और राज्यों का भी जाँच में सहयोग लिया जाएगा. चिदंबरम का कहना था, "हमनें केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के जाँच के अधिकारों के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश की है." इन विधेयकों में किसी संदिग्ध व्यक्ति को बिना मुकादमा चलाए पुलिस हिरासत में रखने और ज़मानत संबंधी भी विस्तृत्व प्रावधान हैं. 'सुबह का भूला...भूला ही है' उधर विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सिद्धांत तौर और मूल रूप से इन विधेयकों के बारे में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से सहमत है. उनका कहना था कि उन्हें संतोष है कि दस साल बाद कांग्रेस ने अपने मूल रुख़ में परिवर्तन किया है और ये समझा कि वर्तमान क़ानून पर्याप्त नहीं हैं. उनका कहना था कि भारतीय जनता पार्टी तो बहुत समय पहले से ही ऐसा कहती आई थी. आडवाणी ने उदाहरण दिया, "अमरीका में ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद संयुक्त राष्ट्र ने एक प्रस्ताव पारित किया और देशों को सूचित किया कि उनके मौजूदा क़ानून, पैदा हो रही परिस्थितियों के लिए क़ाफ़ी नहीं हैं. अमरीका ने ऐसे क़ानून बनाए लेकिन उस समय का विपक्ष और मौजूदा सत्ताधारी पार्टियाँ इससे सहमत नहीं थीं. हमने पोटा बनाया तो आपने ऐसा बर्ताव किया जैसे हमने कोई अपराध कर डाला." सत्तापक्ष पर कटाक्ष करते हुए आडवाणी का कहना था - 'सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहलाता....लेकिन इस बीच यदि अनर्थ हो जाए और बहुत नुक़सान हो जाए.....तो वह भूला ही है." आडवाणी का कहना था कि उन्हें पता है कि टाडा का दुरुपयोग हुआ था लेकिन उनका कहना था कि प्रयास ये होना चाहिए कि क़ानून सख़्त हो लेकिन उसका दुरुपयोग न हो. उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संयुक्त प्रगतिशील गठबंदन अध्यक्ष सेनिया गांधी का नाम लेते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि चरमपंथी घटनाएँ तो क़ानून की समस्या हैं, इनसे राज्य सरकारें निपटेंगी और वर्तमान क़ानून काफ़ी हैं. |
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