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रविवार, 30 नवंबर, 2008 को 04:35 GMT तक के समाचार
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वो साठ घंटे.....

ताज होटल
चरमपंथियों ने होटल ताज को अपना निशाना बनाया और सैकड़ों की तादाद में लोगों को बंधक बनाया
मुंबई में हुए हमलों के दौरान वहाँ बिताए गए साठ घंटे मैं शायद जीवन भर नहीं भूलूँगा. अगर मुंबई और ख़ासकर ताज पैलेस में हुई मुठभेड़ की तुलना न्यूयार्क के 11 सितंबर से की जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. दोनों ही हमले उन स्थानों पर किए गए जो दुनिया भर में उस शहर की तस्वीर के रूप में जाने जाते थे.

जब गुरुवार की पहली उड़ान से मुंबई पहुंचा तो सबसे पहले पड़ा ताज पैलेस, जो तब तक चरमपंथियों के हमले का पहला वार झेल चुका था.

मीडियाकर्मियों की कतार लग चुकी थी और देखनेवालों की भीड़ जमा लेकिन धीरे धीरे जैसे दिन चढ़ा होटल शांत रहा और पत्रकार कैमरों पर चिल्लाते रहे. लेकिन रात में शुरू हुई वो लड़ाई कई घंटों के बाद जाकर बंद हुई.

ये घंटे सभी के ऊपर भारी गुज़रे होंगे. ताज के पीछे नरीमन हाउस और ओबेराय तक मैं बार-बार जाता रहा लेकिन मन ताज पर ही अटका रहा.

ऑपरेशन

क़रीब 105 साल पुराने ताज होटल में चरमपंथी बार बार आग लगा देते थे मानो वो दिखाना चाहते हों कि वो पूरी दुनिया में मुंबई की छवि बदरंग कर रहे हों. सुरक्षा बलों ने बाद में कहा कि वो सेना को रोकने के लिए आग लगा रहे थे.

ऑपरेशन चलता रहा और इस बीच पत्रकारों, कैमरामैन, पुलिसकर्मी, चाय बेचनेवाले और दर्शकों में एक सामंजस्य सा हो गया था. शुक्रवार की शाम को जब भीषण गोलीबारी का दौर शुरू हुआ तो पत्रकार पीछे आ गए पर खिड़की के कुछ कांच छिटककर एक पत्रकार को जख्मी कर गए.

शांति हुई तो तरह-तरह की बातचीत होने लगी. कोई कह रहा था कि ये साल टाटा के लिए ठीक नहीं है. सिंगुर में जो हुआ, जगुआर ने बाद में और पैसे मांगे और अब उनके होटल का ये हाल. टाटा के लिए ये साल ख़राब है.

एनएसजी कमांडो
एनएसजी कमांडो की लंबे समय तक चरमपंथियों से मुठभेड़ चली

होटल के बाहर किसी प्रकार की कोई सूचना नहीं दी जा रही थी. लेकिन लग रहा था कि पुलिस को भी शायद ही कोई ख़बर थी क्योंकि वो भी तमाशबीन बन कर ही बैठे हुए थे.

शनिवार की सुबह मेरी हालत बहुत अच्छी नहीं थी. मैं रात भर का जगा हुआ था, लेकिन मन में था कि ताज पर जब अभियान ख़त्म हो तो मैं ज़रूर रहूँ.

सुबह का पहला कार्यक्रम करने के बाद वहीं बैठे-बैठे मेरी आंख लग गई और जीवन में शायद मैं पहली बार बैठे-बैठे सो गया. एक चायवाले की नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मेरे पास आकर कहा, चाय पी लो थक गए हो.

अफरातफरी

चाय की पहली चुस्की लेते ही होटल से गोलियों की तेज़ आवाज़ें आने लगी और इस बार ये आवाज़ें बहुत तेज़ थीं. होटल के एक हिस्से में आग लग चुकी थी लेकिन गोलियों की बौछार थम नहीं रही थी.

थोड़ी अफरातफरी में मुझे पीछे से अपने अंग्रेज़ी सेवा के मित्र मार्क डमेट की आवाज़ सुनाई पड़ी. अरे बीबीसी हिंदी,.. मैं पीछे मुड़ा तो मार्क ने कहा नीचे बैठ जाओ. अपना ख़्याल रखो.

मैं भूल गया था कि सारे पत्रकार ज़मीन पर लेट चुके थे और मैं अकेला खड़ा था. खैर मेरी जान तो बच गई, लेकिन चरमपंथी बच नहीं पाए. कुछ ही देर में अभियान ख़त्म हो गया. चरमपंथियों की जान गई और शायद पूरी मुंबई की जान में जान आई.

क़रीब साठ घंटों तक मुंबई ने और पूरे देश ने यह दुस्वप्न देखा, लेकिन बस डर इस बात का है कि ये देश, यहाँ के लोग और ख़ासकर नीतिनिर्धारक राजनेता इसे दुस्वप्न की तरह भुला न दें क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो फिर हम मज़बूर रहेंगे बार-बार ऐसे ही दुस्वप्न देखने के लिए.

उर्दू अख़बारउर्दू अख़बारों से...
उर्दू अख़बारों ने हमले से जुड़े कुछ अनसुलझे सवालों पर टिप्पणियाँ की है.
अख़बारदहशत, दर्द और आक्रोश
अख़बारों ने मुंबई हमलों को लेकर तनाव, ग़म और गुस्से को व्यक्त किया है.
हमलेहमले:कब क्या हुआ
मुंबई में बुधवार रात हुए चरमपंथी हमलों के पूरे घटनाक्रम पर सरसरी नज़र.
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