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राहत सामग्री ने ही मारा.. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बाढ़ के दौरान पेड़ गिरने से या घरों के टूटने से चोट लग जाती है लेकिन बेलदौरा के अरुण शर्मा बाढ़ से बच तो गए लेकिन राहत सामग्री से नहीं बच पाए. मचान बना कर बाढ़ से बचने की कोशिश कर रहे अरुण शर्मा जब राहत सामग्री लेने की कोशिश कर रहे थे तो हेलीकॉप्टर से राहत सामग्री का एक बोरा उन पर आ गिरा जिसमें उनकी टांग ही टूट गई. अब वो टूटी हुई टांग के साथ बेलदौरा के राहत शिविर में हैं. अपनी टांग टूटने से वो उतने दुखी नहीं जितना सरकारी अस्पतालों के रवैये से हैं. वो कहते हैं, ‘ मैं दौड़ रहा था कि कुछ राहत ले लूंगा लेकिन बड़ा सा पैकेट पैर पर गिरा और पूरी टांग ही टूट गई. मुझे किसी तरह नाव पर लाया गया लेकिन सरकारी डॉक्टरों ने प्लास्टर तक नहीं किया. किसी तरह मुझे स्थानीय लोग प्राइवेट डॉक्टर के पास ले गए और तीन दिन के बाद प्लास्टर हुआ.’ पेशे से किसान अरुण कहते हैं कि कम से कम बाढ़ जैसी आपदा को देखते हुए तो सरकारी डॉक्टरों के रवैये में बदलाव आना चाहिए था. अब अरुण खगड़िया और सहरसा के रास्ते में बेलदौरा शिविर में है और इसी बात से संतुष्ट हैं कि कम से कम वो अपने परिवार के साथ एक स्थान पर हैं. इस शिविर में लोगों को कम से कम खाना समय पर मिल जाता है और डॉक्टरों की सुविधा भी है. मुश्किल में ज़िंदगी अब अरुण जैसे लोगों को आगे की ज़िंदगी की मुसीबतें सता रही हैं. वो कहते हैं, ‘ क्या कर सकते हैं. फिर से शुरुआत करनी पड़ेगी. खेत डूब गए हैं. जो अनाज घर में था वो भी बह गया. अब तो सरकार कुछ राहत दे तो जान बचे.’
इसी शिविर में मौजूद लालचंद कहते हैं, ‘ मैं तो ग़रीब आदमी हूं. किसी तरह बच कर यहां पहुंचा. घर पूरा टूट गया. पता नहीं अब कैसे ज़िंदगी चलेगी.’ राजिंदर शर्मा भी अब शरणार्थी बन चुके हैं. वो कहते हैं, ‘ मैंने इस बार अपने खेतों में बहुत मेहनत की थी. बहुत अनाज हुआ था. चालीस पचास मन मकई था.सब डूब गया.मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी इतना पानी नहीं देखा था.हम दूसरे लोगों से कहते थे कि तुम बाढ़ग्रस्त इलाक़े के हो.अब हमीं बाढ़ से मर रहे हैं.’ इन लोगों से सरकार से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है और वो मानते हैं कि कोसी ने उन्हें कम से कम दस साल पीछे धकेल दिया है. लालचंद कहते हैं, ‘मेरे पास तो ज़मीन नहीं है लेकिन जिनके पास ज़मीन है वो ज़मीन ऊपजाऊ रहेगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं है.कोसी तो रेत लेकर आती है. फिर कौन सी ज़मीन में खेती होगी ये भी मुसीबत हो जाएगी हम लोगों को.’ लोग बाढ़ से परेशान हैं, राहत शिविरों में कुछ दिन जीवन चल जाएगा लेकिन अब आगे की ज़िंदगी की चिंता उन्हें सताए जा रही है. |
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