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बुधवार, 03 सितंबर, 2008 को 12:36 GMT तक के समाचार
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माँ के शव के साथ एक रात..

बाढ़ प्रभावित (फ़ाइल फ़ोटो)
अभी भी कुछ इलाक़ों में राहत नहीं पहुँच पाई है
नागो शर्मा की आँखों के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे. वो बाढ़ के भँवर को चीर कर अपनी माँ को कंधे पर लिए अस्पताल तो पहुँच गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

डॉक्टरों ने उसकी सत्तर वर्षीया माँ भगीनिया देवी को मृत घोषित कर दिया लेकिन धरती पर ईश्वर के दूसरे अवतार कहे जाने वाले डॉक्टरों के बर्ताव ने मानवता को शर्मशार कर दिया.

नागो शर्मा की कहानी शुरु होती है, उसके गाँव अमौना से जो सहरसा शहर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर है.

 मैंने डॉक्टरों से लाख मिन्नत की कि एक बार तसल्ली कर लो. माँ को ठीक से देख लो लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि अस्पताल के बाहर बैठो कल देखेंगे
नागो शर्मा

इस गाँव के सारे घर जलमग्न हो चुके हैं. ऊँची जगहों पर बने कुछ पक्के मकानों के ऊपर मचान बनाकर कुछ परिवार जान बचाए हुए हैं और नागो की मानें तो अभी तक वहाँ कोई राहत दल नहीं पहुँचा है.

नागो भी अपनी बूढ़ी माँ के साथ घर की छत पर तिरपाल डाल कर किसी मदद का इंतज़ार कर रहा था.

सब्र टूटा

शुरु के कुछ दिन तो चूल्हे जलाने लायक लकड़ी मिल गई लेकिन जब वो भी ख़त्म हो गया तो जीने के लिए कच्चा धान खाने के सिवा कुछ नहीं बचा था.

नागो शर्मा बताता है, "मैं तो किसी तरह बर्दाश्त कर रहा था लेकिन मेरी माँ की हालत ख़राब होती गई. अंत में मैंने उसे कंधे पर बिठा कर बाहर निकालने का फ़ैसला किया."

बाढ़ में फँसे लोग छत पर गुजारा कर रहे हैं

वो कहते हैं, "कंधे पर आगे चलते-चलते एक नाव वाला मिला लेकिन उसने दो हज़ारू रूपए की माँग की. मैंने इलाज़ के लिए रखे पैसों में से दो हज़ार उसे दिए और किसी तरह ज़ीरो माइल पहुँचा."

ज़ीरो माइल से सूमो भाड़ा कर वह मंगलवार शाम सहरसा सदर अस्पताल पहुँचा लेकिन इमरजेंसी वार्ड़ में घुसते ही डॉक्टरों ने उसकी माँ के मृत होने की बात कह उसे बाहर कर दिया.

नागो शर्मा कहते हैं, "अगर समय से राहत दल आ गया होता तो माँ बच गई होती. वो खाने के अभाव में मरी है."

माँ के शव के साथ

नागो बताता है, "मैंने डॉक्टरों से लाख मिन्नत की कि एक बार तसल्ली कर लो. माँ को ठीक से देख लो लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि अस्पताल के बाहर बैठो कल देखेंगे."

जब ये ख़बर कुछ पत्रकारों तक पहुँची तो मैं भी उनके साथ अस्पताल पहुँचा लेकिन डॉक्टरों ने कुछ भी कहने से मना कर दिया.

फिर नागो शर्मा को लेकर कुछ लोग स्थानीय थाने पर पहुँचे ताकि पूरे मामले की एफ़आईआर दर्ज कराई जाए.

लेकिन थानेदार राजेश्वर सिंह का रवैया तो डॉक्टरों से कहीं अधिक कड़ा था. जब लोगों ने उनसे पूछा कि पुलिस शव की सुरक्षा के लिए कुछ क्यों नहीं कर सकती तो उनका जवाब था, "अरे अस्पताल की मॉर्चुरी में तो शव को कुत्ते नोच डालेंगे. इससे बेहतर हुआ कि वह बाहर ही पड़ा रहा."

पुलिस तो नहीं आई लेकिन किसी तरह स्थानीय लोगों के सहयोग से नागो की माँ के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई.

भगीनिया देवी तो इस दुनिया से चली गई लेकिन ये सवाल छोड़ गई कि उनकी मौत भूख से हुई या आधिकारिक भाषा में किसी बिमारी से.

(बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से बातचीत के आधार पर)

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