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छत्तीसगढ़ का राजनीतिक परिदृश्य | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैसे तो छत्तीसगढ़ राज्य का गठन वर्ष 2000 में हुआ था लेकिन तब उसे मध्यप्रदेश विधानसभा के लिए वर्ष 1998 में चुने गए विधायकों के विभाजन से बनी सरकार मिल गई थी. राज्य की जनता ने अपने लिए पहली सरकार चुनी दिसंबर, 2003 में. यह वही समय था जब मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में भाजपा को जीत हासिल हुई. छत्तीसगढ़ में भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष डॉ रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला किया. रमन सिंह पिछले पाँच सालों से राज्य में शासन चला रहे हैं और धीरे-धीरे वे राज्य भाजपा के सर्वमान्य नेता बन गए दिखते हैं.
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस में नेताओं के बीच जो खींचतान चलती रही है इसके चलते रमन सिंह को विपक्ष से वैसी चुनौती नहीं मिली जैसी कि एक मज़बूत विपक्ष से मिलती है. रमन सरकार रमन सिंह सरकार ने अपनी शुरुआत तो आदिवासियों को गाय, तेंदूपत्ता मज़दूरों को जूता बाँटने और नाइयों को नाई पेटी बाँटने जैसी योजनाओं से शुरु की थी. लेकिन ये योजनाएँ कारगर साबित नहीं हुईं.
लेकिन बाद में सरकार ने दो अहम योजनाएँ शुरु कीं. एक नक्सलियों से निपटने के लिए सलवा जुड़ुम और दूसरा राज्य में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को तीन रुपए किलो चावल देने की योजना. हालांकि सलवा जुड़ुम को सरकार अपनी योजना नहीं मानती और इसे जन आंदोलन बताती है लेकिन तथ्य है कि इसे चलाने के लिए जो ज़रूरी सहयोग है वह राज्य सरकार ही उपलब्ध करवा रही है. इस आंदोलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल खड़े हुए हैं और दूसरी ओर नक्सली भी दबाव में हैं. हज़ारों आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा है. उधर तीन रुपए किलो का चावल मिलने से ग़रीब रमन सरकार से ख़ुश हैं. सर्वमान्य नेता राज्य के वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि रमन सिंह को जब मुख्यमंत्री बनाया गया था तो वे राज्य के सबसे बड़े नेता नहीं थे लेकिन अब रमन सिंह का क़द इतना बड़ा हो गया है कि उनकी बराबरी पर कोई खड़ा हुआ नहीं दिखता.
उनके साथ केंद्र में मंत्री रहे रमेश बैस और दिलीप सिंह जूदेव का राज्य में उनका राजनीतिक वज़न वैसा नहीं है जैसा कि रमन सिंह का है. जूदेव तो भ्रष्टाचार के मामले में फँसने के बाद एक तरह से हाशिए पर ही चले गए हैं. लखीराम अग्रवाल का स्वास्थ्य अब राजनीतिक सक्रियता की अनुमति नहीं देता और बलीराम कश्यप बस्तर तक ही सीमित रह गए हैं. बृजमोहन अग्रवाल एक उभरते हुए युवा नेता थे और रमन सिंह सरकार के गृहमंत्री थे लेकिन बाद में उनके पर कतर दिए गए और अब वे पर्यटन, वन, राजस्व जैसे विभागों के मंत्री हैं. हो सकता है कि नंदकुमार साय यदि पिछला विधानसभा का चुनाव जीत जाते तो हो सकता है कि वे आदिवासी मुख्यमंत्री के रुप में शपथ लेते लेकिन वे चुनाव ही हार गए और अब वे लोकसभा के सदस्य हैं. विपक्ष जो विधानसभा राज्य को विरासत में मिल गई थी उसमें कांग्रेस विधायकों की संख्या अधिक थी और इसलिए अंकगणित के अनुसार राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी और अजीत जोगी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने. एक छोटे और नए राज्य के मुख्यमंत्री होने के बाद भी अजीत जोगी अपने निर्णयों के चलते देश भर में चर्चित और विवादित हुए.
एक तो उन्होंने बालको के निजीकरण का खुला विरोध किया और फिर उन्होंने विपक्ष में बैठी भाजपा के 12 विधायकों को तोड़कर कांग्रेस में शामिल कर लिया. कांग्रेस उनके ही नेतृत्व में चुनाव में उतरी और 2003 में उसे पराजय का सामना करना पड़ा. लेकिन इसके बाद अजीत जोगी पर भाजपा विधायकों की कथित ख़रीद-फ़रोख़्त का आरोप लगा और कांग्रेस आलाकमान के दरबार में उनका दबदबा एक तरह से ख़त्म हो गया क्योंकि पार्टी ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया. बाद में लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने विद्याचरण शुक्ल के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा और राज्य की 11 में से एकमात्र सीट कांग्रेस की झोली में आई. इन चुनावों में अजीत जोगी ख़ुद को मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रुप में पेश कर रहे हैं हालांकि पार्टी हाईकमान की अधिकृत घोषणा यह है कि वह किसी को मुख्यमंत्री के रुप में पेश नहीं करेगी. वैसे इन पाँच वर्षों में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई महेंद्र कर्मा ने. जब राज्य का निर्माण हुआ था तो सरकार के गठन से पहले भी कर्मा मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में थे. इस बीच वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ला नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और भाजपा से होते हुए कांग्रेस में लौट आए हैं. इसी तरह बसपा में शामिल हो चुके अरविंद नेताम भी अब कांग्रेस में हैं.
चरणदास महंत प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए थे लेकिन चुनाव के नज़दीक आते आते अध्यक्ष के पद पर धनेंद्र साहू को नियुक्त कर दिया गया और चरणदास महंत को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया और साथ में इसी पद पर सत्यनारायण शर्मा को बिठाया गया. इस बीच कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा राज्य के मामलों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं और उनकी यह भूमिका जारी है. राज्य के राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पिछले पाँच साल में कांग्रेस की राजनीति अजीत जोगी के इर्दगिर्द ही घूमती रही है. कभी उनके पक्ष में तो कभी उनके विरोध में. अन्य पार्टियाँ बहुजन समाज पार्टी छत्तीसगढ़ को हमेशा से एक ऊर्वर ज़मीन के रुप में देखती रही है और इसका सबूत यह भी हो सकता है कि बसपा के संस्थापक कांशीराम ने अपना पहला चुनाव छत्तीसगढ़ के जांजगीर से लड़ा था.
इसके बाद कांशीराम ने अपना ध्यान उत्तर प्रदेश में लगाना शुरु कर दिया और मध्यप्रदेश (जिसमें छत्तीसगढ़ शामिल था) में पार्टी इक्का-दुक्का सीटों पर जीतती रही और दूसरी पार्टियों के लिए चुनौती पेश करती रही. उत्तर प्रदेश में अपने दम पर चुनाव जीतने के बाद बसपा ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ में ध्यान लगाना शुरु किया है और चुनावों से दो महीने पहले ही अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. जातीय समीकरणों के हिसाब से टिकट वितरण सुविचारित दिखता है और लगता है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए इस बार बसपा गंभीर चुनौती पेश करेगी. उधर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी कुछ सीटों पर नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में है. हालांकि एनसीपी ने विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में बड़े स्तर पर चुनाव लड़ा था लेकिन वे एक ही सीट पर जीत हासिल कर सके थे. इस बार लगता नहीं कि पार्टी इतनी बड़ी तैयारी कर रही है. |
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