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मंगलवार, 13 दिसंबर, 2005 को 14:08 GMT तक के समाचार
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छत्तीसगढ़ में सिक्कों की कम होती खनक

सिक्के
छत्तीसगढ़ में सिक्कों की एक बार फिर कमी होने लगी है
रुपए दुगने करने के नाम पर ठगी के अनेक किस्से आपने सुने होंगे. लेकिन सच में अगर अपने रुपए दुगने करने हों तो आपको छत्तीसगढ़ में आना चाहिए.

शर्त इतनी भर है कि रुपया सिक्के की शक़्ल में हो. एक हाथ से सिक्के दीजिए और दूसरे हाथ से उसके बदले डेढ़ गुने रुपए पाइए. कोई धोखा नहीं, कोई ठगी नहीं!

इस बात पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन यह सच है कि इन दिनों छत्तीसगढ़ में एक रुपए के सिक्के डेढ़ रुपए में बिक रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि राज्य में सिक्कों की कोई कमी हो गयी है या फिर लोग किसी अंधविश्वास के तहत सिक्के ख़रीद रहे हैं. मामला केवल इन सिक्कों से होने वाली कमाई का है.

राज्य में ऐसे कई गिरोह सक्रिय हैं, जो लोगों से बड़े पैमाने पर एक रुपए के सिक्के ख़रीद कर उन्हें गला कर बर्तन बना रहे हैं.

सिक्कों की कमी

राज्य बनने से पहले छत्तीसगढ़ में सिक्कों की भारी कमी थी. नोटों का भी यही हाल था. पूरे राज्य में एक, दो और पांच रुपए के कटे-फटे और पैबंद लगे नोट ही चलन में थे.

 इस तरह सिक्कों को गलाने का ग़ैरक़ानूनी काम भी कोई कर सकता है, ये हमारी कल्पना से बाहर है.
परमानंद बैगा, उप महाप्रबंधक, रिजर्व बैंक

इन नोटों की खस्ता हालत का अंदाज़ इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इन्हें पड़ोसी राज्यों में स्वीकार ही नहीं किया जाता था.

बाद में स्टेट बैंक ने कटे-फटे और पैबंद लगे इन नोटों को चलन से बाहर करने का विशेष अभियान चलाया.

इसके बाद 2003 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से एक और पांच रुपए के लाखों सिक्के राज्य के बैंकों में लाए गए. कुछ ही दिनों में छत्तीसगढ़ का बाज़ार इन सिक्कों से पट-सा गया.

सिक्कों की अधिकता इस हद तक हो गयी कि व्यवसायियों ने सिक्कों को बोरों में भर कर लेन-देन करना शुरु कर दिया. हज़ारों रुपए के भुगतान सिक्को में किए जाने लगे.

रिजर्व बैंक की फटकार

कटे-फटे और पैबंद लगे नोटों से परेशान लोग अब सिक्को की अधिकता से परेशान होने लगे.

 जनवरी में रायपुर में सिक्के गलाने वाले एक गिरोह के पकड़े जाने के बाद से राज्य की पुलिस सतर्क है
ओपी राठौर, पुलिस महानिदेशक

इसके बाद सिक्को के लेन-देन से परेशान कुछ व्यवसायियों व निजी बैंकों ने तो अलग-अलग कारण बताते हुए 25, 50 और 1 रुपए के सिक्के लेना बंद कर दिया.

अंत में भारतीय रिजर्व बैंक को मीडिया और दूसरे माध्यमों से यह सफाई देनी पड़ी कि सभी सिक्के वैध मुद्रा हैं और ये सिक्के स्वीकार करने से आनाकानी करना ठीक नहीं है.

लेकिन साल बीतते-बीतते बाज़ार से एक रुपए के सिक्के गायब होने लगे. अब जा कर पता चला कि एक रुपए के पुराने सिक्के भट्ठियों में गलाए जा रहे हैं और उनका इस्तेमाल मूर्ति, जेवर और बरतन बनाने में किया जा रहा है.

रायपुर के उरला औद्योगिक क्षेत्र व भिलाई में कुछ ऐसे लोग भी पकड़े गए, जो इन सिक्को को गला कर इन्हें सिल्लियों की शक़्ल में महाराष्ट्र भेजा करते थे.

फ़ायदे का गणित

एक रुपये के लगभग 127 सिक्को का वजन एक किलो होता है. सिक्कों को गलाने से लेकर उन्हें अंतिम शक्ल देने की पूरी प्रक्रिया में लगभग 15 से 20 रुपए खर्च होते हैं.

जबकि गलाए जाने के बाद सिक्कों की सिल्लियां, जेवर, मूर्ति या बरतन 290 से 350 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिक जाते हैं.

राज्य के पुलिस महानिदेशक ओ पी राठौर का दावा है कि जनवरी में रायपुर में सिक्के गलाने वाले एक गिरोह के पकड़े जाने के बाद से राज्य की पुलिस सतर्क है.

हालांकि वे स्वीकारते हैं कि उस गिरोह के सरगना समेत कुछ अन्य सदस्य आज तक नहीं पकड़े जा सके हैं.

भारतीय रिजर्व बैंक के नागपुर स्थित छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र क्षेत्रीय कार्यालय को न तो पुलिस ने कभी इस आशय की सूचना दी और न ही उनके सहायक बैंकों से इस बात का उन्हें पता चला.

निर्गमन शाखा के उप महाप्रबंधक परमानंद बैगा कहते हैं,'' इस तरह सिक्कों को गलाने का ग़ैरक़ानूनी काम भी कोई कर सकता है, ये हमारी कल्पना से बाहर है. ऐसे मामलों में कार्रवाई की ज़िम्मेवारी हम पर भी है, लेकिन हमें अब तक इस बारे में कभी भनक भी नहीं लगी.''

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