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'मिट्टी' को नहीं मिल रही मिट्टी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हम उनको मुसलमान नहीं मानते. उन्होंने जो किया, कोई मुसलमान नहीं कर सकता. और जब वो मुसलमान हैं ही नहीं तो उन्हें मुसलमानों के कब्रिस्तान में क्योंकर जगह मिले..... यह कहना है मुंबई में मुसलमानों के एक प्रतिष्ठित संगठन, मुस्लिम काउंसिल ट्रस्ट का. मुंबई के पिछले सप्ताह हुए चरमपंथी हमले में जहाँ 190 लोगों ने अपनी जान गवाँई थीं वहीं नौ चरमपंथी भी मुठभेड़ में मारे गए थे. मारे गए लोगों के शवों को तो परिजनों को सौंपा जा चुका है या सौंपा जा रहा है पर चरमपंथियों की लाशों का कोई नामलेवा तक नहीं है. सोमवार की इन चरमपंथियों के शवों के पोस्टमार्टम का काम भी पूरा कर लिया गया. अब बारी है उस काम की जो किसी को भी मरने के बाद मिलता है. मिट्टी हो चुके इन शरीरों को मिट्टी की आस है, पर जिन शवों की पैदाइश की मिट्टी को लेकर ही अभी तक जाँच एजेंसियाँ कुछ खुलकर नहीं बोल रही हैं, उन्हें मरने के बाद अब एक मुट्ठी मिट्टी तक नसीब होती नज़र नहीं आ रही. वे मुसलमान नहीं.. वजह है कि हमलों के बाद हुई मुठभेड़ में मारे गए नौ चरमपंथियों को मुंबई के मुसलमानों ने कब्रिस्तान में दफ़न करने से मना कर दिया है. मुंबई में मुसलमानों के संगठन मुस्लिम काउंसिल ट्रस्ट ने कहा कि इन लोगों को भारत की ज़मीन पर या मुसलमानों के कब्रिस्तान में दफ़न नहीं किया जाना चाहिए. भारत के मुसलमानों ने इन हमलों के प्रति अपनी नाराज़गी ज़ोरदार तरीक़े से प्रकट की है, इससे पहले भारत के मुसलमानों ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ फ़तवे तो जारी किए हैं पर यह पहला मौक़ा है जब उन्होंने चरमपंथियों को दफ़न करने से इनकार किया है. और तो और, काउंसिल ने इस बारे में मुंबई के मुस्लिम कब्रिस्तानों की प्रबंधक कमेटियों से भी अपनी बात रखी है और कमेटियों ने उनकी बात से सहमति जताई है. मुस्लिम काउंसिल ट्रस्ट के प्रमुख इब्राहीम ताय कहते हैं कि इस तरह के हमले करने वाले मुसलमान नहीं हो सकते इसलिए उन्हें मुसलमानों के कब्रिस्तान में जगह नहीं दी जानी चाहिए. इब्राहीम ताय ने कहा, "वो मुसलमान हो ही नहीं सकते, जो इस्लाम के क़ायदे-क़ानूनों को नहीं मानता वह मुसलमान कैसे हो सकता है लिहाज़ा हम ये चाहते हैं कि इन्हें मुसलमानों के किसी भी कब्रगाह में दफ़न न किया जाए." मुंबई के चरमपंथी हमले में नौ हमलावर मारे गए थे और उनका एक साथी अजमल अमीर क़साब गिरफ़्तार किया गया था, उसने पुलिस को बताया कि मारे गए सभी लोग मुसलमान थे.
मुस्लिम काउंसिल के महासचिव सरफ़राज़ आरज़ू ने बताया कि इस फ़ैसले की सूचना अधिकारियों को भी दे दी गई है. उन्होंने बताया, "इस्लाम के मुताबिक वो सब किसी भी तरह सही नहीं हो सकता जो इन्होंने इस्लाम के नाम पर किया है. कमज़ोरों, बेगुनाहों, महिलाओं, बच्चों को निशाना बनाना इस्लाम में जुर्म है. यहाँ तक कि खड़ी फ़सल को नष्ट कर देना भी हराम बताया गया है. ऐसे में इस घृणित हरकत करनेवालों के लिए मुसलमानों के कब्रिस्तान में कोई जगह नहीं." उन्होंने बताया कि इस बारे में गृह विभाग और पुलिस को अपनी राय से अवगत भी करा दिया गया है. अगर इसकी अवहेलना होती है तो प्रशासन को ऐसा करने से पहले तीखे विरोध-प्रदर्शनों का सामना करना पड़ेगा. हालांकि इस नए फ़ैसले से भी इन चरमपंथियों के दफ़्न होने की संभावना ख़त्म नहीं होती. सरकारी स्तर पर म्युनिसिपल कार्पोरेशन लावारिस शवों को दफ़नाने का काम करती रही है. कुछ लोग भी लावारिसों के लिए दफ़न का सामान, जगह, बंदोबस्त मुहैया कराने का काम करते रहे हैं. मुसलमानों के कब्रिस्तानों में भी लावारिस लाशों को दफ़नाने की गुंजाइश है. चरमपंथियों के शव इस बिना पर भी मुसलमनों के कब्रिस्तानों में दफ़नाए जा सकते हैं. बहरहाल, चोट खाए दिलों में अब इन चरमपंथियों के शवों तक के लिए कोई जगह नहीं है पर क्या इन्हें इस्लाम के ख़िलाफ़ बताने भर से क्या समाज मानवता के ख़िलाफ़ हो सकता है, यह एक कड़वी बहस है. जब यही सवाल हमने काउंसिल महासचिव से पूछा तो उन्होंने स्वीकार किया कि इनकी दरिंदगी देखकर खुद अमानवीय नहीं हुआ जा सकता. पर सवाल इतना छोटा नहीं है और जवाब ऐसा ही मिलेगा. |
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