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गुरुवार, 27 अप्रैल, 2006 को 22:26 GMT तक के समाचार
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छत्तीसगढ़ के नए क़ानून की निंदा
नक्सली
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों में नक्सली हिंसा में तेज़ी आई है
मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने माओवादी हिंसा से निपटने के लिए बनाए गए बनाए गए छत्तीसगढ़ के नए क़ानून की कड़ी निंदा की है.

संगठन ने क़ानून को क्रूर बताते हुए इसका दुरुपयोग किए जाने की आशंका जताई है.

लेकिन राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस क़ानून का बचाव करते हुए कहा है कि नक्सली विद्रोहियों का सहयोग करने वाले किसी भी व्यक्ति या संगठन से निपटने के लिए यह आवश्यक था.

छत्तीसगढ़ के इस नए क़ानून का नाम विशेष जनसुरक्षा अधिनियम है और इसे मार्च 2006 में लागू किया गया है.

जब इसे विधानसभा से पारित करवाने के बाद राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेजा गया था तो भारत के कई संगठनों ने इसका विरोध किया था और राष्ट्रपति से इसे मंज़ूरी न देने का अनुरोध किया था.

 छत्तीसगढ़ सरकार को इस बात का पूरा अधिकार है कि वो अपने नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करे लेकिन इसके लिए क्रूर क़ानूनों और इसका दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए
ब्रान एडम्स, ह्यूमन राइट्स वॉच

अब न्यूयॉर्क के मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस क़ानून में संशोधनों की माँग की है.

संगठन के एशिया के निदेशक ब्रान एडम्स ने कहा है, "छत्तीसगढ़ सरकार को इस बात का पूरा अधिकार है कि वो अपने नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करे लेकिन इसके लिए क्रूर क़ानूनों और इसका दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए."

उन्होंने आगे कहा है, "केंद्र और राज्य की सरकारों को माओवादी हिंसा को रोकने के लिए विधिसम्मत उपायों का सहारा लेना चाहिए."

संगठन ने माओवादी हिंसा से निपटने के लिए पंजाब के पूर्व पुलिस प्रमुख केपीएस गिल को सलाहकार नियुक्त किए जाने के सरकार के फ़ैसले की भी निंदा की है.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि गिल मानवाधिकार का हनन करने वाले व्यक्ति हैं.

बचाव

लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी बीकेएस रे ने गिल की नियुक्ति को सही ठहराते हुए कहा है कि केपीएस गिल को पंजाब में आतंकवाद से निपटने का लंबा अनुभव है और उनकी सलाह से सुरक्षा बलों को लाभ मिलेगा.

केपीएस गिल
केपीएस गिल को सलाहकार बनाए जाने को छत्तीसगढ़ सरकार सही ठहराती है

उन्होंने छत्तीसगढ़ में लाए गए नए क़ानून का बचाव करते हुए कहा है कि पुलिस अधीक्षक की अनुमति के बिना किसी भी व्यक्ति या संस्था के ख़िलाफ़ जाँच शुरु नहीं की जा सकती और ज़िला प्रशासन का प्रमुख अधिकारी ही गिरफ़्तारी के आदेश दे सकता है.

उन्होंने कहा है कि राज्य में नक्सली हिंसा को रोकने के लिए इस क़ानून की सख़्त आवश्यकता थी.

रे ने इस क़ानून के प्रावधानों का ज़िक्र करते हुए कहा है कि इसमें दुरुपयोग रोकने के लिए पर्याप्त उपाय किए गए हैं.

लेकिन स्वयंसेवी संगठनों का कहना है कि इस क़ानून में किसी भी गतिविधि को ग़ैरक़ानूनी साबित करने के लिए अधिकारियों को असीमित अधिकार दे दिए गए हैं और इससे किसी भी नागरिक को बरसों क़ैद करके रखा जा सकता है.

उल्लेखनीय है कि पिछले तीन दशकों से नक्सली समस्या का सामना कर रहे छत्तीसगढ़ राज्य को हाल ही में केंद्र सरकार ने भी सबसे अधिक प्रभावित राज्य कहा है.

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