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हज़ारों क़ैदियों को मुक्तिदाता की प्रतीक्षा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छत्तीसगढ़ की अलग-अलग जेलों में क़ैद सैकड़ों लोग पिछले कई सालों से किसी मुक्तिदाता की प्रतीक्षा में हैं. ये वो क़ैदी हैं, जिन्हें अदालत ने ज़मानत पर रिहा करने के आदेश दे दिए हैं, लेकिन इनकी ग़रीबी इन्हें जेल की सलाखों से बाहर नहीं आने देती. इन क़ैदियों के परिजनों के पास इतनी रक़म या ज़मीन नहीं है, जिसे अदालत में पेश कर वो इनकी ज़मानत ले सकें. एक क़ैदी तो पिछले 18 सालों से केवल इसलिए जेल में है क्योंकि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और नियमानुसार उसके मामले पर विचार ही नहीं किया जा सकता. कुछ क़ैदी ऐसे हैं, जिन्हें उनके परिजनों ने ही भुला दिया. ना कभी खोज-ख़बर ली और ना ही मुक़दमे की पैरवी के लिए सामने आए. किसी तरह अदालत से ज़मानत पर रिहा करने का आदेश आ भी गया तो इन्हें कोई ज़मानतदार नहीं मिल सका. इस चक्कर में कई क़ैदी पिछले 15-16 सालों से सीखचों के पीछे रहने को मजबूर हैं. विचाराधीन अकेले राजधानी रायपुर के केंद्रीय जेल में 57 क़ैदी ऐसे हैं, जो ज़मानतदार पेश नहीं कर पाने के कारण सालों से सलाखों के पीछे हैं. आदिवासी बहुल जगदलपुर के केंद्रीय जेल में ऐसे क़ैदियों की संख्या 36 है. इसी तरह बिलासपुर और अंबिकापुर के केंद्रीय जेलों में क्रमशः 36 और 33 ऐसे क़ैदी हैं, जिनकी ज़मानत लेने के लिए कोई सामने नहीं आया.
एक अनुमान के अनुसार राज्य की दूसरी जेलों में इस तरह के क़ैदियों की संख्या सैकड़ों में हो सकती है. रायगढ़ जेल में क़ैद चिंताराम का मामला अपने आप में अनूठा है. चिंताराम को 18 साल पहले हत्या के मामले में गिरफ़्तार किया गया था. जेल में पता चला कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है. बाद में ग्वालियर मानसिक आरोग्यशाला में उनका इलाज भी करवाया गया लेकिन इस इलाज का कोई फ़ायदा नहीं हुआ. अब 65 वर्षीय चिंताराम केवल इसलिए पिछले 18 सालों से जेल में हैं क्योंकि आम तौर पर किसी मानसिक रोगी के मामले पर विचार नहीं किया जा सकता. विचार उन 65 क़ैदियों के बारे में भी नहीं किया जा रहा है जो मानसिक रोगी हैं और बिलासपुर केंद्रीय जेल में हैं. इनमें से 45 तो सज़ा काट रहे हैं और शेष विचाराधीन हैं. चूंकि राज्य में कोई मानसिक आरोग्यशाला नहीं है इसलिए उनका इलाज भी नहीं हो रहा है. राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एल जे सिंह कहते हैं, " ये मामले अदालत में हैं और मानवाधिकार आयोग इस मामले में कुछ नहीं कर सकता." आदेश और क्रियान्वयन उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी क़ानूनी प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जो क़ैदी अपने ज़मानतदार प्रस्तुत करने में अक्षम हैं, वे अदालत में आवेदन कर सकते हैं और अदालत स्वविवेक के आधार पर निर्णय ले सकती है. कनक तिवारी कहते हैं, " भारतीय क़ानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि ज़मानत का आदेश देने के बाद अदालत उसके क्रियान्वयन की निगरानी कर सके. ज़मानत से संबंधित क़ानून ये मान कर बनाए गए हैं कि अभियुक्त अपनी ज़मानत का यथोचित प्रबंध कर लेगा. लेकिन दुर्भाग्य से स्थितियां ऐसी नहीं हैं." विभिन्न जिलों में न्यायाधीश रहे राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव गौतम चौरड़िया ने व्यकित्गत रुप से जेलों में जा कर ऐसे क़ैदियों से मुलाकात की है और उच्च न्यायालय से इन क़ैदियों के मामले में कार्रवायी का अनुरोध किया है. चौरड़िया बताते हैं, " उच्च न्यायालय इस मामले में गंभीर है और हम जल्दी ही सकारात्मक निर्णय की अपेक्षा कर रहे हैं. ऐसे मामलों में या तो न्यायालय क़ैदियों को निजी मुचलके पर रिहा कर सकता है या फिर उनके मामले की शीघ्र सुनवायी कर फ़ैसला कर सकता है." उच्च न्यायालय चाहे जो फ़ैसला करे, सबसे बड़ा मुद्दा तो ये है कि यह फ़ैसला कब होगा? छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में 60 हज़ार से ज़्यादा मामले लंबित हैं. ज़ाहिर है, ऐसे में इन क़ैदियों के लिए अपनी सुनवाई की प्रतीक्षा और लंबी हो सकती है. | इससे जुड़ी ख़बरें क़ैदी की पिटाई पर सैनिक को सज़ा29 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस अमरीकी अड्डे से भागे क़ैदियों की तलाश12 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस हिरासत में 'हत्याओं' को लेकर हंगामा22 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस ओझा ढूँढ़ रहे हैं गावों में चुड़ैलें28 जुलाई, 2004 | भारत और पड़ोस क़ैदियों की धुन पर थिरक रहे हैं बाराती06 मई, 2004 | भारत और पड़ोस पाकिस्तानी क़ैदियों की उम्मीद नहीं टूटी है13 अक्तूबर, 2003 को | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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