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मंगलवार, 16 मार्च, 2004 को 19:07 GMT तक के समाचार
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तीन मोर्चों पर होगा मुक़ाबला

सोनिया गाँधी
सोनिया गाँधी की कोशिशें जारी हैं
एक-एक राज्य की चर्चा शुरू करने से पहले आइए हम एक समग्र नज़र डालें. आगामी लोकसभा चुनाव को तीन अखाड़ों की कुश्ती के रूप में देखना और हर राज्य को इन्हीं तीन तरह से एक श्रेणी में डालकर देखना उपयोगी होगा.

पंजाब से लेकर नीचे केरल तक का पश्चिमी मोर्चा, जिसमें पुराना पूरा मध्य प्रदेश शामिल है, राजग के लिए संभावनाओं से भरा क्षेत्र है.

यहाँ उसके न सिर्फ़ अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना है बल्कि उनके वोट और सीटों में वृद्धि हो सकती है.

पूर्वी मोर्चे पर तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल तक के प्रदेश हैं जिनमें बिहार, झारखंड और पूर्वोत्तर के राज्य शामिल हैं.

पिछले चुनाव में राजग इस इलाके में अपने चरम पर पहुँच चुका था और इस बार उसके लिए नुकसान को कम से कम रखना भारी चुनौती का काम होगा.

फिर एक उत्तरी मोर्चा है जिसमें उत्तर प्रदेश और उत्तर पश्चिम के छोटे राज्य शामिल हैं.

यह अन्य दो मोर्चों से इलाके में छोटा है लेकिन यहीं सबसे ज़्यादा अनिश्चितता बनी हुई है और यहीं 2004 की असली लड़ाई भी होनी है.

पश्चिमी मोर्चे पर तो मुख्य लड़ाई सीधे-सीधे भाजपा बनाम कांग्रेस की है. 1999 में राजग ने वहाँ की 202 सीटों में से जो 108 सीटें जीती थीं उनमें भाजपा का हिस्सा 88 था. कांग्रेस को 70 और उसके सहयोगी दलों को चार सीटें मिली थीं.

वाजपेयी
वाजपेयी का सारा ध्यान उत्तर प्रदेश पर लगा होगा

भाजपा ने सिर्फ़ पंजाब और महाराष्ट्र में गठबंधन किया था, महाराष्ट्र और केरल में कांग्रेस से सीधे मुक़ाबले की स्थिति में भाजपा मज़बूत लगती है.

पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल की कांग्रेसी राज्य सरकारों पुरानी हैं और लोग अब उसकी ग़लतियाँ गिनाने लगे हैं.

वहीं राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और एक हद तक गुजरात की भाजपा सरकारें नई हैं और लोगों का मोहभंग अभी शुरू नहीं हुआ है. मगर राजग 1999 की तुलना में यहाँ बहुत ज़्यादा सीटें पाने की उम्मीद नहीं कर सकता.

पंजाब और कर्नाटक के अलावा बाक़ी सभी स्थानों पर राजग ने पिछली बार काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया था.

महाराष्ट्र में राजग के वोट बढ़ सकते हैं पर कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस का गठबंधन हो जाने से राजग की सीटें घट सकती हैं.

केरल में अभी भाजपा अपने वोटों की सीटों में बदल पाने की स्थिति से काफ़ी दूर है और सारी उदारता से जोड़ने पर भी राजग इस मोर्चे पर पिछली बार के 108 सीटों में से 20 से ज़्यादा सीटें नहीं जोड़ सकता.

पूर्वी मोर्चा

पूर्वी मोर्चे पर राजग रक्षात्मक लड़ाई ही लड़ेगा. यहाँ मोर्चे पर भाजपा के सहयोगी दल और क्षेत्रीय पार्टियाँ ही हैं. झारखंड के अलावा और कहीं भी कांग्रेस बनाम भाजपा का मुक़ाबला नहीं होना है.

यहाँ राजग ने पिछली बार 198 में 133 सीटें जीती थीं जिनमें भाजपा के सहयोगी दलों का हिस्सा 87 था. यहाँ राजग को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

पिछली बार आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और झारखंड में उसकी लहर सी थी. अब चमत्कार ही उसे इतनी सीटें दिला पाएगा.

मायावती
मायावती भाजपा को सबक सिखाना चाहती हैं

तमिलनाडु में राजग विरोधी गठबंधन की प्रकृति और बिहार तथा पश्चिम बंगाल में भाजपा के सहयोगी दलों की स्थिति को देखते हुए नहीं लगता कि राजग 1999 के प्रदर्शन को दोहरा पाएगा.

सिर्फ़ असम और पूर्वोत्तर में ही राजग की स्थिति सुधरने के लक्षण हैं. पर यहाँ कुल सीटों की गिनती सिर्फ़ 25 है.

अगर राजग अपने नुक़सान को 40 सीटों तक निपटा ले तो भी वह भाग्यशाली होगा, स्थिति गड़बड़ हुई तो ये नुक़सान 60 या अधिक सीटों तक का हो सकता है इसलिए अब लड़ाई उत्तरी मोर्चे पर आ जाती है जिसमें उत्तर प्रदेश और उत्तर पश्चिम के छोटे राज्य शामिल हैं.

छोटे राज्यों में जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, हरियाणा और दिल्ली हैं जिनमें कुल 33 सीटें हैं.

इनमें से कांग्रेस को पिछली बार सिर्फ़ दो सीटें मिली थीं, वहाँ भाजपा की लहर थी जिसमें भाजपा ने 21 और उसके सहयोगी दलों ने छह सीटें जीती थीं.

भाजपा के लिए इस प्रदर्शन को दोहराना बहुत मुश्किल होगा वो भी ख़ासकर इंडियन नेशनल लोकदल से रिश्ता टूटने के बाद.

उत्तर प्रदेश में स्थिति अभी भी अस्पष्ट है क्योंकि यहाँ गठबंधनों की तस्वीर भी नहीं उभरी है, वैसे उत्तर प्रदेश को एक पूरा क्षेत्र ही माना जाना चाहिए.

भाजपा यहाँ बहुत लाभ पाएगी इसकी गुंजाइश नहीं लगती.

उसे उसके पुराने 25 स्थान भी मिल जाएँ तो बहुत संतोष की बात होगी. अगर बसपा-कांग्रेस का समझौता नहीं होता है तो समाजवादी पार्टी ही सबसे ज़्यादा लाभ में होगी और बाकी सबको नुक़सान हो सकता है.

वैंकया और आडवाणी
भाजपा दक्षिण भारत में पूरा ज़ोर लगा रही है

अगर बसपा-कांग्रेस साथ आ जाते हैं तो सपा और भाजपा दोनों को ही बहुत नुक़सान देंगे. चाहे जो हो, उत्तरी क्षेत्र में राजग अपना खाता शायद बढ़ा नहीं पाएगा और उसे 20 सीटों का नुक़सान हो सकता है.

पर इन सब के बावजूद चुनावी नतीजे इस बात पर निर्भर होंगे कि इन तीनों मोर्चे पर लड़ाई कैसी होती है.

संभावनाएँ

अभी अंतिम नतीजों के लिए अटकलें लगाने का वक़्त नहीं है या ऊपर वर्णित परिदृश्यों का अगर कोई मतलब है तो तीन तरह के नतीजे संभव हैं.

पहला ये कि राजग सत्ता में वापस आए मगर अभी की तुलना में कम सीटों के साथ.

दूसरी संभावना है कि राजग बहुमत से थोड़ा पीछे रुके.

मान लीजिए 20 स्थान पीछे, इस स्थिति में राजग विरोधी गठबंधन उससे काफ़ी पीछे होगा और राजग समाजवादी पार्टी जैसे दलों को साथ लेकर सरकार बना सकती है.

लेकिन तीन में दो मोर्चों पर भी अगर राजग ज़्यादा कमज़ोर पड़ा, ख़ासकर बसपा-कांग्रेस गठबंधन बनने की सूरत में तो तीसरी संभावना भी खुली है.

तब कांग्रेस, उसके सहयोगी दल और वामपंथी दलों की मिली-जुली ताक़त बहुमत से ऊपर होगी.

ये तीनों परिदृश्य बहुत दूर-दूर नहीं हैं और मात्र 50 सीटों की अदला-बदली में ये संभव है.

मगर इसके राजनीतिक परिणाम एकदम अलग-अलग होंगे.

(योगेंद्र यादव, भारत के सुपरिचित चुनाव विश्लेषक हैं और वे बीबीसी हिंदी ऑनलाइन के लिए विशेष रुप से लिख रहे हैं. चुनावों के दौरान वे नियमित रूप से लिखते रहेंगे.)

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