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रविवार, 07 सितंबर, 2008 को 05:03 GMT तक के समाचार
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पानी घटने के साथ महामारी की आशंका

राहत शिविर
अभी महामारी का प्रकोप नहीं है लेकिन बच्चों और बूढ़ों को अनेक बीमारियां हो रही हैं
बाढ प्रभावित इलाक़ों में पानी घटने के साथ ही महामारी की आशंका पैदा हो रही है.

सरकार ने राहत सामग्री के साथ साथ चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने की कोशिश की है लेकिन उनके उपाय पर्याप्त नहीं दिख रहे हैं.

राहत शिविरों में बुखार और उल्टी की दवाइयां मिल रही हैं लेकिन हैज़ा और डायरिया को रोकने के लिए सरकार की ओर से कोई विशेष उपाय इस समय दिखाई नहीं पड़ रहा है.

बिहार के बाढ़ प्रभावित ज़िलों के राहत शिविरों में राहत सामग्री के साथ मेडिकल टीमें धीरे धीरे पहुंच रही हैं लेकिन इन टीमों में बीमारियों को रोकने की कोई तत्परता नहीं दिखती है.

अररिया और सहरसा में इस बात की शिकायतें कुछ दिन पहले ही आई थीं कि सिविल सर्जनों को पता ही नहीं कि उनके इलाक़े में चिकित्सा के मामले में क्या हो रहा है.

स्वयंसेवी संगठनों का कहना था कि डॉक्टरों का रवैया उदासीन सा है. हालांकि अभी महामारी का प्रकोप नहीं हुआ है लेकिन बच्चों और बूढ़ों को कई तरह की बीमारियां हो रही हैं.

खांसी, बुखार और दस्त

राहत शिविरों में बच्चे रो रहे हैं और उनके माता पिता का कहना था कि बच्चों को खांसी, बुखार और दस्त की शिकायत हो रही हैं. इन बच्चों को दवाइयां मिल रही है लेकिन फ़ायदा नहीं हो रहा है.

चिकित्सा दल
राहत शिविर में बीमारों की देखभाल करता चिकित्सा दल

बूढ़े लोगों ने पेट ख़राब होने और उल्टी की शिकायतें कीं. कुछ परिवारों ने कहा कि अब उन्हें पानी से डर लगने लगा है. बच्चे परेशान थे और पानी की तरफ जाने में डर भी रहे थे.

जब मैं बेलदौरा राहत शिविर के पास ही लगे चिकित्सा शिविर में गया तो हमें वहां राकेश कुमार मिले जो स्वयंसेवी संगठन के थे और उन्होंने बताया कि वो डॉक्टर नहीं बल्कि पैरामेडिकल स्टाफ़ हैं. उनका कहना था कि बच्चों को ओरआरएस का घोल दिया जा रहा है.

उनका कहना था कि खांसी और बुखार की दवाइयां भी मिल रही हैं. हालांकि जब मैंने उनसे पूछा कि क्या महामारी रोकने के लिए कोई एहतियाती उपाय किए गए हैं तो उन्होंने कहा कि अभी इस दिशा में कुछ हो नहीं पाया है. अगले कुछ दिनों में उनकी टीम आने वाली है.

इससे थोड़ी ही दूर सरकारी डॉक्टर अनुपम भी बैठे थे. उनसे जब हमने पूछा कि पानी में जानवर मरे पड़े हैं गंदे पानी के कारण बीमारियां फैल सकती हैं और इस बारे में उन्होंने क्या किया है तो उन्होंने कुछ यूं कहा, " हम डॉक्टर हैं बिहार सरकार के. प्रापर डॉक्टर हैं. सब व्यवस्था है. दवाई हैं. मवेशियों का हमको नहीं पता."

जब बार-बार एहतियाती उपायों के बारे में पूछा गया तो वो हड़बड़ा गए फिर पास बैठे दूसरे मेडिकल स्टाफ़ ने कहा कि पानी साफ़ करने के लिए हैलोजन इत्यादि की व्यवस्था की गई है.

यूनिसेफ़ का काम

बाढ़ आने के बाद महामारियां फैलना आम बात है. अभी हालांकि पानी उतना कम नहीं हुआ है कि मच्छरों का प्रकोप हो और मलेरिया या हैजा फैले लेकिन इसे रोकने की तैयारी भी नहीं दिखती..

इन बीमारियों का सबसे पहले शिकार बनते हैं बच्चे जिनकी स्थिति पहले से ही ख़राब है. रास्ते में हमें यूनिसेफ़ के कुछ कार्यकर्ता मिले.

 हम डॉक्टर हैं बिहार सरकार के. प्रापर डॉक्टर हैं. सब व्यवस्था है. दवाई हैं. मवेशियों का हमको नहीं पता
डॉक्टर अनुपम

इनमें से एक योगेश्वर बच्चों को पोलियो की ख़ुराक़ दे रहे थे. उनका कहना था कि यूनीसेफ की टीम बच्चों में कुपोषण की जांच कर रही है और उन्हें दवाइयां दे रही है.

योगेश्वर डॉक्टर नहीं थे लेकिन उन्होंने बड़े ही विश्वास के साथ कहा कि गंदे पानी को साफ़ करने और महामारी रोकने के लिए पानी में दवाइयां डाली जा रही हैं और कोशिश की जा रही है हैजा और डायरिया जैसी बीमारियां न फैलें.

हमें कई लोगों ने बताया कि उनके बच्चे पानी से डरने लगे हैं. मैं समझ सकता था कि यह मनोवैज्ञानिक समस्या है जो हर बड़ी त्रासदी के बाद बच्चों क्या बड़ों को भी होती है.

लेकिन जब इन शिविरों में शारीरिक रूप से बीमार बच्चों का ही इलाज ठीक से नहीं हो रहा है तो फिर त्रासदी के बाद की मानसिक समस्याओं को कौन पूछता है.

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