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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को चमत्कार की ज़रुरत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य के लोग जब पहली बार लोकसभा के लिए मतदान करेंगे तो संभव है कि वे एक नई प्रवृत्ति की ही शुरुआत करेंगे. सारे संकेत यही बताते हैं कि कभी कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले इस प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी स्वाभाविक रूप से शासक दल साबित होने जा रही है. अगर ऐसा हुआ तो राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और झारखंड की आदिवासी पट्टी के हृदय प्रदेश पर झंडा गाड़ने का भाजपा और संघ परिवार का सपना पूरा होगा. प्रदेश में भाजपा का उत्थान न तो अचानक हुआ है और न ही हैरान करने वाला है. छत्तीसगढ़ उन अंतिम इलाक़ों में से है जहाँ सबसे आख़िर में कांग्रेस का दबदबा समाप्त हुआ है. 11 सीटों का गणित कांग्रेस हिन्दी पट्टी में 1991 में भी काफ़ी सारे इलाक़ों में हारी थी लेकिन राजीव गांधी की हत्या के बाद हुए इस चुनाव में अकेले छत्तीसगढ़ इलाके में ही उसने दूसरों का पूरी तरह सफ़ाया कर दिया था. उसने यहाँ की सभी 11 सीटें जीती थीं और भाजपा पर उसकी बढ़त दस फ़ीसदी से ज़्यादा वोटों की थी. उसके बाद से भाजपा ने हर लोकसभा चुनाव में अपनी स्थिति अविभाजित मध्य प्रदेश के इस हिस्से में सुधारी थी. पिछले तीन लोकसभा चुनावों में वह शून्य से उठकर छह फिर सात और आख़िरकार आठ तक आ गई थी. पार्टी की कांग्रेस पर वोटों की बढ़त भी साथ ही होती गई.
1996 में बढ़त एक प्रतिशत थी जो आगे तीन और फिर चार फ़ीसदी हो गई. इस दौरान हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की बढ़ती ताक़त ढंग से सामने नहीं आई. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया और 1998 तक उसने अपनी हल्की बढ़त बनाए रखी. दिसंबर 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत असल में दशक भर से की जा रही उसकी राजनीतिक कोशिशों का नतीजा थी. फिर भी यह बात रेखांकित की जानी ज़रूरी है कि भाजपा को यहां कोई बहुत भारी बढ़त या शानदार जीत नहीं मिली. मध्य प्रदेश की शानदार जीत और राजस्थान में मिली आसान जीत की तुलना में भाजपा छत्तीसगढ़ में बस सत्ता में आ भर गई. उसे 90 विधानसभा सीटों में से 49 में जीत मिली पर वोट सिर्फ 39 फ़ीसदी ही मिले जो कांग्रेस को मिले वोटों से सिर्फ तीन फ़ीसदी ज्यादा हैं. राज्य के दक्षिणी आदिवासी इलाक़े में अगर कांग्रेस को अप्रत्याशित पराजय न मिली होती तो वह सत्ता में वापस आ जाती. इसके अतिरिक्त अगर कांग्रेस ने विद्याचरण शुक्ल वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया होता तब भी भाजपा को बहुमत नहीं मिलता. इसलिए अगर कोई हाल के विधासभा चुनाव के नतीजों के आधार पर अगले चुनाव का अंदाज़ा लगाए तो मुक़ाबला बहुत काँटे का लगेगा. अगर वैसा ही मतदान हुआ तो भाजपा को राज्य की 11 में से महज सात लोकसभा सीटों पर जीत मिलेगी जो पिछले लोकसभा से एक कम है. अगर वह विधानसभा चुनाव से दो फ़ीसदी ज़्यादा वोट पाने में सफल हो तब जाकर पिछली बार जितनी सीटें मिलेंगी. इसके बाद दो फ़ीसदी और वोट बढ़े तब उसे 10 सीटें मिलेंगी. संभावनाएँ और नई सरकार दूसरी ओर काग़ज़ी गणित पर ही सही, अभी कांग्रेस की संभावनाएँ समाप्त नहीं हुई हैं. अगर वह विधानसभा चुनाव की तुलना में दो फ़ीसदी ज़्यादा वोट ले जाए तो उसे छह सीटें मिलेंगी और भाजपा की पाँच सीटें ही रह जाएँगी.
अगर कांग्रेस के पक्ष में चार फ़ीसदी ज़्यादा वोट पड़े तो उसे सात सीटें मिल जाएँगी. पर कांग्रेस के लिए ज़मीनी स्थितियाँ आँकड़ों जैसी सुखद नहीं हैं. आमतौर पर विधानसभा चुनाव की जीत, बाद में होने वाले लोकसभा चुनाव में और बढ़ जाती है. छत्तीसगढ़ में भाजपा का ‘हनीमून’ वाला दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ है. लोकसभा चुनाव की संभावना देखकर राज्य सरकार ने 24 पैसे किलो नमक, ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले 50 हज़ार परिवारों को मुफ़्त गैस कनेक्शन, दाल-भात केन्द्रों पर पाँच रुपए में भरपेट भोजन, किसानों के तीस हज़ार रुपए तक की कर्ज़ माफ़ी जैसी अनेक लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा कर डाली है. सरकार ने आदिवासियों को उनकी जोत वाली वन भूमि का पट्टा देने की घोषणा की है. ये सही है कि ऐसी योजनाएँ बहुत आसान नहीं होतीं और असल में इन पर अमल करना बहुत मुश्किल होता है. सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासियों को पट्टा देने पर पहले ही रोक लगा दी है. पर चुनाव भर तक के लिए तो अमल की तुलना में घोषणा का ही काफ़ी महत्व है.
और बातें प्रभावी हों न हों मगर इतना तय है कि मतदाता नई सरकार को इतने कम समय में सज़ा नहीं देते, उसके ख़िलाफ़ मतदान नहीं करते. इतना ही नहीं है विधानसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस संगठन की हालत और ख़राब हुई है. कांग्रेस को एकदम तानाशाह अंदाज़ में चलाने वाले अजीत जोगी चुनाव के बाद भाजपा विधायकों की खरीदारी का आरोप लगने के बाद पार्टी से निलंबित हो गए. इसकी तुलना में भाजपा ने अपने यहां नेता चुनने के उलझन भरे मसले को भी काफी आराम से निपटा लिया. और भाजपा के आत्मविश्वास को इसी बात से समझा जा सकता है कि वह बदनाम दिलीप सिंह जूदेव को भी चुनाव मैदान में उतारने की सोच रही है. भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भी कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहता और वह विधानसभा चुनाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस के खाते में गए 7 फीसदी वोट को भी समेटने में लग गया है. आदिवासी नेता अरविंद नेताम और राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता विद्याचरण शुक्ल को भाजपा में शामिल किया जा चुका है. राज्य में जीत, नई सरकार के लोकलुभावन फैसले, राष्ट्रवादी कांग्रेस के भाजपा में विलय और कांग्रेसी खेमे का हतोत्साह प्रदेश में कांग्रेस ने अगले प्रदर्शन पर भारी पड़ सकता है. छत्तीसगढ़ में कुछ सीटें पाने के लिए कांग्रेस को चमत्कार ही करना पड़ेगा. |
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