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मज़दूरों को जूते बाँट रही है सरकार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छत्तीसगढ़ के जंगलों में तेंदूपत्ता तोड़ता हुआ कोई अधनंगा-सा व्यक्ति चमचमाते जूते पहने हुए नज़र आ जाए तो चौंकिएगा मत. अब छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता तोड़ने वाले लाखों आदिवासी मज़दूर इसी तरह नामी कंपनियों के जूते पहने नज़र आएँगे. ये जूते उन्हें छत्तीसगढ़ की सरकार बाँट रही है. लेकिन सरकार की जूते बाँटने की नीति में एक परिवार के एक ही व्यक्ति को जूता दिया जा रहा है और इसके चलते परिवार में एक नया विवाद खड़ा होने लगा है कि जब सब काम करते हैं तो जूता किसे मिलेगा. इससे पहले राज्य की भाजपा सरकार नमक, साईकल, गाय और फिर सांड बांटने की योजना चला चुकी है. मुफ़्त जूते आमतौर पर बिड़ी बनाने के लिए इस्तेमाल में आने वाले तेंदू पत्ते की छत्तीसगढ़ में अच्छी उपज है और इसको तोड़ने का अच्छा ख़ासा रोज़गार है. पिछले साल सरकार ने तेंदूपत्ता तोड़ने वाले श्रमिकों को 67 करोड़ 17 लाख रुपए बांटे थे. इसी तरह इस साल तेंदू पत्ता तोड़ने के बदले लगभग 83 करोड़ रुपए श्रमिकों को दिए जाने हैं. लेकिन राज्य सरकार की नई योजना ने तेंदू पत्ता तोड़ने के काम को विवादों के घेरे में ला कर खड़ा कर दिया है.
दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार ने तेंदू पत्ता तोड़ने वाले आदिवासी मज़दूरों को मुफ़्त जूते बांटना शुरु किया है. सरकार ने राज्य के 12 लाख 62 हज़ार तेंदू पत्ता तोड़ने वाले मज़दूरों को जूते बांटने का लक्ष्य रखा है, जिसे सरकारी भाषा में “चरण पादुका” कहा जा रहा है. सरकार ने इसके लिए 12 लाख से भी अधिक लोगों के पैरों के नाप लिए और मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसकी औपचारिक शुरुवात भी कर दी है. विवाद छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग मिल जाएंगे, जिन्होंने जीवन में कभी जूते या चप्पल नहीं पहने. कई इलाकों में पारंपरिक रुप से चमड़े के बने हुए भँदई पहनने का चलन है. इसके अलावा कच्चे चमड़े से बने जूते भी यहां ख़ूब लोकप्रिय हैं. लेकिन विवाद इस बात को लेकर है कि सरकार प्रत्येक परिवार में केवल एक सदस्य को जूते दे रही है, जबकि पत्ता तोड़ने का काम पूरा परिवार करता है. इससे अधिकांश परिवारों में कलह मची हुई है. बिलासपुर के ठरकपुर गांव के मुन्ना गौड़ बताते हैं- “ साथ-साथ रहने वाले भाई-भाई में झगड़ा हो रहा है. हम दो भाईयों के बीच समझौता हुआ है कि दोनों बारी-बारी से एक-एक दिन जूते पहनेंगे.” लेकिन इसी गांव के सौखी लाल अपने चार साल के बेटे से परेशान है. सौखी लाल को जब से जूते मिले हैं, उनके 5 साल के बेटे गोपाल ने नाक में दम कर रखा है. गोपाल की एक ही रट है- “बाबू मोरो बर पनही ले दे.” यानी पिताजी मेरे लिए भी जूते ख़रीद दो.
सौखी लाल कहते हैं- “ अपने बेटे की बात सुन-सुन कर मेरा कलेजा छलनी हो गया. मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं उसके लिए जूते ख़रीद सकूँ. इसलिए मैंने अपने जूते पहनने के बजाय छुपाना बेहतर समझा.” इसके अलावा सरकार जिन नामी-गिरामी कंपनियों के जूते इन आदिवासियों को दे रही है, उन्हें पहन कर उबड़-खाबड़ और जंगली रास्तों पर चलना मुश्किल है. कई जूते तो हफ्ते भर में ही टूट जा रहे हैं. आशीर्वाद की आकांक्षा सरकार की ओर से फिलहाल ये कोई नहीं बता रहा है कि इस योजना का सूत्रधार कौन है. लेकिन इसे सरकार वन विभाग के मद से बाँट रही है. वित्त वर्ष 2005-06 में ही इस योजना के लिए 10 करोड़ 90 लाख रुपए का प्रावधान रखा गया था. मज़दूरो की और कई ज़रुरतें हैं लेकिन जूते ही बाँटने का निर्णय क्यों लिया गया, इस सवाल पर राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं- “ तेंदू पत्ता तोड़ने जाते समय जंगल-पहाड़ के कंटीले रास्तों में वनवासी के पैरों में पड़ने वाले फफोलों की पीड़ा सरकार ने समझी और सरकार ने चरण पादुका बांटने का निर्णय लिया." वे कहते हैं, "कई लोगों ने मुझसे कहा कि इससे क्या मिलेगा. तो मैंने कहा कि वनवासियों को चरण पादुकाएं मिलने से वे सरकार को आशीर्वाद देंगे और उनका आशीर्वाद इस सरकार की सबसे बड़ी ताक़त होगी.” लेकिन मज़दूर इस योजना से बहुत प्रभावित भी नहीं हैं. कुछ लोग इस बात से भी नाराज़ हैं कि तेंदू पत्ता लाभांश का लगभग आधा अरब रुपया पिछले कुछ वर्षों से नहीं बांटा गया है. सरकार लाभांश इसलिए नहीं बांट पा रही है क्योंकि इस विषय पर अभी तक मंत्रिमंडल में कोई फैसला नहीं हुआ है. ऐसे में कहीं-कहीं जूते बांटने वालों को आदिवासियों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ रहा है. कोरबा के गिरारी गांव में जब सरकारी कर्मचारी पहुंचे तो आदिवासियों ने जूते लेने से इंकार करते हुए कहा कि पहले उन्हें लाभांश की रक़म दी जाए. अचानकमार वन्य अभयारण्य के एक गाँव में रहने वाले गुहाराम का कहना था- “ जूते को क्या हम पानी में घोल कर पीएंगे? अगर सरकार को इतनी ही चिंता है तो वह हमें चावल-दाल दे. तेंदू पत्ते से जुड़ा काम महीने भर का होता है, सरकार हमें साल भर का काम दे, ताकि हम भूखों मरने से बच सकें.” छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में सक्रिय गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के प्रवक्ता रंजन सारखेल जूते बांटने की योजना को सरकारी पैसों का दुरुपयोग बताते हैं. वे कहते हैं, “राज्य के आदिवासियों के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं और सरकार उनका सामना करने के बजाय उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने की नियत से ऐसी ग़ैरज़रुरी योजनाएं चला रही है.” रंजन का मानना है कि गुणवत्ता के मामले में बेहद हल्के ये जूते चुनाव के समय सरकार को भारी पड़ सकते हैं, जिसे गोंडवाना गणतंत्र पार्टी चुनावी मुद्दा बनाएगी. | इससे जुड़ी ख़बरें छत्तीसगढ़ की नक्सल समस्या02 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस बहुत महंगी पड़ रही है सूचना19 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस अफ़वाहों से बंद हो जाते हैं शहर16 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस छत्तीसगढ़ में सिक्कों की कम होती खनक13 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस हज़ारों क़ैदियों को मुक्तिदाता की प्रतीक्षा23 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस जादू मंतर के चक्कर में चक्करघिन्नी30 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस छत्तीसगढ़ में नक्सलियों पर प्रतिबंध05 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस बाल विवाह रोकने की 'सज़ा'11 मई, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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