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शुक्रवार, 22 अक्तूबर, 2004 को 07:14 GMT तक के समाचार
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हिरासत में 'हत्याओं' को लेकर हंगामा

हिरासत में मौत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन
पुलिस हिरासत में मौतों की न्यायिक जाँच की माँग ज़ोर पकड़ रही है
छत्तीसगढ़ में एक के बाद एक पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों ने राज्य सरकार को मुसीबत में डाल दिया है.

कुछ ही समय पहले राजधानी रायपुर से लगे सुहेला थाने में एक आदिवासी युवक की मौत के बाद भारी हंगामा खड़ा हुआ था और अब पिछले दो हफ्ते में मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह जिला कवर्धा और फिर रायपुर के पलारी में पुलिस हिरासत में हुई मौतों के बाद विपक्ष को बड़ा मुद्दा मिल गया है.

पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों को लेकर रायपुर की एक स्वयंसेवी संस्था ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है जिसके बाद विवाद के और गहराने के आसार दिख रहे हैं.

हर रोज़ कोई न कोई संगठन हिरासत में होने वाली मौत को लेकर आंदोलन कर रहा है. राज्य में बिगड़ती क़ानून व्यवस्था को लेकर विपक्ष ने राज्यपाल से मुलाकात की है और राज्य सरकार को बर्खास्त करने की माँग की है.

राज्य मानवाधिकार आयोग ने राजधानी रायपुर समेत राज्य के पाँच पुलिस अधीक्षकों को नोटिस भेज कर पिछले दिनों पुलिस हिरासत में हुई आठ मौतों पर जवाब माँगा है.

कुछ समय पहले ही राजधानी रायपुर से 55 किलोमीटर दूर सुहेला में पुलिस हिरासत में एक आदिवासी युवक राजकुमार की मौत के विरोध में प्रदर्शन कर रहे आदिवासियों ने थाने पर पथराव किया था और पुलिस की गाड़ियाँ जला दी थीं.

ताज़ा घटनाक्रम में रायपुर के पलारी थाना में संतोष साहू नामक युवक को चोरी के संदेह में पूछताछ के लिए थाने लाया गया, उसके दो दिन बाद संतोष की लाश संदिग्ध परिस्थितियों में एक खेत में फाँसी से झूलती हुई पाई गई.

आरोप है कि संदिग्ध परिस्थितियों में हुई इस मौत के बाद पुलिस ने आनन-फानन में बिना पंचनामा किए संतोष की लाश पेड़ से उतार कर उसका पोस्टमार्टम करवाया और परिजनों पर दबाव डाल कर उसका दाह संस्कार करवा दिया.

संतोष के परिजन कबीरपंथी समुदाय से जुड़े हैं जिनमें मृत देह को दफ़नाए जाने की परंपरा है.

धरना
विपक्ष ने सरकार की बर्ख़ास्तगी की माँग की है

पलारी क्षेत्र के विधायक डॉ. शिव कुमार डहरिया कहते हैं- “संतोष साहू की पुलिस ने हत्या की और साक्ष्य छिपाने के लिए उसकी लाश को पेड़ से लटका दिया. पुलिस ने न तो लाश की फोटोग्राफ़ी करवाई और न ही पोस्टमार्टम की वीडियो रिकार्डिंग. इसके बाद लाश जलवा दी, जिससे साक्ष्य मिट गया.”

इससे पहले इस महीने की शुरुआत में मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह जिले कवर्धा में भी बन्नूराम अनंत सतनामी नामक युवक को पुलिस एक आपराधिक मामले में पूछताछ के लिए ले गई और अगले दिन दोपहर उसकी लाश थाने से कुछ ही दूरी पर मिली. नाराज़ ग्रामीणों ने जब थाने का घेराव किया तो पुलिस ने जवाब में गोलियाँ चलाईं.

इस घटना के दो दिन बाद पुलिस हिरासत में मौत का मामला स्पष्ट होने पर राज्य शासन ने थानेदार और हवालदार के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया और मृतक के परिजनों को पाँच लाख रुपए और पाँच एकड़ ज़मीन देने की घोषणा की.

पुलिस हिरासत में एक के बाद एक नौ मौतों का आरोप झेल रहा पूरा महकमा इस बात की कोशिश कर रहा है कि रात में हवालात में किसी को भी रखने से बचा जाए.

आरोप-सफ़ाई

राज्य के पुलिस महानिदेशक ओपी राठौर कहते हैं, "राज्य में क़ानून व्यवस्था में कोई खामी नहीं है. हमने हिरासत में होने वाली मौतों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कठोर कार्रवाई की है. दोषियों पर हत्या का मामला भी दर्ज़ किया है."

लेकिन विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा कहते हैं, "यह समझ से परे है कि जिस व्यक्ति को पूछताछ के लिए थाने लाया जाता है, वह आत्महत्या क्यों कर लेता है? सरकार को चाहिए कि वह दलित, आदिवासी, पिछड़ों और महिलाओं पर अत्याचार के मामलों में कलेक्टर, एसपी और अन्य उच्चाधिकारियों पर उत्तरदायित्व तय करके कार्रवाई करे."

हिरासत में होने वाली मौतों को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाली रायपुर की स्वयंसेवी संस्था फोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग एण्ड एडवोकेसी के संयोजक सुभाष महापात्रा का मानना है कि पुलिस हिरासत में मौत के अभी तक 11 मामले सामने आए हैं और मरने वाले पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति, जनजाति के हैं.

उनका आरोप है कि पुलिस हिरासत में हुई सभी मौतों को पुलिस ने आत्महत्या का रुप देने की कोशिश की, लेकिन सभी मामलों में उनके गढ़ी हुई कहानी का सच सामने आ गया.

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