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गुजरात चुनावों के आंकड़े और ज़मीनी वास्तविकताएँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश-दुनिया के काफी सारे लोग इस आम चुनाव को ‘गुजरात’ के बाद पहला चुनाव मान रहे हैं. इसलिए राष्ट्रीय नतीजों पर ‘गुजरात प्रभाव’ को सभी देखने-जानने की कोशिश करेंगे. लेकिन ख़ुद गुजरात के लिए लोकसभा चुनाव का एक बिल्कुल ही अलग मतलब हो सकता है. गुजरात के लिए यह पहला अवसर है कि वह 2002 की घटनाओं को पीछे छोड़े और राजनीति की सामान्य धारा में वापस लौटे. अनेक अर्थों में यह चुनाव नफ़रत की राजनीति का पर्याय बने ‘गुजरात’ और सामान्य लोगों, सामान्य समस्याओं और सामान्य राजनीति वाले असली प्रदेश गुजरात के बीच का मुकाबला भी है. सिर्फ़ आँकड़ों के हिसाब पर जाएँ तो भाजपा गुजरात में बहुत अच्छी स्थिति में दिखेगी. राज्य में उसका प्रभुत्व इतना प्रबल है, जितना बीते 15 वर्षों में भाजपा का किसी भी अन्य राज्य में न था, जबकि यह कभी भी जनसंघ या भाजपा का गढ़ नहीं रहा है. 1991 में लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने प्रत्येक लोकसभा और विधानसभा चुनाव में गुजरात में भारी जीत हासिल की है. हर बार इसमें लगभग 10 फ़ीसदी वोटों की बढ़त बनायी है और राज्य की 26 में से 20 सीटें तक जीती हैं. बिहार के राष्ट्रीय जनता दल और पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार की तरह गुजरात की भाजपा सरकार ने एक दशक तक अपने ख़िलाफ लोगों को नाएनडीएी को चुनावी पराजय तक नहीं जाने दिया है. आंकड़ों की बात लेकिन आँकड़े ही सारी कहानी नहीं कहते.
असलियत यह है कि 1995 में सत्ता में आने के बाद से ही भाजपा सरकार को लोगों की नाराज़गी उठाते रहनी पड़ी है और यह चीज़ बार-बार दिखी है. इस तरह एक मायने में इस बार का चुनाव अलग है. काफ़ी समय बाद यह चुनाव बिना भावनात्मक मुद्दे के लड़ा जा रहा है. इस बार न खजूरिया है, न कारगिल है, न गोधरा है और ना ही उसके बाद हुए नरसंहार का मसला है. इसलिए भाजपा के लिए यह मुश्किल चुनाव हो सकता है. भाजपा की स्थिति उतनी सुखद नहीं है जितनी ऊपर से दिखती है. अगर वह 2002 विधानसभा चुनाव वाला प्रदर्शन दोहराती है तो यह राज्य की 26 में से 24 सीटें जीतकर अपने ही रिकार्ड को सुधारेगी. लेकिन अगर इसके वोट गिरने लगे तो सीटें भी दनादन गिरने लगेंगी. अगर दो फीसदी वोट भी कम हुए तो उसकी पाँच सीटें कम हो जाएँगी और कांग्रेस पिछले चुनाव की बराबरी पर आ जाएगी. अगर दो फ़ीसदी और वोट गिरे तो सात और सीटों का नुकसान होगा. ऐसे में कांग्रेस को 14 और भाजपा को 12 सीटें ही रह जाएँगी. अगर इससे भी दो फ़ीसदी ज्यादा वोट खिसके तब तो कांग्रेसी लहर दिखेगी और 18 सीटें मिल जाएंगी. अगर सरकार की लोकप्रियता कुछ गड़बड़ाने लगे तो 4 से 6 फीसदी वोट गिरना कोई बहुत असामान्य बात नहीं है.
भाजपा कच्छ, सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात में अच्छा प्रदर्शन करके ही सत्ता में आई थी. कच्छ-सौराष्ट्र में लोकसभा की नौ सीटें हैं और उत्तर गुजरात में सात. शंकर सिंह वाघेला के विद्रोह का सीधा प्रभाव उत्तर गुजरात में पड़ा जबकि शासन से नाराज़गी और केशूभाई पटेल की नाराज़गी ने कच्छ-सौराष्ट्र में असर दिखाना शुरू किया. 2002 के चुनाव में पार्टी ने कांग्रेसी गढ़ माने जाने वाले मध्य गुजरात और उत्तर में कुछ इलाकों में भारी बढ़त लेकर इस नुक़सान की भरपाई कर ली. लेकिन चुनावी मैदान में भावनात्मक मुद्दे ग़ायब होने से भाजपा के लिए यह ख़तरा है कि मतदाताओं के रुख़ में ज़रा भी बदलाव आया तो सौराष्ट्र और उत्तर के ग्रामीण और कृषि बहुल क्षेत्रों में उसे भारी नुक़सान हो सकता है. सामाजिक समीकरण बहुत सावधानी से बनाया गया भाजपा का सामाजिक समीकरण भी इस बार नए दबाव में है. भाजपा ने कांग्रेस के ‘ खाम ’ ( क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुसलमान) समीकरण को तोड़ा. उसने क्षत्रियों के साथ ही अति-पिछड़ों को अगड़ों और पटेलों के साथ जोड़कर अपना विजयी समीकरण बनाया. यह समीकरण प्रभावी रहा और आदिवासियों के भी एक हिस्से ने क्षेत्रों में भागीदारी करके बाद में भाजपा को वोट दिया.
अगड़ों में भाजपा का समर्थन पक्का है पर पटेलों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता. उनके नेता केशुभाई को पार्टी ने हाशिए पर डाल रखा है. राज्य में मुसलमानों की आबादी आठ फ़ीसदी है और दो साल पुराने नरसंहार के घाव आज भी हैं. राज्य में दलितों की आबादी नौ फ़ीसदी है और वे मुख्यतः कांग्रेस के साथ ही हैं. मध्य गुजरात के अलावा बाक़ी इलाकों के आदिवासी भी कांग्रेस के साथ दिखते हैं. ऐसे में अगर कांग्रेस को क्षत्रियों के अपने पुराने वोट बैंक (गुजरात में राजपूतों तथा पिछड़े कोली समाज को मिलाकर क्षत्रिय कहा जाता है) का थोड़ा भी समर्थन मिल जाए तो वह भाजपा के किले पर धावा बोल सकती है. मतभेद बिजली की भारी दरों को लेकर किसानों में जो आक्रोश है उसने कांग्रेस को बहुत महत्पवूर्ण मौका दे दिया है. विडंबना यह है कि इस मुद्दे पर आंदोलन का नेतृत्व संघ परिवार के ही भारतीय किसान संघ ने किया. भाजपा के बीच-बचाव करके समझौता तो करा दिया पर न तो इस मामले का निपटारा हुआ है न यह शांत पड़ा है. राज्य भाजपा में मतभेद भी काफी है. पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल की नाराज़गी छिपी हुई नहीं है. भाजपा के एक अन्य प्रभावशाली लेकिन नाराज़ चल रहे नेता हैं, पुरुषोत्तम सोलंकी जिन्होंने अपने कोली समाज के लोगों के लिए ज्यादा टिकट मांगा था. उन्होंने यह घोषणा भी कर रखी है कि ‘बिरादरी पार्टी से बड़ी है.’ पार्टी की गुटबाज़ी के चलते ही नरेन्द्र मोदी अब तक न तो मंत्रिमंडल का विस्तार कर पाए हैं, ना ही कार्पोरेशन का गठन.
विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा को कुछ नगरपालिकाओं के चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा है. असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इन अवसरों का लाभ लेने की स्थिति में है? कांग्रेस को प्रदेश में लगभग 20 वर्ष पूर्व 1985 में ही जीत का स्वाद चखने का अवसर मिला था. वह भी राजीव लहर में. भाजपा के अभ्युदय के बाद से न तो कांग्रेस में उससे लड़ने लायक सांगठनिक चौकसी दिखी है, न वैचारिक समग्रता और ना ही नैतिक बल. ये चीजें पिछले विधानसभा चुनाव में बहुत स्पष्ट ढंग से दिखी थीं. भाजपा से लड़ने की हिम्मत अकेले शंकर सिंह वाघेला ने दिखाई थी, जो संघ के पुराने आदमी हैं. उन्होंने ‘शक्ति सेना’ का गठन किया था लेकिन कांग्रेस के लोग ही उनकी आलोचना में सबसे आगे थे. अब उनको पार्टी ने किनारे करके माधव सिंह सोलंकी और अमर सिंह चौधरी वगैरह के करीबी माने जाने वाले नेता बीके गढ़वी को अध्यक्ष बनाया है. अगर कांग्रेस ने होशियारी से टिकट बँटवारा किया और सांगठनिक चौकसी दिखाई तो वह अपने पुराने रिकार्ड को सुधार सकती है, वरना मुकाबला भाजपा बनाम भाजपा ही रहेगा भले ही मतदाता नाराज हों. फिर वोटर निकलते भी नहीं. हाल के वर्षो में सबसे कम मतदान का रिकार्ड भी गुजरात का ही है जब 1999 लोकसभा चुनाव में सिर्फ 36 फीसदी मतदान हुआ. अगर ऐसा हुआ तो अनेक पूर्वानुमान गड़बड़ा सकते हैं. |
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