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सोमवार, 01 सितंबर, 2008 को 15:01 GMT तक के समाचार
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'पशुपतिनाथ की मर्ज़ी या लापरवाही?'

कुसहा बाँध
बाँध के टूटने से नेपाल और बिहार में भीषण तबाही मची है
शरीर पर भिनभिनाती मक्खियाँ और आँखें खुली हुई. इस व्यक्ति की जीवन लीला समाप्त हो चुकी है.

ये व्यक्ति अपनी पहचान खो चुका है. 24 घंटे हो चुके हैं, लवारिस पड़े इस शव को उठाने वाला कोई नहीं है.

नेपाली उप स्वास्थ्य चिकित्सा केंद्र शिविर के ठीक सामने 10 फ़ुट की दूरी पर पड़ा है यह शव. शायद शिविर का पहला मकसद उन लोगों को बचाना है जो ख़ुद के जीवन की जद्दोजेहद में पड़े हैं.

भारत-नेपाल सीमा पर कोसी बराज से ही रास्ता जाता है कुसहा बाँध को. जहाँ से निकली कोसी ने न सिर्फ़ नेपाल में तबाही मचाई बल्कि बिहार में कइयों की जनजीवन को लील लिया.

तटबंध इतना ही चौड़ा कि एक ही गाड़ी गुज़र सके. बाँध के दायीं तरफ़ हज़ारों की तादाद में शिविर है. बायीं और कोसी अपने प्रचंड वेग में है.

इन शरणार्थियों की दास्तां भी वही है जो बिहार के सहरसा, मधेपुरा, सुपौल या फिर पूर्णिया के लोगों की है. इनका भी सब कुछ लूट गया. जीवन भर की पूँजी बह गई. और कुछ बचा है तो फूलती साँसे.

तमाम बाढ़ पीड़ित अब डायरिया के शिकंजे में हैं और स्वयंसेवी संस्था राहत और मेडिकल सुविधाएँ पहुँचाने में लगे हैं.

अंतर

संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम
राहत का काम बाढ़ पीड़ित इलाकों में चल रहा है

यूँ तो दोनों देशों के पीड़ितों की कहानी एक सी है पर अंतर यह है कि नेपाल में बाढ़ पीड़ित इस मामले में बेहतर है कि यहाँ सीमा रहित स्वास्थ्य सेवा, नेपाली रेडक्रास बाढ़ पीड़ितों की नब्ज पर हाथ रखे है.

संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम जैसी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के बैनर तले अनाज और राहत से लदे ट्रक हैं जो शायद उन्हें भूखों नहीं मरने दे.

भारत के बाढ़ पीड़ितों को अभी अंतरराष्ट्रीय स्तर की मदद नसीब नहीं. शायद अंतर की वजह दोनों देशों के विस्थापितों की तादाद में है.

नेपाल में बाढ़ में फँसे लोगों को लगभग निकाला जा चुका है पर भारत में अभी भी हज़ारों जीवन मझधार में है.

कुसहा बाँध को फिर से बनाने, बचे हिस्से को फिर से दुरुस्त करने के लिए भारत से विशेषज्ञों का दल गया है. इंजीनियर जाँच पड़ताल और योजना बनाने में लगे हैं. टूटे तटबंध को बढ़ने से रोकने का काम जारी है.

नेपाल के कई बाढ़ पीड़ित भारत की लापरवाही को बाँध टूटने की वजह मानते हैं. वहीं नेपाल के दया शंकर कहते हैं, "जैसी पशुपतिनाथ की मरजी. वो चले गए जिनका इस दुनिया में काम पूरा हो गया."

हालांकि पीड़ित इधर भी हैं और उधर भी पर सच तो यह है कि देश और सीमा बदल जाने से दर्द नहीं बदल जाते.

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