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बाढ़ पीड़ितों का दर्द भी अलग-अलग.. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राहत शिविरों में जहां कुछ लोग लड़ झगड़ कर भोजन और तंबू मांग रहे हैं वहीं कुछ लोगों को भोजन के लिए पंक्ति में खड़े होने में शर्म आ रही है क्योंकि उन्हें जीवन में शायद पहली बार हाथ फैलाना पड़ रहा है. छह बच्चों की मां नज़मुन जहां रो रोकर और चिल्ला चिल्ला कर अपना दुखड़ा सुनाती हैं और हमसे शिकायत करती हैं, उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है वहीं अरहुला देवी और उनके संबंधी बहुत आग्रह करने पर कहते हैं कि वो खाने के लिए किचकिच नहीं कर सकते. सुपौल ज़िले के सिमराही राहत शिविर में हमें रोती हुई नज़मुन पहले मिलीं और उन्होंने जो बताया वो शायद कई और पीड़ितों की भी कहानी है. वो कहती हैं, "मैं बहुत ग़रीब हूं. ललितग्राम से आई हूं. मैं तो मर ही जाती लेकिन लोगों ने नाव पर बैठा दिया लेकिन उसके बाद मल्लाह ने बहुत परेशान किया. हम तो भूखे थे ही. मल्लाह ने कहा कि पैसे नहीं देंगे तो वो हमें डुबा देंगे. उसने हमारी एक बकरी और सौ रुपए छीन लिए. अब यहां शिविर में आए हैं तो न रहने की जगह और न खाने को कुछ मिला है." जब मैं नज़मुन को लेकर प्रखंड अधिकारी कामेश्वर प्रसाद के पास गया तो उन्होंने तुरंत नज़मुन के बच्चे के लिए दूध और चूड़े की व्यवस्था कर दी. शिविर में भोजन या राहत सामग्री की कमी तो नहीं थी लेकिन यह ज़रुर था कि अव्यवस्था ज़रूर दिख रही थी. आश्वासन यह बात प्रखंड अधिकारी ने भी मानी और हमें आश्वासन दिया कि जल्दी ही स्थिति नियंत्रण में होगी. लेकिन हां शिविर में अधिकारियों औऱ पुलिस के रुख में एक बदलाव ज़रुर देखने को मिला. उनका रवैया पीड़ितों के साथ अच्छा था. शिविर में घूमते हुए मैं पहुंचा अरहुला देवी के पास. किसी ने बताया कि दो दिन पहले उनके बच्चे की मौत हुई है.
बड़ी कोशिश के बाद उन्होंने बात की और रोते हुए अपनी कहानी सुनाई. वो बोलीं, " हम 12 दिन तक अपने सगे संबंधियों के साथ पानी में रहे. सरकारी नाव गई तो हम निकल कर आए. बच्चे खिचड़ी खा रहे थे. शिविर में आने के बाद उसकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई. पेट ख़राब और उल्टियां होने लगी. हम उसे अस्पताल में ले गए तो डॉक्टरों ने पानी चढ़ा कर हमें निकाल दिया." इतना कहने के बाद उनकी आंखों में आंसू भर आए और वो रोते हुए बोलीं, " पांच साल का था मेरा बच्चा. मेरी गोद में ही था. उल्टी हुई और प्राण चले गए उसके." वो कहती हैं, "बच्चे को जलाया भी नहीं गया क्योंकि जलावन नहीं था. उसे पानी में बहा दिया गया.पता नहीं क्या हुआ होगा लाश का भी." जीने की मजबूरी बलुहा की रहने वाली अरहुला देवी का परिवार संपन्न था और शायद इन लोगों ने कभी किसी के सामने हाथ भी नहीं फैलाया होगा. अब शिविर में उन्हें भोजन के लिए चिल्लाना पड़ता है, हाथ फैलाना पड़ता है. उनकी एक संबंधी कहती हैं, " हमारे पास बड़ा घर था. धन दौलत थी. कुछ भी नहीं बचा. हम खाने के लिए किचकिच नहीं कर सकते. हाथ नहीं फैला सकते. हमें पंक्ति में खड़े होने में शर्म आती है. हम तो पर्दे में रहते थे. हमने कभी ये दिन नहीं देखे. एक साड़ी में दस दिन से हैं. नहा तक नहीं पाते हैं. क्या बताएं कैसे जी रहे हैं." राहत शिविरों में सरकार की मदद कर रहे लोग इस बात को मानते हैं कि जो महिलाएं संपन्न घरों की हैं, उन्हें पंक्तियों में खड़े होने में इसलिए दिक्कत होती है क्योंकि उन्होंने जीवन में कभी किसी चीज़ के लिए हाथ नहीं फ़ैलाया होगा. जो हाथ कभी देने के लिए उठते होंगे, अब कोसी ने उन्हीं लोगों के साथ खड़े होने को मज़बूर कर दिया है जिनके हाथ मांगने के लिए उठते हैं. |
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