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बाढ़ की तबाही के बीच गूँजी किलकारियाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कोसी के क़हर से बिहार में ऐसी बर्बादी आई है कि लोग इसे चाह कर भी नहीं भुला सकते और शायद भुलाना चाहते भी नहीं है. इसीलिए सहरसा के एक राहत शिविर में जन्मी दो बच्चियों के नाम कोसी और कौसिकी रखे गए हैं. रवीनंदन मिश्र स्मारक विधि महाविद्यालय में लगे राहत शिविर के संचालक सुमित कुमार सुमन बताते हैं कि पिछले तीन दिनों में दो बच्चियों का जन्म हुआ है. इनके नाम कोसी नदी के नाम पर रखे जाने के बारे में वो कहते हैं, "कोसी से इस इलाक़े में जो विपदा आई है उसे याद रखने का शायद इससे बेहतर उपाय और कुछ नहीं हो सकता." मंजेष यादव की पत्नी रुबी देवी ने एक सितंबर को कौसिकी कुमारी को जन्म दिया. ये दंपत्ति मधेपुरा के धुरगाँव से किसी तरह जान बचाकर शिविर में पहुँची थी. किसान मंजेष यादव अपनी बेटी के बारे में बताते हैं, "कोसी मैया ने तो हमसे सबकुछ छीन लिया. अब हमारे पास कुछ भी नहीं है. जो ज़मीन थी वो तो नदी की पेटी में गई. अब कोसी घर में आ गई है, इसी से हम खुश हैं. इसके अलावा कुछ बचा ही नहीं है." गर्भवती महिलाओं की हालत इसी शिविर में कौसिकी के जन्म से ठीक एक दिन पहले जम्हारा गाँव की ममता देवी ने 'कोसी' को जन्म दिया.
कोसी के पिता सुरेंद्र मंडल कहते हैं, "हम लोग कौसिकी के साथ ही कोसी की छठी मनाएंगे. दुख की इस घड़ी में ये शिविर ही तो हमारा परिवार है, समाज है." शिविर संचालक सुमित कुमार सुमन का कहना है कि इस समय शिविर में चार ऐसी महिलाएँ हैं जिन्हें एक हफ़्ते के भीतर बच्चा होने की संभावना है. वो कहते हैं, "अगर इनमें से कोई लड़का पैदा हुआ तो हम सब लोगों ने मन बनाया है कि उसका नाम प्रलयनाथ रखेंगे. वैसे इन महिलाओं की देख-रेख में हम सब लोग जुटे हुए हैं." पत्रकार शिशुराज बताते हैं कि हर शिविर में दो-तीन गर्भवती महिलाएँ हैं जिन्हें चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने की तत्काल ज़रूरत है. वो कहते हैं, "स्वयंसेवी संस्थाओं ने तो अपनी ओर से जो संभव हो सकता है वो किया है लेकिन प्रसव पीड़ा के समय दक्ष डॉक्टरों की ज़रूरत पड़ेगी. इसलिए शिविरों में डॉक्टरों की तैनाती होनी चाहिए." |
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