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शनिवार, 15 अप्रैल, 2006 को 21:42 GMT तक के समाचार
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मज़दूरों को जूते बाँट रही है सरकार

जूते बाँटते रमन सिंह
रमन सिंह सरकार इससे पहले आदिवासियों को गाय-साँड आदि बाँटने की योजना चला चुकी है
छत्तीसगढ़ के जंगलों में तेंदूपत्ता तोड़ता हुआ कोई अधनंगा-सा व्यक्ति चमचमाते जूते पहने हुए नज़र आ जाए तो चौंकिएगा मत.

अब छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता तोड़ने वाले लाखों आदिवासी मज़दूर इसी तरह नामी कंपनियों के जूते पहने नज़र आएँगे.

ये जूते उन्हें छत्तीसगढ़ की सरकार बाँट रही है.

लेकिन सरकार की जूते बाँटने की नीति में एक परिवार के एक ही व्यक्ति को जूता दिया जा रहा है और इसके चलते परिवार में एक नया विवाद खड़ा होने लगा है कि जब सब काम करते हैं तो जूता किसे मिलेगा.

इससे पहले राज्य की भाजपा सरकार नमक, साईकल, गाय और फिर सांड बांटने की योजना चला चुकी है.

मुफ़्त जूते

आमतौर पर बिड़ी बनाने के लिए इस्तेमाल में आने वाले तेंदू पत्ते की छत्तीसगढ़ में अच्छी उपज है और इसको तोड़ने का अच्छा ख़ासा रोज़गार है.

पिछले साल सरकार ने तेंदूपत्ता तोड़ने वाले श्रमिकों को 67 करोड़ 17 लाख रुपए बांटे थे.

इसी तरह इस साल तेंदू पत्ता तोड़ने के बदले लगभग 83 करोड़ रुपए श्रमिकों को दिए जाने हैं.

लेकिन राज्य सरकार की नई योजना ने तेंदू पत्ता तोड़ने के काम को विवादों के घेरे में ला कर खड़ा कर दिया है.

तेंदूपत्ता मज़दूर
छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता मज़दूरों की बड़ी संख्या है

दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार ने तेंदू पत्ता तोड़ने वाले आदिवासी मज़दूरों को मुफ़्त जूते बांटना शुरु किया है.

सरकार ने राज्य के 12 लाख 62 हज़ार तेंदू पत्ता तोड़ने वाले मज़दूरों को जूते बांटने का लक्ष्य रखा है, जिसे सरकारी भाषा में “चरण पादुका” कहा जा रहा है.

सरकार ने इसके लिए 12 लाख से भी अधिक लोगों के पैरों के नाप लिए और मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसकी औपचारिक शुरुवात भी कर दी है.

विवाद

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग मिल जाएंगे, जिन्होंने जीवन में कभी जूते या चप्पल नहीं पहने.

कई इलाकों में पारंपरिक रुप से चमड़े के बने हुए भँदई पहनने का चलन है. इसके अलावा कच्चे चमड़े से बने जूते भी यहां ख़ूब लोकप्रिय हैं.

 साथ-साथ रहने वाले भाई-भाई में झगड़ा हो रहा है. हम दो भाईयों के बीच समझौता हुआ है कि दोनों बारी-बारी से एक-एक दिन जूते पहनेंगे
मुन्ना गौड़, मज़दूर

लेकिन विवाद इस बात को लेकर है कि सरकार प्रत्येक परिवार में केवल एक सदस्य को जूते दे रही है, जबकि पत्ता तोड़ने का काम पूरा परिवार करता है.

इससे अधिकांश परिवारों में कलह मची हुई है.

बिलासपुर के ठरकपुर गांव के मुन्ना गौड़ बताते हैं- “ साथ-साथ रहने वाले भाई-भाई में झगड़ा हो रहा है. हम दो भाईयों के बीच समझौता हुआ है कि दोनों बारी-बारी से एक-एक दिन जूते पहनेंगे.”

लेकिन इसी गांव के सौखी लाल अपने चार साल के बेटे से परेशान है. सौखी लाल को जब से जूते मिले हैं, उनके 5 साल के बेटे गोपाल ने नाक में दम कर रखा है. गोपाल की एक ही रट है- “बाबू मोरो बर पनही ले दे.” यानी पिताजी मेरे लिए भी जूते ख़रीद दो.

गुहाराम
गुहाराम कहते हैं कि सरकार को जूते बाँटने की जगह रोज़ी रोटी का इंतज़ाम करना चाहिए

सौखी लाल कहते हैं- “ अपने बेटे की बात सुन-सुन कर मेरा कलेजा छलनी हो गया. मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं उसके लिए जूते ख़रीद सकूँ. इसलिए मैंने अपने जूते पहनने के बजाय छुपाना बेहतर समझा.”

इसके अलावा सरकार जिन नामी-गिरामी कंपनियों के जूते इन आदिवासियों को दे रही है, उन्हें पहन कर उबड़-खाबड़ और जंगली रास्तों पर चलना मुश्किल है.

कई जूते तो हफ्ते भर में ही टूट जा रहे हैं.

आशीर्वाद की आकांक्षा

सरकार की ओर से फिलहाल ये कोई नहीं बता रहा है कि इस योजना का सूत्रधार कौन है.

लेकिन इसे सरकार वन विभाग के मद से बाँट रही है. वित्त वर्ष 2005-06 में ही इस योजना के लिए 10 करोड़ 90 लाख रुपए का प्रावधान रखा गया था.

 कई लोगों ने मुझसे कहा कि इससे क्या मिलेगा. तो मैंने कहा कि वनवासियों को चरण पादुकाएं मिलने से वे सरकार को आशीर्वाद देंगे और उनका आशीर्वाद इस सरकार की सबसे बड़ी ताक़त होगी
रमन सिंह, मुख्यमंत्री

मज़दूरो की और कई ज़रुरतें हैं लेकिन जूते ही बाँटने का निर्णय क्यों लिया गया, इस सवाल पर राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं- “ तेंदू पत्ता तोड़ने जाते समय जंगल-पहाड़ के कंटीले रास्तों में वनवासी के पैरों में पड़ने वाले फफोलों की पीड़ा सरकार ने समझी और सरकार ने चरण पादुका बांटने का निर्णय लिया."

वे कहते हैं, "कई लोगों ने मुझसे कहा कि इससे क्या मिलेगा. तो मैंने कहा कि वनवासियों को चरण पादुकाएं मिलने से वे सरकार को आशीर्वाद देंगे और उनका आशीर्वाद इस सरकार की सबसे बड़ी ताक़त होगी.”

लेकिन मज़दूर इस योजना से बहुत प्रभावित भी नहीं हैं. कुछ लोग इस बात से भी नाराज़ हैं कि तेंदू पत्ता लाभांश का लगभग आधा अरब रुपया पिछले कुछ वर्षों से नहीं बांटा गया है.

सरकार लाभांश इसलिए नहीं बांट पा रही है क्योंकि इस विषय पर अभी तक मंत्रिमंडल में कोई फैसला नहीं हुआ है.

ऐसे में कहीं-कहीं जूते बांटने वालों को आदिवासियों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ रहा है.

कोरबा के गिरारी गांव में जब सरकारी कर्मचारी पहुंचे तो आदिवासियों ने जूते लेने से इंकार करते हुए कहा कि पहले उन्हें लाभांश की रक़म दी जाए.

 राज्य के आदिवासियों के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं और सरकार उनका सामना करने के बजाय उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने की नियत से ऐसी ग़ैरज़रुरी योजनाएं चला रही है
रंजन सारखेल, प्रवक्ता, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी

अचानकमार वन्य अभयारण्य के एक गाँव में रहने वाले गुहाराम का कहना था- “ जूते को क्या हम पानी में घोल कर पीएंगे? अगर सरकार को इतनी ही चिंता है तो वह हमें चावल-दाल दे. तेंदू पत्ते से जुड़ा काम महीने भर का होता है, सरकार हमें साल भर का काम दे, ताकि हम भूखों मरने से बच सकें.”

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में सक्रिय गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के प्रवक्ता रंजन सारखेल जूते बांटने की योजना को सरकारी पैसों का दुरुपयोग बताते हैं.

वे कहते हैं, “राज्य के आदिवासियों के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं और सरकार उनका सामना करने के बजाय उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने की नियत से ऐसी ग़ैरज़रुरी योजनाएं चला रही है.”

रंजन का मानना है कि गुणवत्ता के मामले में बेहद हल्के ये जूते चुनाव के समय सरकार को भारी पड़ सकते हैं, जिसे गोंडवाना गणतंत्र पार्टी चुनावी मुद्दा बनाएगी.

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