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राहत सामग्री की लूट है, लूट सके तो लूट | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में सरकार के स्तर से बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए राहत और पुनर्वास की तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें हुईं. दावा तो ये भी किया गया कि राहत शिविरों में बाढ़ पीड़ितों को लंबे समय तक रहने और तमाम ज़रूरी सुविधाएँ देकर उनकी बिखरी हुई ज़िंदगी को सँवारने के अवसर दिए जाएँगे. लेकिन वास्तव में लगता यही है कि सहायता के रूप में जमा हो रही बड़ी-बड़ी धनराशियों के घपले, घोटाले और बंदरबाँट वाला माहौल बन गया है. जिन 320 सरकारी राहत शिविरों का उल्लेख सरकारी बयानों में बार-बार होता रहता है, उनमें से अधिकांश को राहत सामग्री लूट शिविर के नाम से पुकारा जाने लगा है. इनके अलावा फ़र्ज़ी राहत शिविरों की भी कमी नहीं है. जहाँ दबंग और असामाजिक तत्वों के गिरोह सक्रिय हैं और ये लोग बाहर से आने वाली राहत सामग्रियों को रास्ते में ही लूट कर मालामाल हो रहे हैं. इस प्रलयकारी बाढ़ से आई विपदा को कुछ लोगों ने बहती गंगा में हाथ धोने का ज़रिया बना लिया है. इंतज़ार घर की बची-खुची संपत्ति लूट लिए जाने के भय से जो लोग अपनी जान जोख़िम में डालकर गाँव से नहीं निकले, उनकी वहाँ जाकर मदद करने की सरकारी विभागों की कोई रुचि या तत्परता नहीं दिख रही है.
सेना के जवान वहाँ तक पहुँचे ज़रूर. लेकिन स्थानीय प्रशासन के निर्देश के बिना वे भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. दूसरी ओर सही मायने में बाढ़ पीड़ित हज़ारों-लाखों लोग जहाँ-तहाँ ऊँची जगह पर शरण लिए हुए हैं. बहुत से लोग तो अपने जलमग्न गाँव में ही जीवन और मरण के बीच झूल रहे हैं. बड़ी तादाद में ऐसे लोग पिछले एक महीने से इसी इंतज़ार में हैं कि उन तक भी वो मदद पहुँच पाएगी जिसका इतना ढिंढोरा पीटा जा रहा है. बाढ़ प्रभावित ऐसे कई गाँव हैं, जहाँ बाढ़ का पानी कम होने पर लोग तबाही का मंज़र देखने पहुँच गए हैं. लेकिन सरकारी लोगों को वो जमात वहाँ तक नहीं पहुँची है जो सहरसा, पुर्णिया, सुपौल और ऐसे इलाक़ों में ही चक्कर काट रही है. |
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