|
कोई लहर नहीं, लेकिन वोटर भी नाराज़ नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर चुनाव के बारे में मीडिया को ही फ़ैसला करना होता तो चौदहवीं लोकसभा के चुनाव अब तक कहाँ पहुँच गए होते और परिणाम भी मीडिया द्वारा लगाई जाने वाली अटकलों की तरह ही होते. ऐसा कहने का मतलब यह नहीं है कि मीडिया द्वारा कही जा रही सभी बातें निराधार हैं और न ही मैं 'इंडिया टुडे' और 'आउटलुक' द्वारा प्रकाशित राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षणों को खारिज कर रहा हूँ. हालांकि उनकी श्रेणी में मैं कुछ और विशुद्ध शहरी सर्वेक्षणों को शामिल नहीं करता. वर्षों से चुनाव की बारीक़ी को देखते रहने के चलते मुझे सामान्य राजनीतिक बुद्धि का भी महत्त्व मालूम चल गया है और इसी से मुझे अभी के शोर-शराबे पर ज़्यादा ध्यान न देने की सीख मिली है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की जीत के मौजूदा शोर-शराबे से मैं क्यों सहमत नहीं हूँ इसके कारणों में जाने से पहले मैं सामान्य राजनीतिक बुद्धि में समझ आने वाली बाक़ी बातों की चर्चा करना चाहता हूँ. ये बात सही है कि केंद्र में सत्ताधारी गठबंधन को इस बार 1977, 1980, 1989 और 1996 के लोकसभा चुनावों की तरह मतदाताओं की पूर्व नाराज़ग़ी का सामना नहीं करना पड़ रहा है. इस पहली बात से भी दूसरी बात जुड़ती है. लगभग पूरा कार्यकाल निभा चुकी सरकार को मतदाताओं की भारी नाराज़गी न झेलनी पड़े ये कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है. ये सही है कि राजग सरकार की इस उपलब्धि का असली आधार प्रधानमंत्री वाजपेयी की सार्वजनिक छवि भी है. सभी जनमत संग्रहों से ये बात स्पष्ट होकर सामने आती है कि पिछले पाँच वर्षों में चाहे जितने घोटाले और भंडाफोड़ हुए हों प्रधानमंत्री की छवि पर उनका प्रभाव नहीं पड़ा है और प्रधानमंत्री पद की एकमात्र दूसरी दावेदार सोनिया गाँधी से उनकी लोकप्रियता काफ़ी आगे है. फिर इस बात में भी संदेह नहीं है कि भाजपा चुनाव मशीनरी की सांगठनिक क्षमता के मामले में कांग्रेस से काफ़ी आगे है. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस जिस तरह विधानसभा चुनाव में हारी उससे ये चीज़ बहुत साफ़ ढंग से उजागर हुई. प्रयास करने पर कांग्रेस अपनी व्यवस्था को कुछ हद तक ठीक कर सकती थी लेकिन लोकसभा चुनाव के अवसर पर भी वही स्थिति दिखती है. भाजपा तो एकदम चुस्त-चौकस है पर कांग्रेस में दाएँ हाथ का काम बाएँ को मालूम नहीं है. तथ्य और नतीजे अब सवाल ये है कि इन तथ्यों से हम क्या नतीजे निकालें.
ये निष्कर्ष निकालना अनुचित नहीं होगा कि शासक राजग मतदाताओं के हाथों में उस तरह पिटने-धुलने नहीं जा रहा है जैसा कि पहले कई सत्ताधारी दलों के साथ हुआ है. कोई चाहे तो ये निष्कर्ष निकाल सकता है कि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन अपने विपक्षी खेमे की तुलना में चुनावी अवसरों का ज़्यादा लाभ उठा सकने की स्थिति में है पर इन चीज़ों को मैं इस नतीजे पर पहुँचने के लिए पर्याप्त नहीं मानता कि राजग अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने जा रहा है और फिर से सत्ता में आ रहा है. अगर ये बात सही है तो इसके साथ ही ये भी बताना होगा और उसके प्रमाण पेश करने होंगे कि देश भर में राजग के ख़िलाफ़ न सिर्फ़ नाराज़गी का अभाव है बल्कि उसके पक्ष में हवा है, 'फ़ीलगुड' है. फिर यह भी साबित करना होगा कि वाजपेयी की लोकप्रियता वोट देने के अन्य सभी कारणों पर भारी पड़ेगी. यह भी बताना होगा कि कैसे भाजपा बहुमत वाली संख्या के एकदम क़रीब है और सांगठनिक चौकसी भर से अब वह मैदान मार लेगी. मुझे इन मामलों में संतुष्ट करने लायक ठोस प्रमाण दिखाई नहीं दिए हैं इसलिए अंतिम नतीजों के बारे में मेरी शंकाएँ अभी भी बरक़रार हैं और मैं ज़्यादा विश्वसनीय प्रमाण मिलने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ. चुनाव में क्या होने वाला है इस बारे में हमारे सोच की एक मौलिक गड़बड़ी ये है कि हम अभी भी पुराने हिसाब से सोचते हैं जबकि ज़मीनी राजनीतिक सच्चाई बदल चुकी है. लहरों के दिन गए एक पार्टी के पक्ष में राष्ट्रव्यापी लहर चले और वह दल एक भारी बहुमत से चुनाव जीते, वे दिन अब लद चुके हैं.
1996 के बाद से चुनाव एक राष्ट्रव्यापी मुक़ाबला नहीं रह गया है. अब तो व्यावहारिक रूप से 28 मुक़ाबले एक साथ चलते हैं और राष्ट्रीय स्तर के नतीजे और कुछ नहीं इन सभी प्रांतीय स्तर के मुकाबलों का सकल जोड़ भर होता है. लोकसभा चुनाव के लिए भी राज्य ही राजनीतिक चुनाव की इकाई बन गए हैं. इसलिए चुनाव की संभावनाओं की चर्चा का उपयोगी तरीका हर राज्य को अलग-अलग देखना, वहाँ मुकाबले में खड़ी पार्टियों की क्षमता देखना, सामाजिक समीकरणों पर नज़र डालना और मौजूदा राजनीतिक परिदृश्यों को देखना है. इस श्रृंखला के लेखों में मैं यही करने जा रहा हूँ. ऐसे में ये सवाल नहीं है कि राष्ट्रीय स्तर पर राजग को बढ़त है या नहीं. निश्चित रूप से उसे बढ़त है मगर असली सवाल है कि क्या भाजपा और उसके सहयोगी दल राज्यों के स्तर पर इस बढ़त को सीटों के रूप में बदल सकेंगे. अभी ये एक खुला हुआ सवाल है. (योगेंद्र यादव, भारत के सुपरिचित चुनाव विश्लेषक हैं और वे बीबीसी हिंदी ऑनलाइन के लिए विशेष रुप से लिख रहे हैं. चुनावों के दौरान वे नियमित रूप से लिखते रहेंगे.) |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||