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संघीय जाँच एजेंसी पर संसद में बहस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने मंगलवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के गठन के लिए लोक सभा में एक विधेयक को पेश किया. इस विधेयक पर बुधवार को चर्चा हो रही है. पिछले माह मुंबई में हुए चरमपंथी हमलों के बाद राष्ट्रीय एजेंसी के गठन की माँग उठी थी. गृहमंत्री पी चिदंबरम ने लोक सभा में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी विधेयक के साथ ही गैर क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून में संशोधन के लिए भी एक विधेयक पेश किया. केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा कानून में संशोधन और एक संघीय जांच एजेंसी के गठन के प्रस्ताव की मंज़ूरी दिए जाने के एक दिन बाद सरकार ने इन दोनों विधेयकों को लोकसभा में पेश किया है. इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रीय जाँच एजेंसी के पास देश की संप्रभुता, सुरक्षा और एकता को ख़तरा पहुँचाने वाली घटनाओं की जाँच का अधिकार होगा. उल्लेखनीय है कि संगठित अपराधों की जांच के लिए केंद्रीय एजेंसियों को अधिकृत करने वाले इस विधेयक को कैबिनेट ने सोमवार को अपनी मंज़ूरी दी थी. विरोध हालांकि कुछ दल और नेता इन विधेयकों का विरोध भी कर रहे हैं. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मोहम्मद सलीम ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि उनकी पार्टी को ये विधायक मौजूदा स्वरूप में स्वीकार्य नहीं है. उनका कहना था कि पार्टी बुधवार को इस विधेयक में संशोधन का प्रस्ताव लाएगी. लेकिन उन्होंने विधेयक पर पार्टी की आपत्तियों को अभी बताने से इनकार किया. भारतीय जनता पार्टी के नेता अरुण जेटली ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि ये आधा अधूरा क़दम है, लेकिन चरमपंथ के ख़िलाफ़ किसी भी कठोर कार्रवाई के सरकारी प्रस्तावों का भाजपा समर्थन करेगी. ग़ौरतलब है कि मुंबई में गत 26 नवंबर को हुए चरमपंथी हमलों के बाद इस तरह की एजेंसी गठित किए जाने के प्रस्ताव ने जोर पकड़ा था. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी राष्ट्रीय जांच एजेंसी बनाने की वकालत की थी. हालांकि इस तरह की एक जाँच एजेंसी बनाए जाने का प्रस्ताव काफ़ी समय से विचाराधीन है. इसके पहले अनेक राज्य अपराधों को संघीय सूची में डाल कर उनकी जाँच केंद्रीय एजेंसी को दिए जाने पर असहमति व्यक्त कर चुके हैं. उल्लेखनीय है कि मुंबई में हुए चरमपंथी हमलों से उपजे हालात की समीक्षा के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में संघीय जाँच एजेंसी बनाने, केंद्र-राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाने, क़ानूनी ढाँचा और ख़ुफ़िया एजेंसियों को मज़बूत बनाने पर सहमति बनी थी. |
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